ममता से टकराव कहां तक जाएगा?

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वैसे पश्चिम बंगाल में भाजपा ने स्थायी टकराव बनाया है। उसके नेता शुभेंदु अधिकारी लगातार ममता बनर्जी की सरकार और उनकी पार्टी के खिलाफ लड़ते रहते हैं। य़ह ममता बनर्जी वाली राजनीति का ही विस्तार है। उन्होंने इसी तरह लेफ्ट शासन के खिलाफ लगातार आंदोलन किया था। लेकिन पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने ममता के खिलाफ टकराव बढ़ा दिया है। उनकी पार्टी के लिए चुनाव प्रबंधन का काम संभालने वाली एजेंसी आईपैक के कार्यालय और उससे जुड़े लोगों के घरों पर ईडी की छापेमारी ने ममता बनर्जी को मौका दिया कि वे भाजपा के खिलाफ सड़क पर उतरें। वे एसआईआर के खिलाफ भी सड़क पर आंदोलन कर रही हैं और मनरेगा की जगह जी राम जी बिल लाने के खिलाफ भी आंदोलन किया। लेकिन वह मुद्दों पर आधारित आंदोलन था और यह निजी मामला बन गया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि भाजपा उनके चुनाव प्रबंधन के राज जानना चाहती है इसलिए छापा मारा गया है। सो, यह सरकार की नीतियों का नहीं पार्टियों की नीति का मामला बन गया है।

लेकिन सवाल है कि केंद्र सरकार इस टकराव को कहां तक ले जाएगी? ममता बनर्जी ने जिस तरह से ईडी के अधिकारियों से जब्त दस्तावेज और इलेक्ट्रोनिक इविडेंस वगैरह छीने हैं वह अप्रत्याशित है। हालांकि पहले भी वे अपने नेताओं के छुड़ाने सीबीआई कार्यालय तक जा चुकी हैं। यह एक तरह से उस टकराव का विस्तार है। लेकिन क्या पहले की तरह इसे भी यूं ही जाने दिया जाएगा? क्या ईडी के छापे का मकसद इतना भर था कि ममता बनर्जी की पार्टी पर भ्रष्टाचार के आरोपों को पुख्ता किया जाए? या इस छापे और ममता बनर्जी की उग्र व्यवहार को लेकर कोई कानूनी, संवैधानिक पहल होगी? ईडी अगर आधिकारिक रूप से शिकायत दर्ज करे और राज्यपाल रिपोर्ट भेजें तो क्या केंद्र सरकार कोई कार्रवाई कर सकती है? क्या राष्ट्रपति शासन लग सकता है या ममता बनर्जी के खिलाफ निजी तौर पर मुकदमा शुरू हो सकता है, जिससे आगे उनको चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित किया जाए? अगले कुछ दिन में यह सब साफ होगा।


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