अगले साल दो चरण में सात राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। पहले चरण में फरवरी और मार्च में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में चुनाव हैं और उसके बाद साल के अंत में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होंगे। इन सात राज्यों में अरविंद केजरीवाल की बड़ी भूमिका होने वाली है। तभी कांग्रेस का चिंतित होना अनायास नहीं है। दिल्ली की विशेष अदालत से शराब नीति घोटाले का केस खारिज किए जाने और केजरीवाल को जमानत दिए जाने के बाद आम आदमी पार्टी को संजीवनी मिली है। एक बार फिर केजरीवाल और आप के पूरी ताकत से लड़ने और आम लोगों के बीच जगह बनाने का मौका मिला है। इसका पहला असर अगले साल होने वाले चुनावों में दिखेगा। यह भी दिलचस्प है कि अगले साल के सभी चुनावों में केजरीवाल की पार्टी कांग्रेस को नुकसान कर सकती है।
गौरतलब है कि दिल्ली के बाद केजरीवाल का सबसे ज्यादा फोकस पंजाब पर था। तभी 2017 में आंशिक और 2022 में पूर्ण कामयाबी मिली। आप ने कांग्रेस को हरा कर सरकार बनाई। अभी आप की सरकार पंजाब में अलोकप्रिय हो रही थी। परंतु केजरीवाल की रिहाई ने खेल बदल दिया है। इससे कांग्रेस के वापसी करने की संभावना पर ग्रहण लगा है। असल में भाजपा को लग रहा है कि सिख उसको वोट नहीं करेंगे और अकाली दल को हिंदू वोट नहीं करेंगे। तभी कांग्रेस जीते उससे बेहतर है कि आम आदमी पार्टी जीत जाए। ऐसे ही पिछले चुनाव में गोवा में केजरीवाल और ममता बनर्जी की पार्टी ने इतना वोट काटा कि कांग्रेस तमाम अच्छी संभावनाओं के बावजूद जीत नहीं पाई। गोवा में आप को करीब सात फीसदी वोट मिले थे। गुजरात में तो केजरीवाल की पार्टी ने 13 फीसदी वोट मिले। यह पूरा वोटट कांग्रेस का था। इसकी नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी भी नहीं बन पाई। पिछले दिनों विसावदर सीट पर हुए उपचुनाव में भी आप ने जीत हासिल की और कांग्रेस तीसरे स्थान पर रही। सो, दिल्ली के बाहर जिन तीन राज्यों में आप और केजरीवाल का असर है वहां अगले साल चुनाव है। इसलिए कांग्रेस की चिंता बढ़ी है।
