विपक्ष को मनोवैज्ञानिक बढ़त

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केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी दोनों को अंदाजा रहा होगा कि संविधान संशोधन का विधेयक पास नहीं होगा। फिर भी उसे पेश किया गया ताकि विपक्ष को महिला विरोधी ठहराया जाए। तीन दिन में सरकार ने यही काम किया। इसका ज्यादा मैसेज पश्चिम बंगाल में देना था, जहां भाजपा का मुकाबला तृणमूल कांग्रेस से है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का मुकाबला ममता बनर्जी से है। पश्चिम बंगाल की संस्कृति मातृ पूजा वाली है। वहां शक्ति की पूजा होती है और ममता बनर्जी भी मातृ शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसलिए भाजपा को किसी ऐसे एजेंडे की जरुरत थी, जिससे वह प्रधानमंत्री मोदी को महिलाओं के हितैषी के तौर पर पेश कर सके। वह मौका उसे महिला आरक्षण के जरिए मिल सकता था। तभी सरकार ने आनन फानन में महिला आरक्षण का मुद्दा आगे किया। उसके साथ परिसीमन भी जुड़ा था और इसलिए सरकार को पता था कि यह पास नहीं होगा।

सो, कह सकते हैं कि भाजपा ने एक एजेंडा हासिल कर लिया है। वह अब प्रधानमंत्री मोदी को महिला हितैषी कह कर प्रचारित करेगी और ममता बनर्जी को महिला विरोधी बताया जाएगा। लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि भले सरकार जानती थी कि हारेंगे लेकिन इससे विपक्ष को घेरने के चक्कर में सरकार भी तो घिर गई है। अगर यह मैसेज बनता है कि जानते बूझते हारे हैं तो फिर महिला हितैषी कैसे माने जाएंगे। दूसरी बात यह है कि हार का एक मनोवैज्ञानिक असर भी होगा। भाजपा कार्यकर्ताओं पर भी इसका असर होगा और विपक्ष पर भी होगा। कह सकते हैं कि विपक्ष को मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल हो गई। नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने कोई बिल पेश किया, जिसे विपक्ष ने पास होने दिया और संसद में हरा दिया इसका नैरेटिव बहुत बड़ा है। कई दशक के बाद संसद में कोई भी सरकार हारी है। इससे पहले गठबंधन की सरकारें में भी सरकारी बिल पास हो जाते थे। विपक्ष ने ऑलरेडी इसका जश्न मनाना शुरू कर दिया है। यह धारणा बनाई जा रही है कि न तो मोदी का करिश्मा चल रहा है और न अमित शाह का प्रबंधन। इसका असर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु दोनों राज्यों में होगा।


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