यह कोई साधारण आंकड़ा नहीं है। ऐसा सत्य है, जो पढ़ते ही दिल-दिमाग दोनों को झिंझोडता है। मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट ने बताया है कि जेनरेशन ज़ेड वह पहली पीढ़ी है, जिसकी औसत बौद्धिक क्षमता—आईक्यू—पिछली पीढ़ी, यानी मिलेनियल्स की तुलना में घटा है। सीधे शब्दों में कहें, तो यह वह पहली पीढ़ी है जो अपने पूर्वजों से तेज़ नहीं, बल्कि डफर है। महज़ एक पीढ़ी के फर्क में ऐसी गिरावट का सत्य डराने वाला है, क्योंकि इससे भविष्य की चिंता बाद में है फिलहाल वर्तमान ही गडबडाता है।
मेरा कुछ समय से लिखना थमा हुआ था। शब्द मौजूद थे, लेकिन उन्हें जोड़ने का मन नहीं बन रहा था। यह समझना अब कठिन हो गया है कि हम किस तरह के समय में जी रहे हैं? गतिविधियां, सुर्खियां बहुत है, पर परिणाम नहीं। शोर है, पर दिशा नहीं। एक जिद्दी ठहराव हर ओर फैल गया है। समस्या यह नहीं कि कुछ हो नहीं रहा, बल्कि यह है कि बहुत कुछ हो रहा है, लेकिन सब बिना टेके, बिना असर के है। वही घटनाएँ, वही प्रतिक्रियाएँ, वही निष्कर्ष—बार-बार। यह स्थिति धीरे-धीरे सभी को सुस्त, टाइमपास के मुकाम पर पहुंचा देती है।
इसी दशा में मैंने जेनरेशन ज़ेड के लोगों के साथ कुछ समय बिताया। अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के बच्चों के साथ तो एक ठहराव साफ़ झलका। बातचीत आँखें खोलने वाली थी, सुकून देने वाली कतई नहीं। तभी मुझे बदलाव सिर्फ़ उनमें नहीं, अपने भीतर भी दिखाई दिया। मेरी सोच किसी उस बड़ी पीढ़ी जैसी होने लगी जो परिवर्तन को आते हुए देखती है, पर उसकी दिशा पूरी तरह समझ नहीं पाती। ध्यान रहे जेनरेशन ज़ेड की तरूण पीढ़ी भारत का कोई छोटा या हाशिये का समूह नहीं है। यह वह आबादी है जो अब समाज की दिशा तय कर रही है।
भारत में जेनरेशन ज़ेड हर जगह है। लगभग हर परिवार में वे हैं। वयस्कता की दहलीज़ पर खड़े, और इस बात को लेकर आश्वस्त कि वे क्या नहीं करेंगे। वे जो कहते हैं, वह बिना किसी नाटकीयता के भी चौंकाता है। और वे लंबे समय तक काम नहीं करना चाहते। छह महीने उन्हें पर्याप्त लगते हैं। उसके बाद प्रतिबद्धता बोझ लगने लगती है। यह आलस्य नहीं है, बल्कि काम से अर्थ के टूट जाने का संकेत है। जब श्रम को किसी दीर्घ प्रक्रिया की तरह नहीं, बल्कि एक अस्थायी गतिविधि की तरह देखा जाए, तो धैर्य अपने आप कमजोर पड़ने लगता है।
पैसे को लेकर भी सोच बदली है। आर्थिक असुरक्षा उन्हें उस तरह नहीं सताती, जैसे पिछली पीढ़ियों को सताती थी। चिंता की जगह यह भरोसा बैठ गया है कि कुछ न कुछ निकल ही आएगा। यह आत्मविश्वास कम और आदत ज़्यादा है। एक ऐसे समय में पले-बढ़े होने की आदत, जहाँ विकल्प हमेशा खुले दिखते हैं, चाहे वे वास्तविक हों या नहीं।
रिश्तों में भी यही अस्थायित्व दिखाई देता है। लगाव अस्थायी हैं। स्थायित्व भारी लगता है। हर चीज़ “जब तक ठीक लगे” के सिद्धांत पर चलती है। यह भावनात्मक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि भावनात्मक थकान का लक्षण है। जब हर संबंध अस्थायी हो, तो गहराई धीरे-धीरे ख़त्म होने लगती है।
राजनीति से दूरी भी इसी मानसिकता का हिस्सा है। जेनरेशन ज़ेड राजनीति से अनजान नहीं है। वह बस मान चुकी है कि इसमें रखा क्या है? सब तय है। उसमें सक्रिय होना भागीदारी से कुछ बदलेगा, इस पर विश्वास कम है। इसलिए भारत की तरूणाई-युवा पीढ़ी न नाराज़ होती है, न विद्रोही बनती है। वह बस अनुकूलन करना सीख लेती है। मतलब राम भरोसे हल्के होकर जीना।
दरअसल जेनरेशन ज़ेड ऐसे समय में पैदा हुई, जब विकास पहले से गति में था। वे उन छोटे-छोटे समझौतों के बिना बड़े हुए, जिन पर पिछली पीढ़ियाँ प्रशिक्षित हुई थीं। दूसरे शब्दों में इंतज़ार करना, समायोजन करना, जैसे-तैसे काम चलाना। दुनिया उनके सामने तैयार हालत में आई। इंटरनेट से ढली आसान, सुलभ और तुरंत उपलब्ध। एक मिलेनियल होने के नाते यह बात मुझे जानी-पहचानी लगती है। हमारे बारे में भी यही कहा गया था कि हम भाग्यशाली और हक़दार हैं मगर भ्रमित हैं, संघर्ष से कटे हुए हैं। और कुछ हद तक यह सही भी था।
हम भी अपेक्षाकृत भरोसे, शांति के दौर में बड़े हुए। लेकिन हम वह पहली पीढ़ी थे, जिसने संघर्ष को पीछे हटते देखा और फिर भी याद रखा कि वह कैसा दिखता था। हम अभाव और प्रचुरता, धैर्य और गति, परिणाम और चुनाव इन सबके बीच खड़े व समझदार थे। इसके बावजूद एक अंतर है, जिस पर ठहरकर सोचना ज़रूरी है। तमाम विरोधाभासों के बावजूद, मिलेनियल्स नौजवान भी अनुशासन और विलंबित प्रतिफल की एक पुरानी व्याकरण में ढले हुए थे। हमें यह सिखाया गया, भले अनिच्छा, अनजाने में ही सही कि कोशिश, मेहनत आराम से पहले आता है। पहले काम फिर आराम। और मेहनत, मजदूरी, काम किया तो फल मिलेगा ही।
मगर यह मनोभाव, बुद्धी बोध जेनरेशन ज़ेड में बिल्कुल अलग तरह के मनोविज्ञान के साथ है। एक तो यह कि स्मार्टफोन हाथ में आया तब इंटरनेट कोई नई चीज़ नहीं था बल्कि सामान्य था। टीवी, फोन की फ़्लैट स्क्रीन विलासिता नहीं, स्थायी सुविधा थी। वे बसों में नहीं, कारों से आ-गए। गर्मियाँ विदेश यात्राओं का समय थीं, न कि नाना-नानी के घर लंबे प्रवास का। कोक और चिप्स रोज़मर्रा की चीज़ें थीं। वे पिज़्ज़ा, पास्ता और सुशी पर पली पीढ़ी हैं। मतलब कूल होना, चिल करना, आराम स्वाभाविक और स्वभाव का सामान्य हिस्सा।
फिर राजनीति आई, जिसने उनके व्यक्तित्व को और आकार दिया। जेनरेशन ज़ेड नरेंद्र मोदी के दौर में बड़ी हुई पहली पीढ़ी है। किसी सरकार के तहत नहीं, बल्कि एक चेहरे की निरंतर उपस्थिति के बीच। नरेंद्र मोदी उनकी स्क्रीन पर सिर्फ़ पारंपरिक अर्थों में नेता बनकर नहीं आए, बल्कि आत्मविश्वास और स्टाइल वाले एक अलग व्यक्तित्व की तरह। उनके लिए सत्ता का अर्थ वैचारिक बहस, आलोचना या सवाल नहीं रहा। सत्ता स्थिरता और निरंतरता का पर्याय बन गई—स्ट्रीम की हुई, क्लिप की हुई, लगातार दोहराई हुई।
सिनेमा ने भी इसी बदलाव को प्रतिबिंबित किया। इस पीढ़ी ने ऐसी फ़िल्में देखीं, जो रोमांस या युवा आदर्शवाद से नहीं, बल्कि शिकायत, आक्रोश और नैतिक निश्चितता से भरी थीं। ‘द कश्मीर फ़ाइल्स’ और ‘धुरंधर’ जैसी फ़िल्में रूपक की तरह नहीं, बल्कि अभियोग-पत्र की तरह आईं। उन्होंने सोचने का आमंत्रण नहीं दिया; उन्होंने निष्कर्ष थमा दिए। परतें कम हुईं, ऐलान बढ़े। सूक्ष्मता की जगह शोर, भावना की जगह ग़ुस्सा और नाटकीयता के नाम पर धूम-धड़ाका हावी हो गया।
यह मेरी पीढ़ी की भावनात्मक ट्रेनिग से एक साफ अंतर, मिलेनियम यूथ ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ पर पले, जहाँ प्रेम धैर्य सिखाता था और विद्रोह कोमल था। और ‘रंग दे बसंती’ पर, जहाँ आदर्शवाद उलझा हुआ, विरोधाभासी और महंगा था। हमारे सांस्कृतिक संसार में ग़ुस्सा भी आत्म-संशय के साथ आता था। बदलाव के लिए बलिदान चाहिए था। अर्थ के लिए टकराव।
मगर पिछले बारह वर्षों में मुख्यधारा का भारतीय सिनेमा भी कल्पना के बदले शोर चुनता चला गया है। भाषा, हाव-भाव और भावना की अशिष्टता ने रचनात्मकता की जगह ले ली है। सोच की जगह assertion आ गया है। उकसावे की जगह घोषणा। और जहाँ तक लेखन और मीडिया का सवाल है तो जेनरेशन ज़ेड का यूथ एनिड ब्लाइटन या रसकिन बॉन्ड पर नहीं पला। वह शॉर्ट्स, रील्स, के-पॉप और ड्रामा पर बड़ी हुई और उसी में खोई हुई है।
जेनरेशन ज़ेड ने एक और विरासत पाई—एक ऐसी दुनिया जो पहले से ध्रुवीकृत थी, पहले से शोरगुल भरी, पहले से हुंकारे मारती हुई। आश्वस्त-निकम्मा और यथास्थितिवादी बनाती हुई। तभी इनमें जहाँ राय, समझ अनुभव से पहले, इलाहमी है। पहचान परीक्षा से पहले घोषित होती है। नैतिक निर्णय धीरे-धीरे बनते नहीं, बल्कि तेज़ी से उपभोग कर लिए जाते हैं।
यह कोई नैतिक आरोप नहीं है। यह एक सांस्कृतिक अवलोकन है। हर पीढ़ी अपने समय की उपज होती है। अभाव में पली पीढ़ियाँ धैर्य सीखती हैं। सुविधा में पली पीढ़ियाँ गति सीखती हैं, भागती है। फर्क चरित्र का नहीं, परिस्थितियों का होता है। लेकिन जब परिस्थितियाँ लगातार सनसनी ही पैदा किए रहे और सोचने- समझने का अवसर ही न दें, तो उसका असर सीधे दिमाग़ पर पड़ता है। दिमाग सोचने-समझने की क्षमता खो कर डफर होता जाए तो इससे फिर बाहर निकल सकना असंभव ही है।
इसलिए मनीकंट्रोल की रिपोर्ट महज़ आँकड़ा नहीं है। चेतावनी बन जाती है। भारत के नौजवान की औसत बौद्धिक क्षमता घट रही है, तो यह केवल शिक्षा व्यवस्था का सवाल नहीं है। यह पूरे सामाजिक वातावरण की समीक्षा की माँग करता है। यह पूछने का समय है कि हमने किस तरह का संसार, देश रचा है जिसमें सूचनाएं, जानकारी बहुत है, पर समझ कम; विकल्प बहुत हैं, पर विवेक कम; शौर-आवाज़ तेज़ हैं, पर सोच उथली।
यह स्थिति भारत के भविष्य के लिए डराने वाली इसलिए है, क्योंकि यह धीरे-धीरे आती है। कोई विस्फोट नहीं होता। कोई बड़ा पतन नहीं दिखता। बस सोच की, बुद्धी की गहराई कम होती जाती है। और जब सोच उथली हो जाती है, तो लोकतंत्र, संस्कृति और समाज, तीनों कमज़ोर पड़ने लगते हैं।
सो भारत की कुल आबादी की ताजा और विशाल युवा समूह का सत्य आईने में साफ है। सवाल यह नहीं है कि जेनरेशन ज़ेड कैसी है। सवाल यह है कि हमने उन्हें कैसा समय दिया है। और अगर हम इस समय की दिशा नहीं बदल पाए, तो अगली रिपोर्ट सिर्फ़ जेनरेशन ज़ेड के बारे में नहीं होगी—वह पूरे समाज के बौद्धिक पतन की कहानी होगी। यही इस समय की असली त्रासदी है।
