प्रशांत किशोर की दोहरी रणनीति

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जन सुराज पार्टी के संस्थापक और चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर बिहार का मैदान नहीं छोड़ रहे हैं। लेकिन वे दोहरी रणनीति पर काम कर रहे हैं। एक रणनीति अपनी और अपनी पार्टी की प्रासंगिकता बनाए रखने की है। उनको पता है कि अगर वे प्रासंगिक बने रहेंगे और जमीनी राजनीति करके बिहार का मुद्दा उठाते रहेंगे तो गठबंधन की मौजूदा राजनीति में जगह बनाने में आसानी होगी। उनको पता है कि बिहार की राजनीति अभी निकट भविष्य में दो ध्रुवीय नहीं होने वाली है। भाजपा और कांग्रेस के साथ साथ दोनों प्रादेशिक पार्टियां राजद और जदयू की मजबूती कायम रहने वाली है। तीनों कम्युनिस्ट पार्टियों का भी अलग अलग इलाकों में मजबूत आधार है। इनके अलावा लोजपा, हम, रोलोमो जैसी कई पार्टियां हैं, जिनका आधार है।

ऐसे बंटे हुए राजनीतिक स्पेस में एक नई पार्टी के स्वतंत्र रूप से राजनीति करने सफल होने की संभावना कम रहती है। लेकिन किसी एक या कई पार्टियों के साथ मिल कर मजबूत राजनीतिक विकल्प तैयार करने की संभावना हमेशा रहती है। नीतीश कुमार ने यही काम भाजपा के साथ मिल कर किया। 1995 में 324 सदस्यों की विधानसभा में सिर्फ पांच सीट जीतने के बाद भी नीतीश जमीन पर डटे रहे थे। उसी तरह प्रशांत किशोर भी जमीन पर डटे हैं और अब उन्होंने बिहार नवनिर्माण यात्रा शुरू की है। उन्होंने कहा है कि अगर सरकार महिलाओं को उद्यमी योजना के तहत दो दो लाख रुपए नहीं देती है तो वे आंदोलन करेंगे। उनकी दूसरी रणनीति कांग्रेस और जनता दल यू दोनों से बात करने की है। बताया जा रहा है कि वे नीतीश की पार्टी के नेताओं के संपर्क में हैं। उनकी पार्टी के आरसीपी सिंह अलग प्रयास कर रहे हैं और पीके का प्रयास अलग चल रहा है। जमीनी राजनीति और जदयू में विलय दोनों की राजनीति एक साथ!


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