‘अल्फ़ा’: स्पाई यूनिवर्स में नायिका तो आ गई पर कहानी!

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आलिया भट्ट इस फ़िल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। उनके भीतर का अभिनेता लगातार संघर्ष करता दिखाई देता है। उनका शरीर भले पारंपरिक एक्शन स्टार जैसा न हो, लेकिन उनकी आंखों में अपने किरदार के प्रति एक अडिग विश्वास दिखाई देता है। उन्होंने अपनी सीमाओं को अभिनय और तैयारी से ढंकने की पूरी कोशिश की है। कई एक्शन दृश्यों में वह प्रभावशाली भी लगती हैं।

सिनेमा में नायक पैदा नहीं होते, गढ़े जाते हैं। लेकिन नायिका? उसे आज भी अक्सर किसी नायक की छाया में खड़ा करके ही महान घोषित किया जाता है।

यशराज स्पाई यूनिवर्स की नई पेशकश ‘अल्फ़ा’ देखते हुए यही विचार बार-बार मन में आता रहा। यह फ़िल्म उस दौर में आई है जब भारतीय सिनेमा महिलाओं को केंद्र में रख कर बड़े कैनवास की कहानियां कहने का साहस दिखा रहा है। ऐसे समय में ‘अल्फ़ा’ से उम्मीद थी कि वह केवल एक महिला जासूस की कहानी नहीं होगी, बल्कि उस सिनेमाई मानसिकता को भी चुनौती देगी, जो वर्षों से यह मानती रही है कि दुनिया बचाने का अधिकार केवल पुरुषों के हिस्से आता है। अफसोस, फ़िल्म इस चुनौती को स्वीकार करने की बजाय उसी व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है। फ़िल्म के निर्देशक हैं, शिव रवैल।

आलिया भट्ट इस फ़िल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। उनके भीतर का अभिनेता लगातार संघर्ष करता दिखाई देता है। उनका शरीर भले पारंपरिक एक्शन स्टार जैसा न हो, लेकिन उनकी आंखों में अपने किरदार के प्रति एक अडिग विश्वास दिखाई देता है। उन्होंने अपनी सीमाओं को अभिनय और तैयारी से ढंकने की पूरी कोशिश की है। कई एक्शन दृश्यों में वह प्रभावशाली भी लगती हैं।

शारवरी भी उनका अच्छा साथ देती हैं। दोनों अभिनेत्रियां मिलकर यह भरोसा दिलाती हैं कि भारतीय सिनेमा में महिला-प्रधान एक्शन फिल्मों का भविष्य है।

लेकिन भविष्य केवल कलाकारों के भरोसे नहीं बनता। उसके लिए वर्तमान में अच्छी पटकथा भी चाहिए। ‘अल्फ़ा’ की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि इसकी कहानी हमें बार-बार अतीत में ले जाती है।

रॉ है। सीमा पार का दुश्मन है। देश के भीतर छिपा गद्दार है। एक सनकी वैज्ञानिक है। दुनिया को तबाह करने की योजना है। हेलीकॉप्टर हैं। विस्फोट हैं। लंबी बंदूकें हैं। राष्ट्रभक्ति के संवाद हैं। और अंत में वही पुराना सवाल, देश बचेगा या नहीं?

इस पूरी यात्रा में केवल दर्शक की उत्सुकता नहीं बचती।

यशराज स्पाई यूनिवर्स की सबसे बड़ी समस्या शायद यही है कि उसने अपने ही बनाए फॉर्मूले को सफलता समझ लिया है। हर नई फिल्म पिछले सफल अध्यायों की प्रतिलिपि बनती जा रही है। पात्र बदल जाते हैं, लोकेशन बदल जाती हैं, चेहरे बदल जाते हैं, लेकिन कहानी नहीं बदलती।

इस फ़िल्म में चेरापूंजी की बारिश कुछ देर के लिए उम्मीद जगाती है। लगता है शायद भारतीय स्पाई सिनेमा अपने भूगोल और संवेदना दोनों का विस्तार करेगा। लेकिन थोड़ी ही देर बाद कहानी फिर दिल्ली के सरकारी कमरों, राजस्थान के रेगिस्तान, लद्दाख की चोटियों और कश्मीर की वादियों में लौट आती है। दृश्य सुंदर हैं, लेकिन उनमें कोई नया सिनेमाई अनुभव नहीं है।

बॉबी देओल अपने सीमित किरदार में प्रभाव छोड़ते हैं। अनिल कपूर हमेशा की तरह अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। दिया मिर्ज़ा कुछ ही मिनटों में भावनात्मक गहराई पैदा कर देती हैं। विडंबना देखिए कि जिस फिल्म में भावनाओं का सबसे असरदार दृश्य एक छोटे किरदार के हिस्से आए, वहां मुख्य पात्रों की यात्रा कहीं न कहीं अधूरी रह गई है।

फ़िल्म का सबसे दिलचस्प और सबसे निराशाजनक हिस्सा ऋतिक रोशन का कैमियो है। कबीर एक मठ में प्रकट होते हैं। दर्शक सीट पर सीधा बैठ जाता है। कैमरा उनकी एंट्री को उसी श्रद्धा से फिल्माता है, जैसे किसी सुपरहीरो का आगमन हो। आगे जो एक्शन दृश्य आता है, उसमें जॉन विक जैसी शैली की झलक साफ महसूस होती है। दृश्य रोमांचक है, लेकिन एक असहज प्रश्न भी छोड़ जाता है। अगर अल्फ़ा सचमुच इस कहानी की नायिका है, तो चरम क्षण में भी उसे किसी स्थापित पुरुष नायक की उपस्थिति की आवश्यकता क्यों पड़ती है?

यही वह क्षण है जहां फ़िल्म अपने ही विचार से विश्वासघात कर देती है।

पूरी फ़िल्म में हमें बताया जाता है कि अल्फ़ा असाधारण है। वह अकेली पूरी इमारत उड़ा सकती है। दुश्मनों की फ़ौज का सामना कर सकती है। असंभव मिशन पूरा कर सकती है। लेकिन निर्णय? वे आज भी कोई और लेता है। आदेश? कोई और देता है। अंतिम वैधता? वह भी किसी और से मिलती है।

यानी शक्ति उसकी है, लेकिन सत्ता अब भी किसी और की।

यही भारतीय मुख्यधारा के सिनेमा की पुरानी बीमारी है। वह स्त्री को शक्तिशाली दिखाना चाहता है, लेकिन स्वतंत्र नहीं।

तकनीकी स्तर पर फ़िल्म किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट से कम नहीं लगती। सिनेमैटोग्राफी प्रभावशाली है। एक्शन की कोरियोग्राफी कई जगह प्रभावित करती है। बैकग्राउंड स्कोर ऊर्जा पैदा करता है। लेकिन तकनीक कभी कहानी का विकल्प नहीं बन सकती। सबसे महंगा कैमरा भी साधारण विचार को महान नहीं बना सकता।

फ़िल्म का गीत भी इसी समस्या का प्रतीक है। यूरोप की खूबसूरत लोकेशन, चमकदार फ्रेम और ग्लैमरस प्रस्तुति के बावजूद वह कहानी में कहीं फिट नहीं बैठता। वह सिर्फ इसलिए मौजूद लगता है क्योंकि हिंदी व्यावसायिक सिनेमा में गीत होना चाहिए।

असल सवाल यह है कि क्या भारतीय स्पाई यूनिवर्स अब अपनी रचनात्मक सीमा तक पहुंच चुका है?

कभी ‘पठान’ की अतिरंजना मनोरंजन बन जाती थी क्योंकि फिल्म खुद को गंभीरता से नहीं लेती थी। ‘अल्फ़ा’ चाहती है कि दर्शक उसके हर दृश्य पर विश्वास करे। लेकिन विश्वास तभी पैदा होता है जब कहानी ईमानदार हो। यहां कहानी बार-बार सुविधाजनक रास्ते चुनती है।

आलिया भट्ट और शारवरी ने अपनी तरफ से कोई कमी नहीं छोड़ी। दोनों इस फ़िल्म से बड़ी निकलती हैं। दुर्भाग्य यह है कि फिल्म उनके कद तक नहीं पहुंच पाती।

‘अल्फ़ा’ यह याद दिलाती है कि प्रतिनिधित्व केवल पोस्टर पर महिला चेहरा लगा देने से नहीं आता। सशक्तीकरण का अर्थ केवल बंदूक थमा देना नहीं होता। सशक्तीकरण तब होता है जब कहानी भी उसी पात्र पर उतना ही भरोसा करे जितना प्रचार करता है।

फ़िल्म समाप्त होने के बाद मन में एक अजीब-सी उदासी रह जाती है। इसलिए नहीं कि फिल्म बुरी है, बल्कि इसलिए कि यह उससे कहीं बेहतर हो सकती थी।

कभी-कभी सबसे बड़ी असफलता खराब फिल्म बनाना नहीं होती। सबसे बड़ी असफलता होती है, एक बड़े विचार को औसत कहानी में बदल देना।

अल्फ़ा भारतीय स्पाई यूनिवर्स की पहली महिला योद्धा ज़रूर है, लेकिन वह अभी भी अपने ही ब्रह्मांड की पूरी तरह स्वतंत्र नायिका नहीं बन पाई।  आपके नज़दीकी सिनेमाघर में है तो सही पर आप कुछ बेहतर कर सकते हैं ।  (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)


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