लद्दाख की अशांति सुरक्षा के लिए ठीक नहीं

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

लोकतंत्र में सरकार सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत पर चलती है। देश की उपलब्धियों और विफलताओं, दोनों की जवाबदेही सरकार पर होती है। ऐसा नहीं हो सकता है कि इसरो से लेकर भारतीय सेना तक की हर उपलब्धि का श्रेय तो सरकार खुद ले लेकिन मणिपुर से लेकर लेह तक हिंसा हो तो उसकी जिम्मेदारी दूसरे पर डाल दे। पिछले कई बरसों से देश में यह देखने को मिल रहा है। सरकार अपनी जवाबदेही नहीं स्वीकार कर रही है। हर उपलब्धि के मौके पर प्रधानमंत्री से लेकर मंत्री तक आगे की कतार में जाकर खड़े हो जा रहे हैं लेकिन विफलता के लिए दूसरों पर ठीकरा फोड़ा जा रहा है।

लेह में जो हिंसा की आग भड़की है उसकी जिम्मेदारी सरकार और सत्तारूढ़ दल दोनों की ओर से सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और कांग्रेस के एक काउंसलर फुंटसोग स्टैनजिन त्सेपाग पर फोड़ा गया है। कांग्रेस काउंसलर के ऊपर लेह प्रशासन ने लोगों को भड़काने का मुकदमा दर्ज किया है। इसके अलावा भाजपा की आईटी सेल की ओर से कांग्रेस के एक अन्य काउंसलर स्मानला दोरजे नोरबू की प्रेस कॉन्फ्रेंस की वीडियो शेयर की जा रही है और दावा किया जा रहा है कि उन्होंने युवाओं को हिंसा के लिए भड़काया।

केंद्र सरकार का इसी तरह का नजरिया मणिपुर हिंसा के समय भी था, जिसका नतीजा यह हुआ है कि करीब ढाई साल से वहां जातीय हिंसा चल रही है। 2023 की मई के पहले हफ्ते में जब हिंसा शुरू हुई थी उसी समय सरकार केंद्र सरकार ने इसकी गंभीरता को समझा होता और इसके पीछे के कारणों की पड़ताल करके उसे ठीक करने का प्रयास किया होता तो सैकड़ों लोगों की मौत नहीं होती और न हजारों लोग विस्थापित होते। लेकिन सरकार पहले कुकी और मैती समुदायों से जुड़े चरमपंथी संगठनों पर इसका ठीकरा फोड़ती रही।

इसे कानून और व्यवस्था की समस्या मान कर सुलझाने का प्रयास किया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि बहुसंख्यक मैती और पहाड़ों पर बसे अल्पसंख्यक कुकी समुदायों के बीच दूरी इतनी बढ़ गई कि वे अब साथ नहीं रहना चाहते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दौरा 28 महीने की देरी से हुआ। मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह को हटाने का फैसला भी 20 महीने से ज्यादा की देरी से हुआ। अगर पहले ही सीएम बदला गया होता, प्रधानमंत्री की यात्रा होती और राष्ट्रपति शासन लगा कर दोनों समुदायों के बीच सद्भाव बनाने का प्रयास होता तो तस्वीर अलग हो सकती थी। लेकिन इतनी देरी कर दी गई कि अब कुकी समुदाय के लोग अलग केंद्र शासित प्रदेश की मांग कर रहे हैं। वे मैती समुदाय के साथ नहीं रहना चाहते हैं। यह स्थिति प्रधानमंत्री के दौरे के बाद की है।

लद्दाख का मामला भी ऐसे ही शुरू हुआ। जब जम्मू कश्मीर विशेष राज्य था और वहां अनुच्छेद 370 और 35ए लागू थे तब लद्दाख के लोगों ने अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाने की मांग की थी। अगस्त 2019 में जब केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 हटाया तब प्रदेश का विभाजन करके लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बना दिया। लेकिन उसके तुरंत बाद लद्दाख के लोगों ने पूर्ण राज्य बनाए जाने की मांग शुरू कर दी। पिछले छह साल से यह मांग उठ रही है। इसे लेकर लेह अपेक्स बॉडी यानी एलएबी का गठन हुआ और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस यानी केडीए का भी गठन हुआ। दोनों संगठनों ने पूर्ण राज्य की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। इसके अलावा कुछ और मांगें भी रखीं। जैसे संविधान की छठी अनुसूची के तहत संरक्षण की मांग और नौकरियों में स्थानीय लोगों को आरक्षण की मांग भी रखी गई। लेह और कारगिल को अलग अलग लोकसभा सीट बनाने की मांग भी हो रही है।

आज जो सरकार कांग्रेस और सोनम वांगचुक पर ठीकरा फोड़ रही है उसने असल में छह साल से चल रहे प्रदर्शनों की अनदेखी की। सोनम वांगचुक ने इन मांगों के साथ लेह से दिल्ली तक पदयात्रा की। देश भर के सम्मानित बौद्धिकों ने उनका समर्थन किया। लेकिन सरकार ने कोई बात नहीं की। वे दो सितंबर 2024 को लेह से निकले और दो अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन का कार्यक्रम बनाया। उनकी यात्रा दिल्ली पहुंचने पर उनके साथ और उनके साथ चल रहे अन्य लोगों के साथ ऐसा बरताव किया गया, जैसे वे कोई असामाजिक तत्व हों। उन सबको हिरासत में लिया गया।

उनको राजघाट जाने से रोकने के लिए किसी को बवाना थाने में रखा गया तो किसी को नरेला थाने में बंद किया गया। कायदे से भारत सरकार के शीर्ष स्तर से पहल होनी चाहिए थी। उनको बुला कर बात किया जाना चाहिए था और मामले को जल्दी से जल्दी सुलझाना चाहिए था। एक साल बाद जब वे फिर अनशन पर बैठे तब भी सरकार पर कोई असर नहीं हुआ। अनशन में शामिल बुजुर्ग जब बीमार होने लगे तो हिंसा भड़की और सरकार ने उसका ठीकरा सोनम वांगचुक पर फोड़ दिया।

पता नहीं क्यों सरकार इस मामले की गंभीरता को नहीं समझ रही है। मणिपुर और लद्दाख दोनों का विवाद सिर्फ आंतरिक समस्या नहीं है। यह सामरिक दृष्टि से ज्यादा अहम है। मणिपुर की तरह लद्दाख भी संवेदनशील सीमावर्ती इलाका है। पूर्वी लद्दाख में ही चीन के साथ 2020 में झड़प हुई थी और सीमा विवाद बढ़ा था। इस इलाके में किसी भी तरह से अशांति होती है तो उसका असर सीमा सुरक्षा पर पड़ेगा। दुश्मन ताकतें इन सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठ करने या अस्थिरता फैलाने के लिए तैयार बैठी हैं। इसलिए सरकार को तुरंत पहल करनी चाहिए।

आरोप प्रत्यारोप करने या दूसरे लोगों को जिम्मेदार ठहराने की राजनीति से बचना चाहिए। चाहे मणिपुर का मामला हो या लद्दाख का इसे एक जरूरी राजनीतिक समस्या मान कर इसका राजनीतिक समाधान निकालने का प्रयास करना चाहिए। यहां के नागरिकों समूहों को वार्ताओं में शामिल करके व्यापक सहमति के प्रयास करने चाहिए। लेकिन अभी तक ऐसा हो रहा है कि सरकार समस्या को बढ़ने देती है। उसकी अनदेखी करती है और जब विस्फोटक स्थिति बन जाती है तो किसी को बलि का बकरा बनाया जाता है। यह तिकड़म घरेलू राजनीति में तो ठीक है लेकिन जहां राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला जुड़ा हो उस मामले में ऐसा नहीं करना चाहिए।

लद्दाख की समस्या के एक और आयाम को ध्यान में रखना चाहिए, जिस ओर जम्मू कश्मीर के नेता इशारा कर रहे हैं। लद्दाख की घटना पर उनकी प्रतिक्रिया थी कि सोचें, जम्मू कश्मीर के लोगों के मन में क्या चल रहा होगा! गौरतलब है कि सरकार जम्मू कश्मीर को भी पूर्ण राज्य का दर्जा देने का फैसला टालती जा रही है। अब वहां चुनाव हो चुके हैं, लोकप्रिय सरकार का गठन हो चुका है और तब भी राज्य का दर्जा नहीं देना उचित नहीं प्रतीत होता है। ध्यान रखना चाहिए कि यह पहला मामला है, जब एक पूर्ण राज्य को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया और इतने समय से उसका दर्जा नहीं बदला जा रहा है। बहरहाल, लद्दाख की हिंसा को व्यापक नजरिए से देखने की जरुरत है और उसके साथ साथ जम्मू कश्मीर के लोगों की भावना को भी समझने की जरुरत है।


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