नागरिकता को निरंतर विवाद में रखना ठीक नहीं

भारत में ही नहीं, दुनिया में भी नागरिकता का मामला पिछले कुछ समय से विवादित होता जा रहा है। दुनिया के वैश्विक गांव बनने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रवासन बढ़ा साथ साथ देशों के अंदर गृहयुद्ध और युद्धों व आर्थिक हालात की वजह से भी प्रवासन में बढ़ोतरी हुई। तभी अमेरिका से लेकर यूरोप तक… Continue reading नागरिकता को निरंतर विवाद में रखना ठीक नहीं

मानसून सत्र संख्या पूरी करने की चुनौती

सरकार ने इस बार संसद का सत्र छोटा रखा है। आमतौर पर मानसून सत्र एक महीने का होता है, जो जुलाई के तीसरे हफ्ते से शुरू होकर अगस्त के तीसरे हफ्ते तक चलता है। इस बार संसद का मानसून सत्र स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त से दो दिन पहले समाप्त हो रहा है। तीन हफ्ते… Continue reading मानसून सत्र संख्या पूरी करने की चुनौती

ऐसे तो नहीं बहाल होगा विश्वास

अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का प्रबंधन संभाल रहे श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पास सोमवार, छह जून को एक मौका था कि वह करोड़ों हिंदू भक्तों का विश्वास जीतने की पहल करे। कायदे से यह पहल तो उसी समय हो जानी चाहिए थी, जब मंदिर के चढ़ावे में चोरी के आरोप लगे थे… Continue reading ऐसे तो नहीं बहाल होगा विश्वास

अमेरिका का मिड टर्म फॉर्मूला बेहतर विकल्प है

सरकार पूरी तरह से मन बनाए हुए है कि देश के सारे चुनाव एक साथ कराने हैं। इसके लिए पेश किए गए विधेयक पर पीपी चौधरी की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति विचार कर रही है। सरकार परिसीमन के मसले पर भी मन बनाए हुए है कि लोकसभा और विधानसभाओं की सीटें बढ़ानी है। इसके… Continue reading अमेरिका का मिड टर्म फॉर्मूला बेहतर विकल्प है

मानसून सत्र से बहुत कुछ बदलेगा

संसद के मानसून सत्र से सरकार बहुत कुछ बदलने जा रही है। संसद के अंदर विपक्ष का स्वरूप बदलना शुरू हो गया है। सत्र के दौरान यह और बदला हुआ दिखाई देगा। लेकिन उससे ज्यादा बड़ा बदलाव देश की संसदीय व्यवस्था में होने वाला है। सरकार अगर 130वां संविधान संशोधन विधेयक और अप्रैल के विशेष… Continue reading मानसून सत्र से बहुत कुछ बदलेगा

भारत में मुश्किल है दो दलीय व्यवस्था

हो सकता है कि यह कांग्रेस के कुछ नेताओं की सदिच्छा हो या यह भी हो सकता है कि कांग्रेस से ज्यादा भाजपा, मीडिया के एक हिस्से और राइटविंग इकोसिस्टम की सदिच्छा हो कि प्रादेशिक पार्टियां समाप्त हो जाएं। लेकिन ऐसा होने की संभावना नहीं दिख रही है। हां, यह जरूर है कि प्रादेशिक पार्टियों… Continue reading भारत में मुश्किल है दो दलीय व्यवस्था

जो दलबदलू हैं वो ‘बागी’ हो गए!

अलग अलग समय में हुए दुनिया के दो महान विचारकों ने विचारधारात्मक युद्ध में शब्द और भाषा के इस्तेमाल को लेकर बहुत कुछ लिखा है। पहले जॉर्ज ऑरवेल ने और फिर नोम चोमस्की ने। ऑरवेल ने अपने महान उपन्यास ‘नाइंटीन एटी फोर’ के अंत में ‘द प्रिंसिपल्स ऑफ न्यूस्पीक’ के बारे में लिखा है। इसमें… Continue reading जो दलबदलू हैं वो ‘बागी’ हो गए!

काठ की हांडी दोबारा नहीं चढ़ती

लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी नाम से एक सोशल मीडिया हैंडल स्थापित करके क्रांतिकारी बने अभिजीत दीपके काठ की हांडी दोबारा चढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। वांगचुक और दीपके वैसा ही जादू रचना चाहते हैं, जैसा 2011 में अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल ने रचा था। लेकिन वैसा मुमकिन… Continue reading काठ की हांडी दोबारा नहीं चढ़ती

पहचान या विचार पर आधारित दल नहीं टूटते

यह बड़ा वाजिब सवाल है कि कुछ पार्टियां सत्ता से बाहर होते ही क्यों टूट जाती हैं, जबकि कुछ पार्टियां लंबे समय तक सत्ता के बगैर रहने के बावजूद नहीं टूटती हैं और अगर टूटती भी हैं तो उससे अलग होने वाला समूह कामयाब नहीं हो पाता है? चार साल के अंदर उद्धव ठाकरे की… Continue reading पहचान या विचार पर आधारित दल नहीं टूटते

नेता नहीं होंगे पर समाजवाद का विचार रहेगा

एक एक करके समाजवादी नेता भारतीय राजनीति के क्षितिज से विदा होते जा रहे हैं। जेडीएस के संस्थापक, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और वास्तविक अर्थों में भारत के पहले एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर एचडी देवगौड़ा अब संसद में नहीं दिखेंगे। उनका कार्यकाल समाप्त हो गया है। भाजपा पर निर्भर उनकी पार्टी फिर से उनको राज्यसभा में… Continue reading नेता नहीं होंगे पर समाजवाद का विचार रहेगा

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