बंगाल इस बार बदलाव के लिए तैयार

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इसमें कोई संदेह नहीं है कि तृणमूल कांग्रेस की सरकार के खिलाफ 15 साल की एंटी इन्कम्बैंसी है। इसे कम नहीं आंका जा सकता है। इन 15 वर्षों में आर्थिक व औद्योगिक गतिविधियां ठप्प हुई हैं। आर्थिक भ्रष्टाचार चरम पर है। केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई और करोड़ों रुपए की जब्ती की तस्वीरों ने इस धारणा को मजबूत किया है।

देश के दो राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश का चुनाव संपन्न हो गया है और पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु के लिए मतदान होना है। इन चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनाव में पूरे देश की नजर पश्चिम बंगाल पर है। राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के साथ साथ देश के आम लोगों के मन में भी कई सवाल उठ रहे हैं। जैसे यह सवाल कि क्या पश्चिम बंगाल में इस बार बदलाव होगा? क्या पश्चिम बंगाल में 50 साल से चली आ रही परंपरा बदलेगी? क्या बंगाल राष्ट्र की मुख्यधारा के साथ जुड़ कर विकास की राजनीति के लिए तैयार होगा?

क्या ममता बनर्जी लगातार चौथी बार जीतेंगी या इस बार भाजपा उनका विजय रथ रोक देगी, आदि आदि। पश्चिम बंगाल में पिछले 50 साल से ऐसी सरकार बन रही है, जो केंद्र में सत्तारूढ़ दल की विरोधी पार्टी की होती है। यानी केंद्र में जिस पार्टी की सरकार होती है उसका विरोध करने वाली पार्टी ही पश्चिम बंगाल में जीतती है। अगर कोई अपवाद दिखाई देता है तो वह बहुत छोटी अवधि के लिए है।

सो, देश का दूसरा कोई राज्य नहीं है, जिसकी राजनीति स्थायी रूप से केंद्र के साथ टकराव या असहयोग वाली रही हो। बंगाल एकमात्र राज्य है और इसका परिणाम यह हुआ है कि राज्य की विकास की गति समय से साथ धीमी होती गई है। केंद्र की सरकारों के साथ असहयोग या टकराव का राज्य को बहुत नुकसान हुआ। सरकार बनाने वाली पार्टियों को राजनीतिक फायदा चाहे जो हुआ हो लेकिन राज्य और इसके लोगों को लाभ नहीं मिला।

भारत की राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक राजधानी रहे बंगाल की स्थिति आज यह हो गई है कि विकास के हर पैमाने पर राज्य पिछड़ता गया है। पिछले 50 साल से केंद्र के साथ असहयोग वाली सरकार राज्य में बन रही है, यह पिछड़ेपन का एक कारण है। इसके और भी कारण हैं, जिन्हें बंगाल के लोग समझ रहे हैं। तभी ऐसा लग रहा है कि इस बार पश्चिम बंगाल में बदलाव हो सकता है।

बदलाव की संभावना प्रकट करने वाले सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक कारणों पर आएं उससे पहले इस पर विचार करना जरूरी है कि एक समय बंगाल देश की औद्योगिक गतिविधियों का केंद्र होता था। लेकिन अब या तो उद्योग धंधे बंद हो गए या उनकी गतिविधियां बहुत सीमित हो गईं। निवेश के बड़े बड़े वादों के बावजूद देश की बड़ी कंपनियां बंगाल आने से हिचक रही हैं। इससे नौकरी और रोजगार की संभावना कम हुई है। ध्यान रहे मुगलों के शासन से लेकर अंग्रेजों के राज तक और आजादी के बाद भी पश्चिम बंगाल में एक बड़ा वर्ग नौकरी करने वाला रहा है। यही कारण है कि राज्य में आज भी नौकरी को सबसे ज्यादा प्रमुखता दी जाती है। बाबू संस्कृति वही से आई है और स्थापित हुई है। लेकिन अब स्थिति यह है कि बंगाल में सरकारी और निजी दोनों तरह की नौकरी के अवसर बहुत कम हो गए हैं।

इसलिए पलायन में बहुत तेजी आई है। एक समय ऐसा था, जब दूरदराज के राज्यों से लोग बंगाल में नौकरी करने आते थे और आज बंगाली मानुष को नौकरी व रोजगार के लिए देश में भटकना पड़ रहा है। आर्थिक व औद्योगिक गतिविधियों के कम होने का असर नौकरी व रोजगार पर पड़ा है। इसकी वजह से हो रहे पलायन के कारण एक बड़ा सामाजिक संकट यह खड़ा हुआ है कि बंगाल बुजुर्गों का प्रदेश बन गया है। नौजवान नौकरी की तलाश में बाहर जा रहे हैं। नौकरी नहीं होने से शादियों में देरी हो रही है और उससे एक नया सामाजिक संकट खड़ा हो रहा है।

बदलाव की संभावना प्रकट करने वाला एक बड़ा कारण जो लोगों को सबसे ज्यादा समझ में आ रहा है वह राज्य की बदलती जनसंख्या संरचना है और राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है। संभवतः पहली बार ऐसा हो रहा है कि पश्चिम बंगाल में लोगों को लग रहा है कि बढ़ती हुई मुस्लिम आबादी उनके बच्चों के भविष्य के लिए खतरा बन रही है। राज्य की जनसंख्या संरचना बदल रही है और जो चिंता पहले हाशिए में दिखती थी वह मुख्यधारा में आ गई है। इससे पहले बंगाली हिंदू अपने को भाषा, संस्कृति, खान-पान, पहनावे आदि में बंगाली मुस्लिम के ज्यादा नजदीक पाता था। लेकिन अब उनको समझ में आ रहा है कि दोनों में कई किस्म की समानताओं के बावजूद कई गहरी असमानताएं हैं। बां

ग्ला बोलने वाले हिंदुओं का कहना है कि बाहर से आए लोग तो अपने राज्य में लौट जाएंगे। लेकिन अगर इसी तरह जनसंख्या संरचना बदलती रही और समाज का ताना बाना बिगड़ा तो बंगाली लोग कहां जाएंगे? लोगों के अंदर बढ़ रही इस सोच का असर चुनाव नतीजों पर दिखेगा। इसके अलावा सिंडिकेट की शासन व्यवस्था से भी लोग ऊबे हुए हैं। वाम मोर्चे की सरकार के समय से यह व्यवस्था चल रही है। लोगों को अपने निजी कार्यों के लिए पार्टी के लोगों से अनुमति लेनी होती है और उन्हें पैसे देने होते हैं। यह स्वतंत्र समाज की धारणा के उलट है।

धार्मिक स्तर पर भी कहीं न कहीं व्यापक ध्रुवीकऱण होता दिख रहा है। संदेशखाली की घटना भले अब मीडिया में नहीं आती है लेकिन बड़ी आबादी के दिल दिमाग में संदेशखाली और शाहजंहा शेख का मामला बैठा हुआ है। इसी तरह बेलडांगा में बाबरी मस्जिद बनाने के ऐलान ने भी ध्रुवीकरण की संभावना को मजबूत किया है। आंकड़ों के हिसाब से भी देखें तो पिछले तीन चुनावों से भारतीय जनता पार्टी औसतन 40 फीसदी के करीब वोट हासिल कर रही है।

2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव और 2021 के विधानसभा चुनाव में औसतन 40 फीसदी वोट भाजपा को मिला है। राज्य में मोटे तौर पर 70 फीसदी आबादी हिंदू है। इसके बावजूद भाजपा 40 फीसदी वोट हासिल कर रही है इसका अर्थ है कि सौ में से 60 हिंदू उसे वोट दे रहा है। यह बहुत उच्च स्तर का ध्रुवीकऱण है। अगर पांच से 10 फीसदी हिंदू का वोट और भाजपा को मिलता है तो चुनाव नतीजे पूरी तरह से बदल जाएंगे। वह 45 से 49 फीसदी तक वोट हासिल कर सकती है।

सवाल है कि इस स्तर का ध्रुवीकरण कैसे होगा? इसका जवाब बहुत मुश्किल नहीं है। बंगाली हिंदुओं के मन में बदलती जनसंख्या संरचना की चिंता है, संदेशखाली और बेलडांगा के प्रयोग हैं और भाजपा का आक्रामक प्रचार है। लेकिन इसके अलावा सबसे बड़ी बात हिंदू मतदाताओं के मन में यह भरोसा पैदा होना है कि भाजपा जीत सकती है। भारतीय जनता पार्टी के सभी नेता यह भरोसा दिलाने में लगे हैं कि इस बार चुनाव शांतिपूर्ण होंगे, पूरी तरह से स्वतंत्र व निष्पक्ष होंगे और भाजपा जीत सकती है। चुनाव के समय हिंसा नहीं होगी, यह धारणा हिंदुओं को बड़ी संख्या में निकल कर भाजपा को वोट करने के लिए प्रेरित करेगी।

ध्यान रहे चुनाव आयोग ने भी तृणमूल कांग्रेस को बहुत साफ शब्दों में कहा है कि इस बार चुनाव हिंसा रहित और भय रहित होंगे। इससे धारणा प्रभावित हो रही है। चुनाव आयोग ने जितनी सख्ती से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया को अंजाम दिया है उससे भी मतदाताओं के अंदर यह भरोसा बना है कि चुनावी धांधली रूकेगी। सो, चुनावी धांधली रूकने, हिंसा नहीं होने, 91 लाख के करीब नाम कटने और भाजपा के जीत सकने की धारणा बड़ी संख्या में लोगों को मतदान केंद्र तक ले जाएगी और उसका फायदा भाजपा को हो सकता है। केंद्रीय बलों की तैनाती के जरिए भी सुरक्षा का संदेश बनवाया गया है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि तृणमूल कांग्रेस की सरकार के खिलाफ 15 साल की एंटी इन्कम्बैंसी है। इसे कम नहीं आंका जा सकता है। इन 15 वर्षों में आर्थिक व औद्योगिक गतिविधियां ठप्प हुई हैं। आर्थिक भ्रष्टाचार चरम पर है। केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई और करोड़ों रुपए की जब्ती की तस्वीरों ने इस धारणा को मजबूत किया है। आरजी कर अस्पताल से लेकर दूसरी कई घटनाओं से महिलाओं की बढ़ती असुरक्षा का भी एक मुद्दा बना है। महिला सुऱक्षा और कानून व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति भाजपा के प्रचार का एक मुख्य मुद्दा है। यह धारणा महिला मतदाताओं को ज्यादा प्रभावित करेगी।

अगर विशुद्ध राजनीतिक कारणों की बात करें तो इस बार भाजपा ने बाहरी और भीतरी का नैरेटिव बनाने का मौका ही नहीं दिया है। बंगाल के नेता चुनाव प्रचार की कमान संभाले हुए हैं और हर जगह उनके चेहरे दिख रहे हैं। भाजपा ने स्थानीय नेताओं को आगे किया, जमीनी स्तर पर पकड़ रखने वाले उम्मीदवार उतारे, नए व पुराने नेताओं के बीच तालमेल बनाया और तृणमूल कांग्रेस की विभाजन कराने या सहानुभूति हासिल करने के प्रयासों को कामयाब नहीं होने दिया।

भाजपा की होर्डिंग्स, वॉल पेंटिंग्स, पोस्टर, बैनर आदि सब बांग्ला में लिखे गए, जो 2021 के चुनाव में हिंदी में थे। केंद्र सरकार की योजनाओं जैसे आयुष्मान भारत, उज्ज्वला आदि का लाभ भी भाजपा को मिल सकता है। अंत में चुनाव से ठीक पहले महिला आरक्षण का मुद्दा लाकर भाजपा की केंद्र सरकार ने तृणमूल कांग्रेस को बैकफुट पर ला दिया। बंगाल की महिलाओं में यह संदेश बना है कि ममता बनर्जी ने महिला आरक्षण की संभावना को बाधित किया है। इसका भी कुछ न कुछ असर परिणामों पर अवश्य पड़ेगा। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)


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