तभी अमेरिकी लोकतंत्र है बेजोड़ निर्भयता-बुद्धि का असली विश्वगुरु

Categorized as हरिशंकर व्यास कालम

देश-सभ्यता विशेष को व्यक्ति विशेष कितना तबाह कर देता है और संविधान, सुप्रीम कोर्ट कैसे देश बचाने की ढाल बनते हैं, इसका प्रमाण आज अमेरिका है। उस नाते अमेरिका के ढाई सौ साल और भारत की स्वतंत्रता, संविधान के आठ दशकों का क्या फर्क है? भारत ने कुछ ही दशकों में संविधान से सरकार को ‘हम भारत के लोग’ का माईबाप बना दिया। संस्थाएं बिना रीढ़ की हो गईं। नतीजतन 140 करोड़ लोग खैरात से भय, भूख, भक्ति की जिंदगी जी रहे हैं।

ठीक विपरीत ढाई सौ साल पुराने अमेरिकी संविधान को खंगालें तो एकमात्र डोनाल्ड ट्रंप वह राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने संविधान-संस्थाओं को बेशर्मी से ठेंगा दिखाया। संविधान के एक आपातकालीन प्रावधान के हवाले टैरिफ के वे मनमाने फरमान निकाले, जिससे दुनिया में त्राहिमाम हुआ। पर अमेरिका के नागरिकों ने ही इस मनमानी को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी! और सुप्रीम कोर्ट के छह जजों ने (तीन विरोध में) बहुमत से दो टूक यह फैसला दिया, ट्रंप के टैरिफ अवैध हैं! दुनिया में कितने ऐसे सुप्रीम कोर्ट हैं, जिनके जजों में ऐसी रीढ़ की हड्डी है? ट्रंप ने भी पिछले कार्यकाल में अपने जज नियुक्त किए थे। उनमें से भी राष्ट्रपति के फैसलों को अवैध करार देने वाले जज थे। चीफ जस्टिस सहित सभी नौ जजों ने जांच-तौल (checks & balances) में लिखे गए प्रावधानों की व्याख्या तर्कों के साथ की और साफ बहुमत से ट्रंप के फैसलों को अवैध करार दिया।

ट्रंप का बौखलाना स्वाभाविक था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और जजों के खिलाफ विदेशी प्रभाव से लेकर कुत्ते जैसे जुमलों तक से हमला किया। और यह भी अमेरिकी संविधान की इस बुनियाद पर है कि नागरिक का मूलभूत अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता में कुछ भी कहने, यानी उसकी अभिव्यक्ति की आजादी का अबाध हक है। राष्ट्रपति डराएं, धमकाएं, कार्यपालिका को मनमाफिक चलाएं, सुप्रीम कोर्ट का जज न डरेगा, न चिंता करेगा। वह संविधान के प्रति प्रतिबद्धता में वही फैसला देगा जो संविधान का सत्य है और उसकी जो समझ या व्याख्या है।

सरकार या राष्ट्रपति से डरना, या कानून मंत्रियों की दखलंदाजी का अमेरिकी न्यायपालिका में कोई अर्थ नहीं है। न्यायपालिका की वैसी ही पृथक सत्ता है जैसी विधायिका-संसद की अपनी पृथक स्वतंत्रता है, तो बतौर कार्यपालिका के प्रमुख राष्ट्रपति का पावर भी पृथक और स्पष्ट है। तभी सुप्रीम कोर्ट ने संविधान-प्रदत्त आपातकालीन प्रावधानों के हवाले ट्रंप के टैरिफ अवैध करार दिए तो ट्रंप ने फटाफट अपने दूसरे अधिकार से 15 प्रतिशत टैरिफ का नया आदेश निकाला। पर इस आदेश के टैरिफ पांच महीने ही मान्य रहेंगे। फिर संसद जाना पड़ेगा। इस प्रावधान में टैरिफ लगाने की सीमा पंद्रह प्रतिशत ही है। जाहिर है, ऐसा करके ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट की परवाह न करने, मतलब अपने अहंकार को फिर दर्शाया।

इससे बदनामी, भद्द किसकी हो रही है? पूरी दुनिया और खासकर यूरोप के असल लोकतांत्रिक देशों में किसकी वाहवाही है? अमेरिका और अमेरिकी संविधान की। ट्रंप की नाराजगी की बिना चिंता किए वैश्विक मीडिया और नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सत्ता के संतुलन (separation of powers) की जीत बताया। मतलब कोर्ट ने कार्यपालिका (राष्ट्रपति) की सीमाओं को स्पष्टता से दर्शाया है कि अमेरिका में कोई भी शाखा अवैध रूप से अधिक शक्ति नहीं ले सकती। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने कहा, ‘लोकतंत्र में पावर काउंटरवेट्स (जांच-तौल) आवश्यक हैं’। कनाडा सरकार ने और हिम्मत दिखाई, ‘तो टैरिफ गैरकानूनी साबित’! और तो और ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के कई नेताओं ने संवैधानिक संतुलन (चेक-बैलेंस) के पक्ष में फैसला सटीक बताया।

सोचें, दुनिया ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कैसी राहत ली होगी? मन ही मन अमेरिका का कैसा मान बना होगा। आश्चर्य नहीं होगा यदि यूरोपीय संघ, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन आदि ट्रंप प्रशासन की दादागिरी में हुए व्यापार समझौते को खारिज करें या टाल दें। मंगलवार को ट्रंप संसद के साझा सत्र में ‘स्टेट ऑफ द यूनियन’ भाषण देंगे। उन्हें ठीक सामने बैठे सुप्रीम कोर्ट के जज भी सुनेंगे। संभव है यह मौका कुछ अनहोनी लिए हुए हो। नामुमकिन नहीं कि ट्रंप सामने बैठे जजों को भला-बुरा कहें। या उनके भक्त रिपब्लिकन सांसद बनाम डेमोक्रेटिक सांसदों में राजनीतिक भिड़ंत हो! राष्ट्रपति ट्रंप ने विधायिका यानी संसद पर भी दबिश बनाई हुई है। पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से संसद के ही टैरिफ अधिकारों की पुष्टि है, तो सांसदों पर राष्ट्रपति के भड़भड़िया भाषण का विशेष असर नहीं होगा। लेकिन हंगामा तो संभव है।

जो हो, मूल सवाल है– अमेरिका का ऐसा बेजोड़ होना किस कारण से है? मेरा मानना है एकमेव वजह अमेरिकी नींव, संविधान है। और ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि अमेरिका उन स्वतंत्रचेता मनुष्यों से निर्मित है जिनकी मूल वृत्ति (बेसिक इंस्टिंक्ट) आकाश में उड़ने, स्वतंत्रता से जीने तथा मन का कुछ करने का लक्ष्य होता है। तभी दुनिया भर के और स्वतंत्रता के बाद भारत के भी पढ़े-लिखे, पुरुषार्थी लोग सर्वाधिक अमेरिका गए। सभी अमेरिका के परिवेश में अपने अवसर मानकर गए। इस ललक के साथ कि वे कुछ बनें, खिलें और जिंदगी संतोष, सुरक्षा, स्वाभिमान से जिएं। सवाल है, क्यों अमेरिका में यह ज्यादा संभव है? इसलिए क्योंकि सरकार, कार्यपालिका, अफसर-बाबुओं का जिंदगी में न्यूनतम दखल है (ट्रंप ने इसे भयावह तौर पर बिगाड़ा है) और खुली सांस में जीना संभव है।

दूसरे शब्दों में अमेरिका जहां सौ फूल खिलने का सांस्कृतिक आधार लिए हुए है, तो उस गरुड़-बाज मानसिकता का वह परिवेश भी है जिसमें बुद्धि, मेहनत, जोखिम और पूंजी के बूते असंभव को संभव बनाना आम व्यक्ति के लिए भी मुमकिन है। हकीकत है कि कोलंबस ने अमेरिका खोजा तो उसके बाद 17वीं सदी में इंग्लैंड, नीदरलैंड, स्पेन, फ्रांस आदि से लोग धार्मिक उत्पीड़न, कराधान और सामंती नियंत्रण से मुक्ति के लिए अमेरिका गए। तब समुद्री यात्रा की जोखिमों से पार पाकर जो भी अमेरिका पहुंचा, वह दुस्साहसी पुरुषार्थी था। सभी में यह जिद थी कि हमें कुछ बनना है, बनकर दिखाना है और जो भुगता है उसे नई दुनिया में नहीं पनपने देना है।

हां, मूल यूरोपीय विस्थापितों ने ही अपने आपको नई दुनिया कहा या माना, तो वजह यूरोप के तब के हालातों से तौबा थी। इसलिए नई दुनिया में किसी की अधीनता नहीं। हर नागरिक बंदूक रखकर रक्षा का अधिकारी। हमारा कोई मालिक नहीं। हम स्वयंभू अपने मालिक हैं। तभी इतिहास में यह तथ्य दर्ज है कि 1620 में मेफ्लावर से आए तीर्थयात्रियों ने अपना एक लिखित अनुबंध (Mayflower Compact) बनाया, जो स्वशासन यानी आत्म-शासन की शुरुआती मिसाल था। इसी कारण 1787 का संविधान बना तो वह मात्र शासन का दस्तावेज नहीं था, बल्कि राजा, सामंत, राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री आदि की सत्ता से भयमुक्ति का दस्तावेज भी था। मतलब नई दुनिया में वह कुछ नहीं होगा जो 17वीं सदी में इंग्लैंड, नीदरलैंड, स्पेन, फ्रांस आदि के सामंती शासनों में था।

इसलिए अमेरिका की खोज, ‘नई दुनिया’ का निर्माण, वह मानसिक खोज भी थी, जिससे मनुष्य ने स्वतंत्रता की गारंटी सुनिश्चित की। स्वशासन बनाया। संविधान निर्माताओं ने अपनी ‘नई दुनिया’ को ऐसी संस्थाओं से गूंथा, जिनका प्राथमिक काम एक-दूसरे पर निगरानी रखना और नागरिकों का स्वतंत्र जीवन सुनिश्चित बनाए रखना है। इसलिए वहां विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका की एक-दूसरे पर निर्भरता नहीं है, बल्कि पृथकता से एक-दूसरे पर निगरानी, चेक-बैलेंस के पुख्ता ढांचे में ढली हुई है।

हमें अंदाज नहीं है कि अमेरिका की संघीय व्यवस्था में एक स्टेट, उसका गवर्नर, उसका मेयर कितना स्वयंभू और शक्तिशाली होता है, तो विधायिका, स्टेट न्यायपालिका कितनी सशक्त है। और विकेंद्रीकृत व्यवस्था में राष्ट्रपति ट्रंप का अर्थ केंद्रीय सरकार, अंतरराष्ट्रीय संबंधों का वह महाबली है, जिससे दुनिया कंपकंपाए, पर अमेरिकी नागरिक नहीं खौफ खाता। इसलिए क्योंकि अमेरिका में संविधान का चेक-बैलेंस काम करता हुआ है। और संविधान क्यों? जेम्स मेडिसन का एक अच्छा वाक्य है, “यदि मनुष्य देवदूत होते, तो किसी सरकार की आवश्यकता ही न होती”। पर क्योंकि मनुष्य पूर्ण, निष्कपट या निष्पाप नहीं है, पशुगत अहंकारी वृत्ति-प्रवृत्ति का मारा है, तो समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए शासन और संस्थाओं की आवश्यकता है। और यदि इस सबका केंद्र एक व्यक्ति बन जाए, तो वह वैसे ही लोगों को, देश-दुनिया को हांकेगा जैसे डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले एक वर्ष में दुनिया को हांका है।


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