आज के ‘सिने-सोहबत’ में जो फ़िल्म चर्चा का विषय है वो है ‘दो दीवाने शहर में’ जिसके निर्देशक हैं रवि उद्यावर और लिखा है अभिरुचि चांद ने। मौजूदा दौर में जब हिंदी सिनेमा का बड़ा हिस्सा हिंसा, प्रतिशोध और अंधेरे मनोविज्ञान से भरा हुआ है, दर्शक स्वाभाविक रूप से एक हल्की-फुल्की, संवेदनशील और मुस्कुराहट से भरी प्रेमकथा की तलाश में रहते हैं। थके हुए मन को दो घड़ी की राहत चाहिए। ऐसे में ‘दो दीवाने शहर में’ से उम्मीद थी कि यह शहरी जीवन की जटिलताओं के बीच प्रेम की कोमल रोशनी तलाशेगी। परंतु दुखद यह है कि फिल्म उस रोशनी तक पहुंच ही नहीं पाती। इस फ़िल्म को देखकर सबसे पहले तो यही ख्याल आया कि इसे बनाया ही क्यों गया? हैरत की बात है कि इसके निर्माता मशहूर और सार्थक फ़िल्मकार संजय लीला भंसाली हैं ।
कहानी एक महानगर में रहने वाले दो युवाओं की है, जो संयोग से मिलते हैं, कुछ हल्की-फुल्की नोकझोंक के बाद प्रेम में पड़ते हैं, फिर कुछ गलतफहमियां आती हैं और अंततः सब सुलझ जाता है। सुनने में यह क्लासिक रोमांटिक-कॉमेडी का ढांचा लगता है, पर समस्या ढांचे में नहीं, उसके निर्वाह में है।
फ़िल्म ऐसे दो ऐसे युवाओं की कहानी है जो अपने हीनभावों के बोझ तले प्रेम तलाशते हैं। शशांक की भूमिका सिद्धांत चतुर्वेदी ने निभाई है; उसे ‘स’ और ‘श’ के उच्चारण में दिक्कत है, जिसे फ़िल्म उसके व्यक्तित्व का बड़ा कॉम्प्लेक्स बनाती है। रोशनी का किरदार मृणाल ठाकुर ने निभाया है; वह अपनी नाक को असंतुलित मानती है और बड़े फ्रेम का चश्मा पहनकर उसे छिपाती रहती है। सहायक भूमिकाओं में इला अरुण और जॉय सेनगुप्ता आदि कलाकार कहानी को सहारा देते हैं। हालांकि, इतने तेज़ी से बदलते समाज में ऐसे सतही और पुराने कॉम्प्लेक्स, कथानक को सीमित और अप्रासंगिक बना देते हैं।
आज के समय में प्रेमकथा लिखना आसान नहीं है। दर्शक डिजिटल युग में जी रहा है, संबंधों की परतें जटिल हो चुकी हैं, शहर बदल चुके हैं, आकांक्षाएं बदल चुकी हैं। ऐसे में यदि आप एक प्रेमकथा कहते हैं तो उसे नए संदर्भ, नई भाषा और नई संवेदना देनी होगी।
‘दो दीवाने शहर में’ यह सब करने से बचती हुई प्रतीत होती है। यह मानो किसी पुराने फॉर्मूले की धूल झाड़कर उसे फिर से परोस देने की कोशिश है और वो भी बिना यह सोचे कि समय आगे बढ़ चुका है।
निर्देशक रवि उद्यावर से अपेक्षा थी कि वे कथा को भावनात्मक गहराई देंगे। परंतु यहां निर्देशन असमंजस में भटकता नजर आता है। फिल्म का टोन तय नहीं हो पाता कि क्या यह शुद्ध रोमांटिक कॉमेडी है? क्या यह शहरी अकेलेपन पर टिप्पणी है? क्या यह संबंधों की नाजुकता पर विमर्श है?
फ़िल्म एक स्पष्ट दिशा से वंचित है। दृश्यों का संयोजन सुंदर हो सकता है, फ्रेम आकर्षक हो सकते हैं, पर यदि कथा के भीतर ऊर्जा और उद्देश्य नहीं है तो दृश्यात्मक सौंदर्य भी खोखला लगता है।
लेखन के स्तर पर भी अभिरुचि चांद की पटकथा सतही संघर्षों से आगे नहीं बढ़ पाती। नायक-नायिका के बीच जो टकराव हैं, वे इतने हल्के हैं कि आज के दर्शक के अनुभव से मेल नहीं खाते। करियर, वर्ग, परिवार, आकांक्षा, मानसिक स्वास्थ्य ,इनमें से किसी भी आयाम को गंभीरता से नहीं छुआ गया।
इस फ़िल्म की कहानी का संघर्ष केवल संवादों में है, जीवन में नहीं। आज का शहरी युवा आर्थिक दबाव, भावनात्मक असुरक्षा, डिजिटल संबंधों की जटिलता और अस्तित्वगत प्रश्नों से जूझ रहा है। प्रेम अब केवल पार्क की बेंच पर बैठकर गीत गाने का विषय नहीं रहा। ऐसे समय में यदि फ़िल्म केवल ‘गलतफहमी’ को मुख्य संघर्ष बनाकर पूरी कथा खड़ी करती है, तो वह दर्शक की बौद्धिक और भावनात्मक अपेक्षाओं के साथ न्याय नहीं करती। संघर्षों का उथलापन कहानी को गंभीरता से लेने नहीं देता। जब समस्या ही वास्तविक नहीं लगती, तो समाधान भी कृत्रिम लगता है।
रोमांटिक फिल्म की असली कसौटी यह है कि क्या वह दिल को छू पाती है? यहां सबसे बड़ी कमी यही है कि फ़िल्म भावनाएं जगा नहीं पाती। इमोशंस बहुत मुश्किल से ढूंढने पड़ते हैं। प्रेम का उत्कर्ष, बिछड़ने की पीड़ा, पुनर्मिलन की राहत, इनमें से कोई भी क्षण दर्शक के भीतर ठहरता नहीं। दृश्य आते हैं और चले जाते हैं। संवाद कहे जाते हैं, पर उनमें आत्मा का कंपन नहीं है। दर्शक मुस्कुराना चाहता है, पर मुस्कान आधी रह जाती है। वह भावुक होना चाहता है, पर आंसू नहीं आते। यह विफलता केवल अभिनय या संगीत की नहीं, बल्कि संपूर्ण रचनात्मक दृष्टि की है।
फ़िल्म में चारो तरफ़ क्लिशे का जाल साफ़ तौर पर दीखता है और ये फ़िल्म कई स्थानों पर घिसे-पिटे फार्मूलों में फंस जाती है जैसे पहली मुलाकात में टकराकर गिरना, एक दोस्त का किरदार जो सिर्फ़ कॉमिक रिलीफ़ के लिए है, बारिश में भावनात्मक दृश्य इत्यादि। ये सभी दृश्य कभी आकर्षक हुआ करते थे, पर आज वे क्लिशे की श्रेणी में आ चुके हैं। यदि इन्हें नया संदर्भ, नया प्रस्तुतीकरण या नई संवेदना न दी जाए तो वे केवल दोहराव बनकर रह जाते हैं। दुर्भाग्यवश, यहां अधिकांश प्रसंगों में वही पुराना सांचा दिखाई देता है।
इस फ़िल्म में संजय लीला भंसाली का नाम बस ‘नाममात्र’ ही है। संसाधनों का उपयोग कहानी को समृद्ध करने के बजाय केवल सतही सजावट तक सीमित रह जाता है। भव्यता और संवेदना का संतुलन नहीं बन पाता। यह कहना कठोर होगा, पर सत्य यही है कि इतने सक्षम निर्माता के रहते हुए भी फ़िल्म अपने उद्देश्य को स्पष्ट नहीं कर पाती। कहीं-कहीं यह प्रश्न उठता है कि क्या यह फ़िल्म केवल इसलिए बनाई गई कि एक हल्की-फुल्की प्रेमकथा बनानी थी? यदि हां, तो क्या केवल हल्केपन से काम चल सकता है, जब दर्शक गहराई की तलाश में हो?
हिंदी सिनेमा का दर्शक इन दिनों लगातार हिंसा, रक्तपात और अंधकार से भरी फिल्मों से थक चुका है। वह सिनेमा में सुकून चाहता है।वह एक ऐसी प्रेमकथा चाहता है जो उसे आश्वस्त करे कि जीवन में कोमलता अभी शेष है। ‘दो दीवाने शहर में’ उस आशा को पूरा करने का अवसर रखती थी। परंतु जब हल्के-फुल्के मनोरंजन के नाम पर भी गहराई और ईमानदारी न मिले, तो निराशा और बढ़ जाती है। दर्शक हिंसा से बचकर प्रेमकथा की ओर आता है, पर यहां उसे केवल सतही मुस्कान मिलती है, दिल को छू लेने वाला स्नेह नहीं।
‘दो दीवाने शहर में’ से सबसे बड़ी शिकायत यही है कि फिल्म में कुछ भी नया नहीं है। न कथ्य में, न प्रस्तुति में, न भावनात्मक संरचना में। जबकि आज का समय नई कहानियों का है। छोटे शहरों के बदलते सपने, महानगरों का अकेलापन, डिजिटल प्रेम, क्लास डिफ्रेन्स, स्त्री-पुरुष की बदलती भूमिकाएं, इनमें से कितने ही विषय हैं जिन पर एक सशक्त रोमांटिक कॉमेडी बन सकती थी। पर फिल्म सुरक्षित रास्ता चुनती है। और सुरक्षित रास्ता अक्सर कला को नीरस बना देता है।
इस फ़िल्म में संसाधनों की घोर बर्बादी भी दिखी। जब सिनेमा एक महंगा माध्यम है और सैकड़ों लोग महीनों मेहनत करते हैं, तो अपेक्षा होती है कि परिणाम भी उतना ही सार्थक हो। यदि अंततः दर्शक थिएटर से यह कहकर निकलता है कि “बस ठीक-ठाक थी” या “कुछ खास नहीं था”, तो यह सामूहिक ऊर्जा की बर्बादी प्रतीत होता है।
‘दो दीवाने शहर में’ एक अवसर था, प्रेम को नए संदर्भ में देखने का, शहर को भावनात्मक रूप से पढ़ने का, और दर्शक को राहत देने का।
पर यह अवसर अधूरा रह जाता है।
फ़िल्म न तो पूरी तरह मनोरंजक बन पाती है, न ही भावनात्मक रूप से प्रभावी। उसके संघर्ष उथले हैं, भावनाएं अधूरी हैं, और प्रस्तुति क्लिशे से भरी हुई।
आज जब दर्शक संवेदनशील और सजग है, उसे केवल सजावटी प्रेमकथा से संतोष नहीं होगा। उसे सच्चाई, गहराई और ईमानदारी चाहिए। दुर्भाग्य से, ‘दो दीवाने शहर में’ वह ईमानदारी नहीं दे पाती।
यह फ़िल्म यह याद दिलाती है कि प्रेमकथा बनाना आसान नहीं है और केवल ‘दो दीवाने’ और ‘एक शहर’ पर्याप्त नहीं होते। प्रेम को जीवित करने के लिए आत्मा चाहिए, दृष्टि चाहिए, और सबसे बढ़कर एक सच्ची वजह चाहिए कि यह कहानी कही क्यों जा रही है। फ़िलहाल, यह प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाता है।
नज़दीकी सिनेमाघरों में है। अगर और कोई दूसरा ज़रूरी काम न हो तो देख लीजिएगा।
(पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)
