एक मार्च से ही केंद्रीय बलों की तैनाती हो रही है और 10 मार्च तक कुल 480 कंपनियों को पश्चिम बंगाल में तैनात किया जाएगा। इसका अर्थ है कि चुनाव की घोषणा होने और अधिसूचना जारी होने से पहले ही केंद्रीय बलों की पर्याप्त तैनाती हो जाएगी। जमीनी स्तर पर इसका कितना लाभ होगा यह नहीं कहा जा सकता है। लेकिन मनोवैज्ञानिक स्तर पर इसका दो तरह से लाभ है।
पश्चिम बंगाल में चुनाव नजदीक आने के साथ साथ मुकाबला भी नजदीकी होता जा रहा है। चुनाव आयोग की ओर से अंतिम मतदाता सूची जारी कर दी गई है। इसमें मसौदा सूची के मुकाबले 60 लाख नाम और कम हैं यानी कुल एक करोड़ 18 लाख नाम कम हो गए हैं। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची सात करोड़ 66 लाख की थी। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के बाद इसमें से 58 लाख से कुछ ज्यादा नाम कटे। लॉजिकल डिस्क्रिपेंसीज की वजह से 60 लाख नाम और रोके गए हैं।
इनके दस्तावेजों की जांच होगी और बाद में एक पूरक मतदाता सूची जारी होगी। राज्य सरकार की अड़ंगेबाजी के बावजूद यह काम रूक नहीं रहा है। एसआईआर के काम में मदद कर रहे न्यायिक अधिकारियों के प्रशिक्षण का मुद्दा लेकर राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट गई थी तो अदालत ने उसे कड़ी फटकार लगाई और कहा कि ऐसे छोटे छोटे मुद्दे पर एसआईआर की प्रक्रिया में बाधा डालना ठीक नहीं है। बहरहाल, अंतिम मतदाता सूची आने के बाद यह लगभग स्पष्ट हो गया है कि चुनाव समय पर होगा।
यह चुनाव कई मायने में बहुत अहम है। कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाने और स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ना शुरू करने के बाद ममता बनर्जी के लिए यह संभवतः पहला चुनाव है, जिसमें वे इतनी चुनौतियों से घिरी हैं। भारतीय जनता पार्टी ने उनको राजनीतिक रूप से चुनौती दी है तो दूसरी चुनौती मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की है। अब तक किसी भी पार्टी की चुनौती ममता बनर्जी का कुछ नहीं बिगाड़ पाती थी तो उसका कारण यह था कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची शुद्ध नहीं थी और बड़ी संख्या में ऐसे मतदाताओं के नाम थे, जिनका वास्तव में अस्तित्व नहीं था। ऐसा नहीं है कि ये सब ममता बनर्जी या तृणमूल कांग्रेस के बनाए हुए थे।
असल में ममता बनर्जी को एक बना बनाया सिस्टम विरासत में मिला था। लेफ्ट पार्टियों के करीब साढ़े तीन दशक के राज में उनके फायदे के लिए जो मतदाता बनाए गए और उनके वोट डलवाने का जो सिस्टम बना वह ममता बनर्जी को मिल गया। लेफ्ट के कमजोर होने के साथ ही उस सिस्टम को संचालित करने वाली ताकतें सत्तारूढ़ दल यानी तृणमूल कांग्रेस के साथ हो गईं। चुनाव आयोग ने उस सिस्टम को समाप्त करने की पहल की है। एसआईआर से मतदाता सूची का शुद्धिकरण हो रहा है। मृत मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं तो साथ ही साथ स्थायी रूप से शिफ्ट हो गए मतदाताओं के नाम भी हटाए जा रहे हैं। बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता भी थे, जिनके नाम एक से ज्यादा जगहों पर दर्ज थे और बड़ी संख्या में फर्जी मतदाता थे। इन सबके नाम हटाए जा रहे हैं।
इन चार श्रेणियों के मतदाताओं के नाम हटाए जाने चाहिए इसमें किसी को आपत्ति नहीं हो सकती है। लेकिन कम लोगों को पता है कि इनकी क्या उपयोगिता होती है। ऐसे नाम इसलिए मतदाता सूची में रखे जाते हैं या ऐसे नाम काटे जाने का विरोध इसलिए होता है क्योंकि इन घोस्ट मतदाताओं के नाम पर बोगस मतदान होता है और उससे नतीजे बदल जाते हैं। ऐसे लाखों लोग, जिनका अस्तित्व नहीं है और उनका नाम वोटर लिस्ट में है तो सत्तारूढ़ दलों को यह लाभ होता है कि वे उनका वोट डलवा देते हैं। पश्चिम बंगाल में इसका लंबा इतिहास है। राजनीतिक जागरूकता के साथ साथ यह भी एक कारण है कि पश्चिम बंगाल में 80 फीसदी या उससे ज्यादा मतदान होता है। इस बार एसआईआर की वजह से इसमें कमी आई है और यह भी एक कारण है कि तृणमूल कांग्रेस में बेचैनी और घबराहट है।
दूसरा एडवांटेज भी सत्ता की ताकत से ही जुड़ा है। लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद तृणमूल कांग्रेस के लोगों को पता है कि कौन लोग उनके पक्ष में मतदान नहीं करते हैं। उनको यह भी पता है कि तृणमूल के खिलाफ वोट करने वाले राज्य के करीब 55 फीसदी मतदाताओं में से कौन भाजपा को वोट करता है और कौन कांग्रेस, लेफ्ट या दूसरी पार्टियों को वोट करता है। मतदान से पहले ही ऐसे मतदाताओं को किसी न किसी रूप में धमकियां पहुंचने लगती है। 2021 के विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद जैसी हिंसा हुई और जितने लोग मारे गए उसका संदेश व्यापक स्तर पर गया। लोगों में भय का माहौल और गहरा हुआ। इस बार भी वह अभियान शुरू हो गया है।
लेकिन इस बार चुनाव आयोग ने केंद्रीय बलों की तैनाती की नई प्रक्रिया अपनाई है। एक मार्च से ही केंद्रीय बलों की तैनाती हो रही है और 10 मार्च तक कुल 480 कंपनियों को पश्चिम बंगाल में तैनात किया जाएगा। इसका अर्थ है कि चुनाव की घोषणा होने और अधिसूचना जारी होने से पहले ही केंद्रीय बलों की पर्याप्त तैनाती हो जाएगी। जमीनी स्तर पर इसका कितना लाभ होगा यह नहीं कहा जा सकता है। लेकिन मनोवैज्ञानिक स्तर पर इसका दो तरह से लाभ है। पहला तो यह कि सत्तारूढ़ दल यानी तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को संदेश जाएगा कि केंद्रीय बल उनको मनमानी नहीं करने देंगे। दूसरी ओर तृणमूल विरोधी और खास कर भारतीय जनता पार्टी के मतदाताओं के बीच यह संदेश जाएगा कि केंद्र को उनका ध्यान है और केंद्रीय बल उनको सुरक्षा प्रदान करेंगे। इस मनोवैज्ञानिक संदेश का कितना फायदा भाजपा के नेता उठा पाते हैं यह देखने वाली बात होगी।
परंतु यह स्पष्ट है कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के काम में जीरो टालरेंस के सिद्धांत यानी जरा सा भी समझौता नहीं करने के सिद्धांत की वजह से बड़ी संख्या में फर्जी मतदाताओं के नाम कट रहे हैं। और दूसरे, केंद्रीय बलों की तैनाती से लोगों में यह भरोसा बन रहा है कि उन्हें असामाजिक तत्वों या राजनीतिक बाहुबलियों से डरने की जरुरत नहीं है। इन दोनों चीजों को अगर भाजपा अपने एडवांटेज में बदलती है तो पश्चिम बंगाल में चुनाव की तस्वीर बदल सकती है। चुनाव आयोग द्वारा एसआईआर में कोई समझौता नहीं करने, सुप्रीम कोर्ट की ओर से एसआईआर की अनिवार्यता स्वीकार करने और केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से केंद्रीय बलों की समय से पहले तैनाती से सत्तारूढ़ दल के ऊपर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ा है। इसका एक असर यह हो सकता है कि बड़ी संख्या में तृणमूल कांग्रेस के समर्थक दूसरी तरफ भी अपनी पोजिशनिंग करने लगें या कम से कम दूरी बनाना शुरू कर दें। अपने को मिडिल ऑफ द रोड लाने लगें। यह स्थिति भी भाजपा के लिए सुखद होगी। अगर तृणमूल के समर्थकों का एक वर्ग तटस्थ होने लगता है तो भाजपा का बड़ा काम अपने आप हो जाएगा।
इस बार के विधानसभा चुनाव की एक परिघटना, जिसकी हम बार बार चर्चा कर रहे हैं वह ये है कि पहली बार इतनी बड़ी संख्या में बंगाली हिंदुओं में मुस्लिम समाज को लेकर चिंता पैदा हुई है। इससे पहले भाषा, संस्कृति, खान-पान, पहनावे आदि की समानता की वजह से बंगाली हिंदू समाज गैर बांग्ला भाषी हिंदुओं के मुकाबले अपने को मुस्लिम समाज के ज्यादा नजदीक पाता था। लेकिन अब पहली बार ऐसा लग रहा है कि वे चिंता में हैं और यह चिंता प्रकट भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि गैर बांग्ला हिंदू तो अपने राज्य लौट सकते हैं। उनके पास विकल्प है। लेकिन बांग्लाभाषी हिंदू कहां जाएंगे? जब यह चिंता पैदा हुई तो फिर उनकी नजर इस बात पर भी गई कि अनेक जिलों में जनसंख्या संरचना बदल रही है। शहरों में भी मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ रही है। यह सिर्फ आबादी बढ़ने यानी जनसंख्या वृद्धि दर की वजह से नहीं है, बल्कि घुसपैठ के कारण भी है।
इस बार भारतीय जनता पार्टी ने घुसपैठ को जितने आक्रामक तरीके से मुद्दा बनाया है औऱ उसे खत्म करने का संकल्प जाहिर किया है उससे भी बांग्लाभाषी हिंदुओं में उम्मीद बढ़ी है। सो, कह सकते हैं कि घुसपैठ और जनसंख्या संरचना बदलने का मुद्दा बड़ा राजनीतिक अंतर ला सकता है और साथ ही एसआईआऱ और केंद्रीय बलों की तैनाती भी असर डाल सकती है। इन सबका साझा प्रभाव यह है कि पश्चिम बंगाल के चुनाव में मुकाबला नजदीकी होता जा रहा है। भले ऊपर से जैसी तस्वीर दिख रही हो लेकिन जमीनी हालात तेजी से बदल रहे हैं। बदलाव की यह आहट तृणमूल कांग्रेस के लोग भी सुन रहे हैं तभी उधर चिंता और घबराहट बढ़ी है तो दूसरी ओर भाजपा का मनोबल बढ़ा है। (लेखक दिल्ली में सिक्कम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)
