बंगाल में क्या टल सकता है चुनाव?

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पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव को लेकर दो तरह की आशंका कई महीनों से जताई जा रही है। पहली आशंका तो यह है कि राज्य में किसी न किसी कारण से राष्ट्रपति शासन लगाया जाएगा क्योंकि भाजपा को ऐसा अहसास हो गया है कि ममता बनर्जी का शासन रहते हुए वह बंगाल नहीं जीत सकती है। दूसरी आशंका चुनाव टलने की थी। यह भी हालांकि पहली आशंका से जुड़ी ही है। किसी न किसी तरह से राष्ट्रपति शासन लगाने की आशंका के पीछे एक कारण चुनाव टलना भी था। कई जानकार बता रहे थे कि या तो किसी बहाने चुनाव आगे बढ़ा कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाएगा या कानून व्यवस्था का मुद्दा बना कर राष्ट्रपति शासन लगेगा। कानून व्यवस्था का मामला पिछले दिनों आया था, जब ईडी ने तृणमूल कांग्रेस का चुनाव प्रबंधन कर रही कंपनी आईपैक के प्रमुख प्रतीक जैन के यहां छापा मारा था और ममता बनर्जी वहां ईडी के अधिकारियों से कागजात छीनने पहुंच गई थी। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी की सरकार को नोटिस दिया है। मामला अब भी अदालत में है।

इस बीच चुनाव टलने की संभावना बढ़ने लगी है। हालांकि अभी पक्के तौर पर यह नहीं कहा जा सकता है कि चुनाव टल जाएगा लेकिन हालात ऐसे बन रहे हैं। कई फैक्टर मिल कर ऐसे हालात बना रहे हैं। हो सकता है कि इसके पीछे पूरा डिजाइन हो। ध्यान रहे पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण यानी एसआईआर का काम लगातार आगे बढ़ रहा है। बिहार में भी लगभग उतने ही मतदाता हैं, जितने बंगाल में हैं। लेकिन बिहार में ऐसा कोई विवाद नहीं हुआ, जैसा बंगाल में हो रहा है। बंगाल में एसआईआर में नाम तो 58 लाख ही कटे लेकिन उसके बाद 32 लाख अनमैप्ट वोटर्स को नोटिस गया और करीब सवा करोड़ लोगों को लॉडिकल डिस्क्रिपेंसीज का नोटिस गया। अब सुप्रीम कोर्ट ने इन सवा करोड़ लोगों को 10 दिन का समय और दिया है कि वे अपने जरूरी दस्तावेज जमा कराएं। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद चुनाव आयोग ने कहा है कि अब 14 फरवरी तक अंतिम मतदाता सूची जारी करना संभव नहीं लग रहा है।

अब सवाल है कि अगर मतदाता सूची समय से तैयार नहीं हुई तो क्या होगा? फिर निश्चित रूप से चुनाव टलेगा। आगे मुश्किल यह है कि सवा करोड़ लोगों के नाम की लॉजिकल डिस्क्रिपेंसीज इतनी जल्दी ठीक नहीं हो सकती है। इसमें यह भी मुश्किल है कि अगर लोगों के दस्तावेज में भी वह गड़बड़ी हुई, जो मतदाता सूची में है फिर उनको अपने दस्तावेजों में सुधार कराना होगा, जो इतनी जल्दी संभव नहीं होगा। ऐसे में क्या उनके नाम कटेंगे? यह बड़ा सवाल है। ध्यान रहे बिहार में कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बताया कि मतदाता सूची में 93 लाख लॉजिकल डिस्क्रिपेंसीज हैं। लेकिन इसके लिए नोटिस जाने या इन्हें ठीक करके अंतिम मतदाता सूची जारी करने की सूचना नहीं है। यह बंगाल में ही हो रहा है। असल में एल्गोरिदम आधारित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाले टूल्स का इस्तेमाल चुनाव आयोग कर रहा है, यांत्रिक तरीके से गड़बड़ियां पकड़ रहा है। एक जैसे अगर छह नाम दिख जा रहे हैं तो उनको नोटिस चला जा रहा है। मशीन यह मान ले रही है ये सब भाई बहन हैं या एक ही परिवार के लोग हैं। नाम की मामूली भिन्नता या उपनाम की भिन्नता जैसी बातों के लिए नोटिस भेजे गए हैं। तभी ऐसा लग रहा है कि या तो बड़ी संख्या में लोगों के नाम कटेंग या समय और बढ़ाना होगा। सवाल है कि अगर समय बढ़ा तो क्या मार्च में चुनाव की घोषणा से पहले तक आय़ोग अंतिम मतदाता सूची बना पाएगा? ध्यान रहे मार्च में पांच राज्यों पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, पुडुचेरी और केरल में विधानसभा चुनाव की घोषणा होनी है।


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