रेंटियर अर्थव्यवस्था में, जिनके पास रियल एस्टेट या वित्तीय संपत्तियां हैं, उनकी आमदनी तेजी से बढ़ती है, जबकि श्रम आधारित तबकों के लिए अवसर सिकुड़ते हैँ। भारत में फिलहाल यही हो रहा है।
भारत का कॉरपोरेट सेक्टर अब मुनाफे के लिए औद्योगिक या कारोबारी कार्यों पर निर्भर नहीं रह गया है। बल्कि उसका ध्यान उन माध्यमों में निवेश करने पर ज्यादा है, जिन्हें ‘रेंटियर’ अर्थव्यवस्था (किराया/ ब्याज, शेयर बाजार लाभांश, ब्याज, सट्टा बाजार) का हिस्सा माना जाता है। एक अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित आय कर रिटर्न के 2012-13 से 2023-24 तक के आंकड़ों के विश्लेषण से जाहिर हुआ है कि इस अवधि में कॉरपोरेट सेक्टर की व्यावसायिक गतिविधियों से कुल कर-योग्य आय 57.3 प्रतिशत से गिरकर 54.8 फीसदी हो गई, जबकि उनकी आमदनी में ‘रेंटियर’ आय (दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ, लाभांश, ब्याज) का हिस्सा बढ़ कर 45.2 प्रतिशत हो गया।
2012-13 से 2023-24 के बीच रेंटियर आय औद्योगिक आय की तुलना में चार गुना तेजी से बढ़ी है। सालाना एक करोड़ रुपये से अधिक कमाने वाले व्यक्तियों की आय में भी रेंटियर निवेश से हुई आमदनी का का अनुपात तेजी से बढ़ रहा है। इस रुझान पर ध्यान दें, तो ये बात साफ हो जाती है कि केंद्रीय मंत्रियों के बार-बार फटकार लगाने के बावजूद उत्पादक कार्यों में निजी निवेश क्यों नहीं बढ़ा है। ऐसा ना होने के कारण अच्छा जीवन स्तर दे सकने वाले रोजगार पर्याप्त संख्या में पैदा नहीं हो रहे हैं। इस समस्या को समझते हुए ही भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने हाल में कहा था कि भारतीय अर्थव्यवस्था का समय से पहले (प्री-मैच्योर) वित्तीयकरण हो गया।
इसका परिणाम हुआ है कि कंपनियां ऐसे निवेश को तरजीह देने लगीं, जिनमें मेहनत और जोखिम कम है। हालांकि इससे कंपनियों के सामने कमाई के अस्थिर हो जाने की समस्या भी आई है। उनका बाजार मूल्य शेयर बाजार के रुझानों और विदेशी वित्तीय घटनाओं से प्रभावित होने लगा है। लेकिन मोटे तौर पर यह उनके लिए फायदेमंद रहा है। जबकि इसका आम आर्थिक प्रभाव हानिकारक साबित हो रहा है। अर्थव्यवस्था के इस स्वरूप में, जिनके पास रियल एस्टेट या वित्तीय संपत्तियां हैं, उनकी आमदनी तेजी से बढ़ती है, जबकि श्रम आधारित तबकों के लिए अवसर सिकुड़ते हैँ। इससे गैर-बराबरी बढ़ी है। इन सबके राजनीतिक एवं सामाजिक परिणाम अब जाहिर हो रहे हैँ।
