बढ़ रही है बंगाल की भूमिका

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चार मई को आए चुनाव नतीजे और उसके बाद के घटनाक्रम ने एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक फलक पर पश्चिम बंगाल के अपना गौरवशाली स्थान प्राप्त करने की संभावना को साकार कर दिया है। सबसे पहला बदलाव तो यह हुआ कि लगातार केंद्र से लड़ने वाली सरकारों की जगह बंगाल के लोगों ने केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की ही सरकार राज्य में भी चुनी। पांच दशक के बाद राज्य में ऐसी सरकार बनी, जो केंद्र के साथ कदम से कदम मिला कर चलने वाली है।

महज 115 साल पहले तक कोलकाता देश की राजधानी थी। देश के आर्थिक विकास, सामाजिक सुधार और राजनीतिक गतिविधियों में बंगाल की सबसे बड़ी भूमिका होती थी। दुर्भाग्य से पिछले 115 साल में धीरे धीरे बंगाल अपनी यह अग्रणी भूमिका गंवाता चला गया। मशहूर लेखक डोमिनिक लेपियर ने कोलकाता को ‘सिटी ऑफ जॉय’ कहा था। लेकिन उससे बहुत पहले जवाहरलाल नेहरू ने इसे ‘नाइटमेयर सिटी’ यानी ‘दुःस्वप्न शहर’ कहा था और 1985 में राजीव गांधी ने ‘डाइंग सिटी’ यानी ‘मरता हुई शहर’ कहा था। इसका अर्थ है कि अंग्रेजों के शासन से लेकर कांग्रेस और उसके बाद के शासन में पश्चिम बंगाल में किसी तरह का कोई सकारात्मक बदलाव नहीं हुआ। उलटे विरासत में मिलीं तमाम बेहतर चीजें खराब होती चली गईं।

यह वास्तविकता है कि आजादी के बाद धीरे धीरे देश के आर्थिक विकास में पश्चिम बंगाल की भूमिका नगण्य होती चली गई। सामाजिक बदलाव या सुधार वाली गतिविधियां पूरी तरह से ठप्प हो गईं और राष्ट्रीय राजनीति में पश्चिम बंगाल का स्थान बहुत मामूली रह गया। पिछले 50 साल से लगातार राज्य में ऐसी सरकार बन रही थी, जो केंद्र की सरकार की विरोधी होती थी या केंद्र के प्रति दुर्भावना के साथ काम करती थी। परंतु अब पश्चिम बंगाल में सब कुछ नाटकीय तरीके से बदलने लगा है।

चार मई को आए चुनाव नतीजे और उसके बाद के घटनाक्रम ने एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक फलक पर पश्चिम बंगाल के अपना गौरवशाली स्थान प्राप्त करने की संभावना को साकार कर दिया है। सबसे पहला बदलाव तो यह हुआ कि लगातार केंद्र से लड़ने वाली सरकारों की जगह बंगाल के लोगों ने केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की ही सरकार राज्य में भी चुनी। पांच दशक के बाद राज्य में ऐसी सरकार बनी, जो केंद्र के साथ कदम से कदम मिला कर चलने वाली है। भाजपा का चुनाव जीतना बहुत बड़ी बात थी। लेकिन उसके बाद भाजपा ने सुवेंदु अधिकारी को मुख्यमंत्री बना कर यह सुनिश्चित किया कि बंगाल की सरकार ज्यादा संकल्प और प्रतिबद्धता के साथ काम करे। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने सुवेंदु अधिकारी पर जो भरोसा दिखाया वे उस भरोसे की कसौटी पर पूरी तरह से खरा उतरे हैं। उन्होंने सरकार गठन के दो महीने के भीतर दशकों से लंबित सभी वैचारिक, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को सुलझाने की पहल कर दी। पिछले दो महीने में पश्चिम बंगाल में जो घटनाक्रम हुआ है उससे राष्ट्रीय राजनीति में बंगाल की भूमिका बहुत बड़ी हो गई है। अब राष्ट्रीय स्तर पर जो भी बड़ा फैसला होने वाला है उस फैसले में पश्चिम बंगाल भी एक भागीदार है।

चुनाव नतीजों के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में जो सबसे बड़ा घटनाक्रम हुआ है वह चुनाव हार कर सत्ता से बाहर हुई तृणमूल कांग्रेस के विभाजन का है। तृणमूल कांग्रेस के 28 में से 20 लोकसभा सांसद, 13 में से चार राज्यसभा सांसद और 80 में से 65 से ज्यादा विधायक पार्टी का साथ छोड़ चुके हैं। राज्यसभा और पार्टी से इस्तीफा देने वाले तीन पूर्व सांसद भाजपा की टिकट से चुनाव लड़ रहे हैं और निर्विरोध चुने जाएंगे, इससे उच्च सदन में भाजपा की संख्या 114 से बढ़ कर 117 पहुंच जाएगी। लोकसभा के 20 सांसद अब नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल हो गए हैं और यह पार्टी एनडीए में भाजपा के बाद दूसरा सबसे बड़ा घटक दल बन गई है। विधानसभा में 58 विधायकों के गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी बने, जिनको विधानसभा अध्यक्ष ने नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दी है। उनके साथ जुड़ने वाले विधायकों की संख्या अब 65 पहुंच गई है। उन्होंने चुनाव आयोग से मिल कर अपने गुट के लिए असली तृणमूल कांग्रेस की मान्यता देने की मांग की है। कोलकाता में पार्टी का मुख्यालय उनके नियंत्रण में है।

इस राजनीतिक घटनाक्रम का बड़ा असर देश की राजनीति पर देखने को मिल रहा है और आगे भी मिलेगा। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के 20 लोकसभा सांसदों के एनसीपीआई में शामिल होने और एनडीए को समर्थन देने से केंद्र सरकार की स्थिरता पहले से ज्यादा सुनिश्चित हुई है। पहले भी केंद्र की एनडीए सरकार 293 सांसदों के बहुमत से स्थिर थी। लेकिन उसमें 20 सांसदों के जुड़ने से एनडीए ने तीन सौ की मनोवैज्ञानिक सीमा पार की। इसके साथ ही तेलुगू देशम पार्टी और जनता दल यू दोनों एनडीए में दूसरे और तीसरे सबसे बड़े घटक दल की पोजिशन से खिसक कर नीचे चले गए। सभी पार्टियों के मोलभाव की क्षमता कम हुई। आने वाले दिनों में केंद्र की एनडीए सरकार अगर दो तिहाई बहुमत की ओर बढ़ रही है तो उसमें बड़ी भूमिका बंगाल की है। बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने सुनिश्चित किया कि बंगाल राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ी भूमिका निभाए। जो नेता तृणमूल कांग्रेस छोड़ कर गए हैं उन्होंने तो कहा ही, जो अभी तक ममता बनर्जी के साथ हैं उन्होंने भी सार्वजनिक रूप से कहा कि सुवेंदु अधिकारी के साथ उनके निजी संबंध बहुत अच्छे हैं। महुआ मोइत्रा जैसी नेता ने भी कहा कि जब उनको पहली बार विधानसभा की टिकट नहीं मिली तो सिर्फ सुवेंदु अधिकारी ने उनका साथ दिया था, सांत्वना दी थी और हिम्मत बढ़ाई थी। आज भी उनके साथ अच्छे संबंध हैं। जाहिर है सुवेंदु अधिकारी ने बंगाल की राजनीति में सक्रिय ज्यादातर नेताओं के साथ अच्छे संबंध रखे और उनकी मदद की, जिसकी वजह से उनके मुख्यमंत्री बनते ही तृणमूल कांग्रेस के सांसद और विधायक उनके साथ काम करने के लिए आगे आ गए।

आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीति में पश्चिम बंगाल की और भी प्रभावी भूमिका दिखेगी। इस बात की चर्चा है कि तृणमूल कांग्रेस के पास राज्यसभा में जो नौ सांसद बचे हैं उनमें से भी कई लोग पाला बदलने को तैयार हैं। ध्यान रहे बंगाल की तीन सीटों के उपचुनाव जीतने के बाद राज्यसभा में भाजपा के अपने 117 सांसद हो जाएंगे। इसके बाद पार्टी अकेले दम पर बहुमत से सिर्फ पांच सीट पीछे रहेगी। अगर तृणमूल कांग्रेस के कुछ और राज्यसभा सांसद सुवेंदु अधिकारी के प्रति सद्भाव के कारण साथ आते हैं तो राज्यसभा में भाजपा का अपना बहुमत होगा। इस तरह करीब साढ़े तीन दशक के बाद किसी पार्टी को राज्यसभा में अकेले बहुमत हासिल होगा और उसमें पश्चिम बंगाल की बड़ी होगी। राज्यसभा में भाजपा के पूर्ण बहुमत हासिल करते ही एनडीए दो तिहाई बहुमत के बिल्कुल करीब पहुंच जाएगा।

लोकसभा और राज्यसभा में एनडीए को दो तिहाई बहुमत होना इसलिए आवश्यक है क्योंकि सरकार देश की दशा और दिशा बदलने के लिए कई बेहद महत्वपूर्ण बिल संसद में पास कराना चाहती है। ये विधेयक ऐसे हैं, जिनसे देश की पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यापक बदलाव आने वाला है। केंद्र सरकार संविधान का 130वां संशोधन विधेयक अगले सत्र में ला सकती है, जिसमें यह प्रावधान किया गया है कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या केंद्र और राज्य का कोई भी मंत्री अगर लगातार 30 दिन तक जेल में रहता है तो स्वतः अपने पद से हट जाएगा। इसी तरह 131वां संशोधन विधेयक भी लाया जा सकता है, जिसमें महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने वाले नारी शक्ति वंदन अधिनियम में बदलाव किया जाएगा और उसमें से जनगणना व परिसीमन की शर्त हटाई जाएगी। इसके जरिए लोकसभा और विधानसभाओं की सीटें बढ़ेंगी और महिलाओं को आरक्षण मिलेगा। इसके अलावा सरकार ‘एक देश, एक चुनाव’ की योजना भी लागू करने पर विचार कर रही है। इसके लिए संविधान के कम से कम तीन अनुच्छेदों में बदलाव करना होगा। केंद्र सरकार अब यह सब करने में सफल होगी।

कह सकते हैं कि बंगाल में भाजपा का चुनाव जीतना और सुवेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री बनना न सिर्फ बंगाल के लिए, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के लिए एक अहम मुकाम है। इससे देश की राजनीति में बंगाल की मजबूत भूमिका स्थापित हुई है। इसका फायदा बंगाल के 10 करोड़ लोगों को मिलेगा। उम्मीद करनी चाहिए कि इससे राज्य का न सिर्फ सांस्कृतिक गौरव वापस लौटेगा, बल्कि आर्थिक विकास भी होगा और सामाजिक बदलावों में भी बंगाल की वैसी ही भूमिका फिर से बनेगी, जैसी एक सदी पहले या आजादी के आंदोलन के समय थी।   (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)


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