चुनाव आयोग के काम भी तो ऐसे हैं!

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जब से ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने चुनाव आयोग के अंदर की खींचतान और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मनमानियों की खबर छापी है तब से एक बड़ी जमात ऐसी है, जिसको संवैधानिक संस्था की साख की चिंता सताने लगी है। लेकिन सवाल है कि क्या किसी अखबार ने या किसी विपक्षी राजनीतिक दल ने चुनाव आयोग या किसी अन्य संवैधानिक संस्था की साख खराब की है? चुनाव आयोग ने अपनी साख तो खुद ही खराब की है। उसके काम ऐसे हैं, जिनसे उसकी मंशा पर सवाल खड़े होते हैं। यह सिर्फ एसआईआर का मामला नहीं है। चाहे आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में कार्रवाई करने का मामला हो या दलबदल के मामले में फैसला देना हो या चुनाव चिन्ह आवंटित करना हो, सबमें चुनाव आयोगी की पक्षधरता भाजपा के साथ दिखाई देती है। इसलिए उसकी साख पर चौतरफा सवाल खड़े हो रहे हैं।

ताजा मामला पश्चिम बंगाल का है, जहां कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा है कि वह ‘फेडअप’ हो गया चुनाव आयोग के रवैए से। सोचें, ऐसा क्या काम कर दिया चुनाव आयोग ने कि हाई कोर्ट के कहना पड़ा कि ‘फेडअप’ हो गए! असल में पश्चिम बंगाल की दो विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हो रहा है। नंदीग्राम और रेजीनगर में। भाजपा को पता है कि रेजीनगर जीतना संभव नहीं है इसलिए सारी ताकत नंदीग्राम पर है, जो मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की पारंपरिक सीट है। इस सीट से नामांकन की प्रक्रिया खत्म होने से पहले चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस का नाम और चुनाव चिन्ह फ्रीज कर दिया और दोनों ध़ड़ों यानी ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी के खेमे को अलग अलग चुनाव चिन्ह आवंटित किया। ममता बनर्जी खेमे को फुटबॉल खेलता हुआ खिलाड़ी और ऋतब्रत बनर्जी को लिफाफा चुनाव चिन्ह आवंटित किया गया। इसी मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग पर टिप्पणी की। असल में लिफाफा चुनाव चिन्ह पहले से इंडियन सेकुलर फ्रंट यानी आईएसएफ को मिला हुआ है। उसी ने चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती दी।

अब सोचें, एक पार्टी प्रदेश में हैं, जिसने पिछली बार कांग्रेस और लेफ्ट से अलायंस करके चुनाव लड़ा था और उस पार्टी के एक विधायक भी हैं, नौशाद सिद्दीकी। उस पार्टी को लिफाफा चुनाव चिन्ह मिला हुआ है। चुनाव आयोग ने वही चिन्ह ममता बनर्जी की पार्टी से दलबदल करके अलग गुट बनाने वाले ऋतब्रत बनर्जी की पार्टी को आवंटित कर दिया। इसका सीधा मकसद यह है कि नंदीग्राम में मतदाता कंफ्यूज हों और थोड़े से ही सही लेकिन मुस्लिम मतदाता लिफाफा देख कर ऋतब्रत बनर्जी को वोट कर दें। इसका सीधा फायदा भाजपा को होगा। सोचें, पहले ममता बनर्जी की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे से मुख्यमंत्री ने खुद मुलाकात की और उनको मैदान से हटाया। फिर जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन दिया तो उनको पुलिस ने 20 साल पुराने मामले में गिरफ्तार कर लिया और फिर चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के एक गुट को लिफाफा चुनाव चिन्ह दे दिया। सोचें, एक उपचुनाव जीतने के लिए क्या क्या किया जा रहा है! बहरहाल, इस मामले की सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट ने नाराजगी जताई और तीखी टिप्पणी की। जस्टिस कृष्णा राव ने कहा कि वे थक गए हैं चुनाव आयोग के इस रवैए से। जैसे ही कोई चुनाव आता है आयोग विवाद खड़ा करने वाला फैसला कर देता है। अदालत ने कहा कि 189 संभावित चुनाव चिन्ह थे, जिसमें से आयोग ने चुन कर लिफाफा चुनाव चिन्ह ऋतब्रत बनर्जी को दे दिया। हाई कोर्ट की इस टिप्पणी आयोग के पक्षपात का एक पुख्ता सबूत है।


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