पंजाब में चन्नी क्या एक प्लेयर होंगे?

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यह लाख टके का सवाल है, जिसका जवाब कांग्रेस नेता यह दे रहे हैं कि अब समय नहीं है और अभी अगर चन्नी अलग पार्टी बनाते हैं तो कामयाबी नहीं मिलेगी। लेकिन चन्नी निश्चित रूप से पंजाब की राजनीति में एक प्लेयर होंगे। इसका कारण यह है कि पहली बार पंजाब का राजनीतिक स्पेस इतना विभाजित दिख रहा है। पहली बार पांचकोणीय मुकाबले के आसार बन रहे हैं। ऐसे विभाजित राजनीतिक स्पेस में अगर कोई नई पार्टी आती है, जिसके पास एक ठीक ठाक वोट आधार हो तो वह अपनी जगह बना सकती है। यही कारण है कि कांग्रेस पार्टी के नेता चिंता में हैं। उनको लग रहा है कि कांग्रेस, आप, अकाली दल, भाजपा और वारिस पंजाब दे जैसी पार्टियों के कारण ही चन्नी का हौसला बढ़ा है। वे दलित राजनीति का दांव खेल सकते हैं।

असल में पंजाब में दलित आबादी 33 फीसदी के करीब है। एक बार मुख्यमंत्री बन जाने के कारण चन्नी की पहचान बड़े नेता की हो गई है। लेकिन मुश्किल यह है कि पंजाब में मजहबी दलित और हिंदू दलित का बहुत साफ विभाजन है। यही कारण है कि कांशीराम पंजाब के प्रयोग में कामयाब नहीं हुए थे। दूसरी बात यह है कि दोनों समुदाय के दलित अलग अलग पार्टियों में बंटे हुए हैं। ऐसे में अगर चन्नी कुछ वोट अपने साथ जोड़ते भी हैं तो उनसे सीटों का कोई फायदा नहीं होगा। इसलिए कहा जा रहा है कि वे कांग्रेस पर दबाव बनाने की राजनीति कर रहे हैं ताकि कांग्रेस उनको मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर दे। लेकिन कांग्रेस इस बार ऐसा नहीं करने जा रही है। अगर ऐसा नहीं होता है तो चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष के नाते चन्नी अपने ज्यादा से ज्यादा लोगों को टिकट दिलाने का प्रयास करेंगे।


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