विज्ञान के पार की संवेदना है ‘प्रोजेक्ट हेल मैरी’

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यहां फ़िल्म किसी आदर्श नायक की छवि नहीं गढ़ती, बल्कि एक साधारण इंसान को दिखाती है, जो डरता है, हिचकिचाता है, पर अंततः सही निर्णय लेने की कोशिश करता है। अक्सर यह बहस होती है कि क्या तकनीक हमें अधिक मानवीय बना रही है या कम। प्रोजेक्ट हेल मैरीइस बहस को एक अलग दृष्टिकोण देती है। यह फ़िल्म दिखाती है कि तकनीक और मानवता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।

सिने–सोहबत

कभी-कभी सिनेमा हमें केवल मनोरंजन नहीं देता, बल्कि हमें हमारे समय, हमारी सीमाओं और हमारी संभावनाओं के बारे में सोचने के लिए विवश करता है। आज के सिने-सोहबत में एक ऐसी ही फ़िल्म ‘प्रोजेक्ट हेल मैरी’ पर विमर्श करते हैं। ‘प्रोजेक्ट हेल मैरी’ ऐसी ही एक फ़िल्म है जो अंतरिक्ष की असीम शून्यता में जाकर भी आख़िरकार मनुष्य के भीतर लौट आती है। यह विज्ञान कथा है, पर उतनी ही गहराई से यह संवेदना की कथा भी है; यह तकनीक की बात करती है, पर उतनी ही सादगी से दोस्ती और भरोसे की भी।

‘प्रोजेक्ट हेल मैरी’ के निर्देशक हैं फिल लॉर्ड और क्रिस्टोफर मिलर, स्क्रीन राइटर हैं ड्रू गोडार्ड और सिनेमेटोग्राफर हैं ग्रेग फ्रेज़र। एंडी वियर के उपन्यास ‘प्रोजेक्ट हेल मैरी’ पर आधारित यह फ़िल्म हमें उस जगह ले जाती है, जहां विज्ञान और भावनाएं एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक बन जाते हैं। यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है। यह हमें याद दिलाती है कि तकनीक जितनी भी उन्नत हो जाए, उसका अंतिम उद्देश्य मनुष्य को बचाना और बेहतर बनाना ही होता है।

फ़िल्म की शुरुआत एक बेहद सन्नाटे भरे क्षण से होती है। एक व्यक्ति (रायलैंड ग्रेस) अंतरिक्ष यान में जागता है। उसे कुछ याद नहीं। यह दृश्य केवल एक प्लॉट डिवाइस नहीं, बल्कि एक गहरा रूपक है। हम सभी अपने-अपने जीवन में कभी न कभी ऐसे ही जागते हैं, जहां हमें यह समझ नहीं आता कि हम यहां क्यों हैं, हमें क्या करना है, और हमारे सामने जो संकट है, उसका समाधान क्या है।

जैसे-जैसे ग्रेस की स्मृतियां लौटती हैं, हम उसके साथ उस यात्रा में शामिल हो जाते हैं। यह यात्रा केवल एक मिशन की नहीं, बल्कि पहचान की भी है। वह केवल यह नहीं समझ रहा कि उसे पृथ्वी को कैसे बचाना है, बल्कि यह भी कि वह खुद कौन है, एक साधारण शिक्षक, या असाधारण परिस्थितियों में खड़ा एक नायक। यहां फ़िल्म एक महत्वपूर्ण बात कहती है, नायक जन्म से नहीं होते, परिस्थितियां उन्हें गढ़ती हैं।

अक्सर विज्ञान आधारित फिल्मों में तकनीक एक चमत्कार की तरह प्रस्तुत की जाती है, कुछ ऐसा जो आम दर्शक को चकित तो करता है, पर उससे जुड़ने नहीं देता। लेकिन ‘प्रोजेक्ट हेल मैरी’ इस परंपरा को तोड़ती है। यहां विज्ञान कोई रहस्य नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है। समस्या आती है, उसका विश्लेषण होता है, प्रयोग किए जाते हैं, असफलताएं मिलती हैं, और फिर धीरे-धीरे समाधान सामने आता है। यह पूरी प्रक्रिया इतनी मानवीय लगती है कि दर्शक खुद को उस प्रयोगशाला का हिस्सा महसूस करने लगता है और शायद यही वजह है कि फ़िल्म का विज्ञान हमें डराता नहीं, बल्कि हमें जिज्ञासु बनाता है।

यह फ़िल्म हमें यह भी सिखाती है कि तकनीक का सबसे बड़ा गुण उसकी जटिलता नहीं, बल्कि उसकी उपयोगिता है वह कितनी आसानी से जीवन को समझने और सुधारने में हमारी मदद करती है। जहां विज्ञान फ़िल्म का ढांचा बनाता है, वहीं भावनाएं उसकी आत्मा हैं।

रायलैंड ग्रेस का अकेलापन केवल भौतिक नहीं है। यह मानसिक और भावनात्मक भी है। अंतरिक्ष की अनंतता में तैरता हुआ एक इंसान, यह दृश्य जितना भव्य है, उतना ही भीतर से खाली भी लेकिन फ़िल्म यहीं रुकती नहीं। यह हमें धीरे-धीरे उस बिंदु तक ले जाती है जहां यह अकेलापन एक रिश्ते में बदल जाता है, रॉकी के साथ।

रॉकी (एक एलियन प्राणी) इस फ़िल्म का सबसे अनोखा और भावनात्मक पहलू है। यह रिश्ता किसी भी पारंपरिक दोस्ती जैसा नहीं है। यहां भाषा नहीं है, साझा इतिहास नहीं है, यहां तक कि जैविक संरचना भी पूरी तरह अलग है। फिर भी, इनके बीच जो संबंध बनता है, वह बेहद स्वाभाविक और गहरा है। यह दोस्ती हमें यह सिखाती है कि संबंधों की नींव समानताओं पर नहीं, बल्कि समझ और सहयोग पर टिकी होती है। जब दो प्राणी एक-दूसरे को समझने का प्रयास करते हैं, तो वे अपनी सीमाओं से परे जाकर जुड़ते हैं। रॉकी और ग्रेस के बीच के दृश्य फ़िल्म के सबसे जीवंत और टचिंग मोमेंट्स हैं। उनमें एक मासूमियत है, एक जिज्ञासा है, और सबसे बढ़कर एक भरोसा है।

यहां तकनीक एक सेतु बनती है, एक ऐसी भाषा बनाने का माध्यम, जो दोनों को जोड़ सके। यह बेहद सुंदर विचार है कि तकनीक केवल मशीनों के लिए नहीं, बल्कि संबंधों को संभव बनाने के लिए भी होती है।

फ़िल्म का एक और गहरा पक्ष है, नैतिक निर्णय। रायलैंड ग्रेस को बार-बार ऐसे निर्णय लेने पड़ते हैं जहां उसे यह तय करना होता है कि वह अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता दे या एक बड़े उद्देश्य को। ये फ़ैसला आसान नहीं हैं, और फ़िल्म इन्हें सरल बनाने की कोशिश भी नहीं करती। यही इसकी ईमानदारी है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि अगर हम उस स्थिति में होते, तो क्या करते? क्या हम भी वही साहस दिखा पाते?

यहां फ़िल्म किसी आदर्श नायक की छवि नहीं गढ़ती, बल्कि एक साधारण इंसान को दिखाती है, जो डरता है, हिचकिचाता है, पर अंततः सही निर्णय लेने की कोशिश करता है। अक्सर यह बहस होती है कि क्या तकनीक हमें अधिक मानवीय बना रही है या कम। ‘प्रोजेक्ट हेल मैरी’ इस बहस को एक अलग दृष्टिकोण देती है। यह फ़िल्म दिखाती है कि तकनीक और मानवता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। बल्कि, जब तकनीक का उपयोग संवेदनशीलता के साथ किया जाता है, तो वह मानवता को और गहरा बना देती है। ग्रेस और रॉकी के बीच संवाद स्थापित करने की प्रक्रिया इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। यह केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि एक भावनात्मक उपलब्धि भी है।

फ़िल्म का दृश्य संसार अत्यंत प्रभावशाली है। अंतरिक्ष की विशालता को जिस तरह से दिखाया गया है, वह दर्शकों को चकित करता है, लेकिन कहीं भी यह भव्यता कहानी पर हावी नहीं होती। कैमरा अक्सर ठहरता है, जैसे वह दर्शक को समय देना चाहता हो कि वह उस क्षण को महसूस करे।

साउंड डिज़ाइन भी इसी दर्शन का अनुसरण करता है। खामोशी यहां केवल अनुपस्थिति नहीं, बल्कि एक सक्रिय तत्व है जो अकेलेपन और तनाव को और गहरा करती है।

‘द मार्शियन’ का ज़िक्र ‘प्रोजेक्ट हेल मैरी’ के संदर्भ में बार-बार इसलिए आता है, क्योंकि दोनों एक ही लेखक ‘एंडी वियर’ की रचनाएं हैं और उनकी कहानी कहने की शैली में एक स्पष्ट समानता दिखाई देती है। ‘द मार्शियन’ में मार्क वॉटनी मंगल ग्रह पर अकेले फंस जाता है और विज्ञान के सहारे जीवित रहने की कोशिश करता है। वहीं ‘प्रोजेक्ट हेल मैरी’ में रायलैंड ग्रेस अंतरिक्ष में अकेला है और उसे पूरी मानवता को बचाने का दायित्व मिला है।

दोनों कहानियों का मूल प्रश्न एक जैसा है कि जब आप पूरी तरह अकेले हों, तो आप अपने ज्ञान और साहस से कितनी दूर जा सकते हैं? दोनों फ़िल्मों में कोई पारंपरिक एक्शन हीरो नहीं है। नायक का सबसे बड़ा हथियार है उसकी वैज्ञानिक समझ। ‘द मार्शियन’ में आलू उगाना, ऑक्सीजन बनाना, छोटे-छोटे वैज्ञानिक समाधान ही जीवन बचाते हैं। ‘प्रोजेक्ट हेल मैरी’ में भी हर संकट का समाधान प्रयोग और तर्क से आता है। यानी, यहां विज्ञान ही असली नायक है। दोनों कहानियां गंभीर परिस्थितियों में भी हल्का-फुल्का हास्य बनाए रखती हैं।

मार्क वॉटनी की डायरी एंट्रीज़ हों या रायलैंड ग्रेस की घबराहट भरी मज़ाकिया प्रतिक्रियाएं, ये पात्र हमें यह महसूस कराते हैं कि वे सुपर हीरो नहीं, बल्कि हमारे जैसे ही इंसान हैं। ‘द मार्शियन’ ने रास्ता बनाया, और ‘प्रोजेक्ट हेल मैरी’ उस रास्ते को ब्रह्मांड तक ले जाती है। जहां ‘द मार्शियन’ में संघर्ष मुख्यतः भौतिक था, जीवित रहने का, वहीं ‘प्रोजेक्ट हेल मैरी’ में संघर्ष भावनात्मक और दार्शनिक भी है।

यह केवल यह नहीं पूछती कि ‘हम कैसे बचेंगे’?, बल्कि यह भी पूछती है कि ‘हम क्यों बचना चाहते हैं’? और ‘हम किसके लिए बचना चाहते हैं’?

फ़िल्म का शुरुआती भाग थोड़ा धीमा लग सकता है, विशेषकर उन दर्शकों के लिए जो तेज़-रफ्तार नैरेटिव के आदी हैं लेकिन यह धीमापन आवश्यक है।

यह हमें पात्र के भीतर उतरने का समय देता है। यह हमें उसके डर, उसकी उलझन और उसकी जिज्ञासा को महसूस करने का अवसर देता है और जब कहानी गति पकड़ती है, तो यह निवेश पूरी तरह सार्थक हो जाता है।

‘प्रोजेक्ट हेल मैरी’ केवल एक फ़िल्म नहीं, बल्कि एक विचार है। एक ऐसा विचार जो हमें यह याद दिलाता है कि हम चाहे कितनी भी दूर क्यों न चले जाएं, हमारी सबसे बड़ी ताकत हमारी मानवीयता ही है। यह फ़िल्म हमें सिखाती है कि ज्ञान आवश्यक है, पर संवेदना अनिवार्य है।

‘तकनीक’ शक्तिशाली है, पर ‘संबंध’ उससे भी अधिक। और सबसे बढ़कर, हम तब तक अकेले नहीं है’, जब तक हम जुड़ने की कोशिश करते रहते हैं।

अपने  जीवन की भागदौड़ में, जहां हम अक्सर तकनीक के बीच घिरे रहते हैं, यह फ़िल्म हमें एक क्षण रुककर यह सोचने का अवसर देती है कि क्या हम उस तकनीक का उपयोग केवल सुविधा के लिए कर रहे हैं, या उससे कुछ अधिक मानवीय बनाने के लिए?

शायद यही ‘प्रोजेक्ट हेल मैरी’ का सबसे बड़ा प्रभाव है कि यह हमें अंतरिक्ष की ओर नहीं, बल्कि अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। नज़दीकी सिनेमाघरों में है। देख लीजिएगा।  (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़’ के होस्ट हैं।)


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