तालिबान का ऐसा रुतबा!

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मुत्ताकी ऐसी सरकार के विदेश मंत्री हैं, जिसे आज भी ज्यादातर देशों की मान्यता हासिल नहीं है। वे अपने देश के कायदे यहां लागू करना चाहें और कामयाब हो जाएं, तो उस पर आक्रोश ही जताया जा सकता है!

यह अपने वर्तमान और भारत की विदेश नीति पर एक प्रतिकूल टिप्पणी है। संभवतः अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के विदेश मंत्री आमिर मुत्ताकी ने इच्छा जताई कि नई दिल्ली में उनकी प्रेस कांफ्रेंस में महिला पत्रकारों को ना बुलाया जाए और भारत सरकार ने उसे पूरा किया! मुत्ताकी ऐसी सरकार के विदेश मंत्री हैं, जिसे आज भी ज्यादातर देशों की मान्यता हासिल नहीं है। वे अपने देश के ‘तालिबानी’ कायदे नई दिल्ली में लागू करना चाहें और उसमें कामयाब हो जाएं, तो उस पर आक्रोश जताने के अलावा और क्या किया जा सकता है! फिर देवबंद यात्रा के दौरान मुत्ताकी को देखने के लिए जिस तरह हजारों का हुजूम उमड़ पड़ा, वह भी कोई कम अफसोसनाक नज़ारा नहीं था।

वहां आए लोग टीवी रिपोर्टरों से कहते सुने गए कि मुत्ताकी वह हस्ती हैं, जिनके संगठन ने दुनिया की दो महाशक्तियों (सोवियत संघ और अमेरिका) को पराजित कर दिया। उनके इस मॉडल की कभी यहां भी जरूरत पड़ सकती है (अगर किसी विदेश ताकत ने हम पर हमला किया तो)। उधर नई दिल्ली की प्रेस कांफ्रेंस में मुत्ताकी भारत को यह सलाह दे गए कि वह अटारी- वाघा बॉर्डर को राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक नजरिए से देखे और उसे खोल दे, क्योंकि भारत- अफगानिस्तान के बीच व्यापार का वह सबसे छोटा रास्ता है। इसी तरह उन्होंने कहा कि भारत और अफगानिस्तान को मिल कर चाबहार बंदरगाह के विकास के रास्ते की रुकावटें दूर करनी चाहिए और इसके लिए दोनों को मिल कर अमेरिका और ईरान से बात करनी चाहिए।

मौजूदा भारतीय विदेश नीति के नजरिए से ये बातें कहां फिट बैठती हैं, इस सहज समझा जा सकता है। यह भी उल्लेखनीय है कि मुत्ताकी की यात्रा से ठीक पहले भारत ने मॉस्को कंसल्टेशन ग्रुप के उस साझा बयान पर दस्तखत किया, जिसमें बागराम एयरपोर्ट को फिर से अमेरिकी कब्जे में लेने के डॉनल्ड ट्रंप के इरादे को अस्वीकार किया गया है। तालिबान सरकार पर भारत इतना मेहरबान क्यों है, इसे समझना आसान नहीं है। बेशक अफगानिस्तान में भारत के रणनीति हित हैं, लेकिन क्या उन्हें उन्हें साधने की शर्त तालिबान की इस हद तक मिज़ाजपुर्सी है?


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