उम्मीदवार नहीं नेता लड़ेंगे चुनाव

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

भारतीय राजनीति में यह प्रवृत्ति अब सांस्थायिक रूप लेती जा रही है। नरेंद्र मोदी की कमान में भाजपा ने इस प्रवृत्ति को एक सिद्धांत में बदला और अब सारी पार्टियां इसे अपना रही हैं। सिद्धांत यह है कि उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ेगा, बल्कि एक सर्वोच्च नेता चुनाव लड़ेगा और एक दूसरे बड़ा नेता चुनाव की रणनीति बनाएगा। इस सिद्धांत के मुताबिक हर सीट पर उम्मीदवार एक सर्वोच्च नेता के नाम पर वोट मांगेंगे और हर उम्मीदवार के लिए ही एक नेता  रणनीति बनाएगा। जैसे भाजपा में लोकसभा चुनाव हो या किसी भी राज्य का विधानसभा चुनाव या स्थानीय निकाय का चुनाव एक नेता नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा जाता है और एक नेता अमित शाह चुनाव की रणनीति बनाते हैं।

राज्य चाहे कोई भी हो, उसकी सामाजिक संरचना चाहे जैसी भी हो, वहां की जनभावना और राजनीतिक मुहावरे चाहे जैसे भी हों, मोदी के नाम पर वोट मांगा जाएगा और कैसे वोट मांगा जाएगा, यह तय करेंगे अमित शाह। बस एक ‘चंद्रगुप्त’ और एक ‘चाणक्य’! बाकी सब पैदल सेना हैं, निराकार! इसी तरह कांग्रेस में एक नेता राहुल गांधी, जिनके नाम पर हर राज्य में चुनाव लड़ा जाता है। कांग्रेस जीते या हारे, नाम सिर्फ राहुल गांधी का  होगा।

पहले भी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों में करिश्माई नेता होते थे और पार्टियां उनके करिश्मे पर चुनाव  लड़ती थीं। लेकिन तब भी चुनाव लड़ने और जीतने या हारने वाले नेताओं की अपनी अहमियत होती थी। उनका अपना कद होता था। वे एक सामाजिक समीकरण के साथ साथ एक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते थे। करिश्माई नेता से अलग हट कर उनका राजनीतिक वजूद होता था। उनकी सामूहिक ताकत पार्टी के करिश्माई नेता को और मजबूत करती थी। कांग्रेस में भले ‘इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा’ कहने वाले नेता थे लेकिन ऐसा मानने वाले बहुत कम थे।

वे कहते थे लेकिन ऐसा कहने की सीमा जानते थे। वे अपने दम पर राजनीति करते थे लेकिन कांग्रेस आलाकमान को खुश रखने की जरुरत भी समझते थे। भाजपा में भी अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी सबसे बड़े नेता थे लेकिन सभी प्रदेशों में भाजपा के अपने ताकतवर क्षत्रप थे, जिनकी  राजनीति अपने दम से चलती थी। अब न कांग्रेस में ऐसा है और न भाजपा में। अब कांग्रेस  या भाजपा के नेता पार्टी आलाकमान को माई-बाप कहते हैं और मानते भी हैं। वे यह बात दिल से कहते हैं। यह सिर्फ औपचारिकता नहीं होती है।

यह प्रवृत्ति देश की सभी प्रादेशिक पार्टियों में भी गहरे तक बैठ गई है। जो बात कभी लालू प्रसाद ने नहीं कही वह बात तेजस्वी यादव कह रहे हैं। लालू प्रसाद ने कभी नहीं कहा कि बिहार की सभी 243 सीटों पर वे ही लड़ेंगे, जबकि उनका करिश्मा किसी भी समकालीन नेता से ज्यादा था। लेकिन तेजस्वी यादव कह रहे हैं कि सभी 243 सीटों पर वे लड़ेंगे। सोचें, इसमें उनकी अपनी पार्टी की सीटें ज्यादा से ज्यादा 140 होंगी। बाकी सीटें सहयोगी पार्टियों के खाते में जाएंगी। लेकिन तेजस्वी का यह दावा है कि उन सीटों पर भी वे ही लड़ेंगे।

यानी  ‘इंडिया’ ब्लॉक के 243 उम्मीदवारों का कई मतलब नहीं है। हर सीट पर तेजस्वी यादव लड़ेंगे और उनके ‘चाणक्य’ संजय यादव हर सीट की रणनीति बनाएंगे। उनके पास सारा डाटा और सर्वे एजेंसियों की ओर से दी गई फीडबैक है। जैसे अमित शाह भाजपा और एनडीए के लिए रणनीति बनाएंगे वैसे ही संजय यादव राजद और ‘इंडिया’ ब्लॉक के लिए बनाएंगे। किसी भी सीट पर लड़ रहे उम्मीदवार को कुछ नहीं करना है। उसे क्या बोलना है, किस एजेंडे को एड्रेस करना है, क्या नैरेटिव फैलाना है आदि आदि बातें बैकरूम से उसको बताई जाएंगी।

हर सीट पर मैं ही लड़ूंगा यह बात पहले के चुनावों में आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल कह चुके हैं तो इस बार बिहार चुनाव से पहले लोक जनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवान भी कह रहे हैं। प्रशांत किशोर बिहार में बदलाव की यात्रा कर रहे हैं लेकिन वे उम्मीदवारों के नाम नहीं बता रहे हैं। बदलाव यात्रा की सभाओं में उनका भाषण इस बात से शुरू होता है कि, ‘मेरा ही नाम प्रशांत किशोर है’। जन सुराज के उम्मीदवार का कोई मतलब नहीं है। जो है प्रशांत किशोर का नाम है। लोकसभा चुनाव 2014 में ‘मैं भी मोदी’ का मास्क लगा कर सभाओं में भीड़ आती थी। अब अलग अलग जगहों पर अलग अलग मास्क के साथ भीड़ आने लगी है। उत्तर प्रदेश में भीड़ अखिलेश यादव के मास्क लगा रही है तो तमिलनाडु में एमके स्टालिन के।

कई लोग अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव से इस प्रवृत्ति की तुलना करते हैं। लेकिन वहां राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार अपने चेहरे पर अपना चुनाव लड़ता है। यहां नेता के चेहरे पर दूसरे का चुनाव लड़ा जाता है। यहां नेता अपना चुनाव तो लड़ता ही है, अपने चेहरे पर दूसरों का चुनाव भी लड़ता है। यह बुनियादी रूप से एक अलोकतांत्रिक प्रक्रिया है। संसदीय  लोकतंत्र में जन प्रतिनिधि का मतलब स्थानीय स्तर पर आम लोगों का प्रतिनिधि होता है।  अगर किसी संसदीय क्षेत्र में चुनाव लड़ने वाले प्रतिनिधि के चेहरे को गौण कर दिया जाए और प्रधानमंत्री के चेहरे पर चुनाव लड़ा जाए तो फिर जीतने वाले प्रतिनिधि का क्या उत्तरदायित्व जनता के प्रति होगा? क्या ऐसी स्थिति में जनता को उस जीते हुए प्रतिनिधि से कोई शिकायत करने का अधिकार रह जाएगा? अगर उसने उम्मीदवार को नहीं देखा है, उसके गुणदोष को देख कर मतदान नहीं किया है, बल्कि किसी चमत्कारिक नेता के नाम और चेहरे पर वोट किया है तो वह अपने स्थानीय प्रतिनिधि से सवाल पूछने का अधिकार नहीं रखता है।

यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति है। इसका एक बड़ा खतरा यह है कि जनता से जुड़ाव रखने वाले मजबूत और सक्षम नेताओं की कमी होती जाएगी और उनकी जगह नाकारा लेकिन नेता के प्रति निष्ठावान नेताओं की जमात बड़ी होती जाएगी। इसका एक बड़ा खतरा यह भी है कि अक्षम नेताओं की वजह से अधिकारी और कर्मचारी ज्यादा ताकतवर होंगे। इससे अंततः आम आदमी के लिए व्यवस्था में स्पेस कम होगा। यह पूरा सिद्धांत असल में सर्वोच्च नेता को भगवान का अवतार मानने की धारणा को मजबूती देगा और देश को सर्वोच्च नेता की तानाशाही की ओर ले जाएगा। भारत में संसदीय लोकतंत्र हर क्षेत्र के जन प्रतिनिधि की मजबूती से मजबूत होगा। कमजोर जन प्रतिनिधि या खड़ाऊ जन प्रतिनिधि समूचे लोकतंत्र के लिए खतरा होंगे। संविधान और लोकतंत्र बचाने की बात करने वाली पार्टियों को कम से कम ऐसी बातों से बचना चाहिए।


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