भोजपुरी केवल एक बोली नहीं, बल्कि गंगा-सरयू-गंडक के दोआब से लेकर समुद्र पार मॉरीशस, सूरीनाम, फ़िज़ी, त्रिनिदाद तक फैली एक विश्वव्यापी सांस्कृतिक भाषा है। इसे बोलने वालों की संख्या लगभग 20 करोड़ है। यही वह भाषा है जो प्रवासी भारतीयों के बीच पहचान, स्मृति और स्वाभिमान की मुख्य कड़ी बनी हुई है।
21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर विशेष
हर साल 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। यह भाषायी विविधता, मातृभाषा के सम्मान और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण की वैश्विक प्रतिबद्धता का प्रतीक है। इस दिन हमें न केवल अपनी मातृभाषा की गरिमा को स्मरण करना है, बल्कि यह भी सोचना चाहिए कि भारत जैसे बहुभाषी राष्ट्र में करोड़ों लोगों की मातृभाषा भोजपुरी आज भी संवैधानिक मान्यता के लिए संघर्षरत क्यों है? भोजपुरी की यह मांग अब केवल भाषायी आग्रह नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता और समावेशी नीति की कसौटी बन चुकी है। सवाल यह नहीं कि भोजपुरी कब तक ठुकराई जाएगी, असली सवाल यह है कि भारत अपनी ही जनता की आवाज़ को कब तक अनसुना करता रहेगा।
भोजपुरी केवल एक बोली नहीं, बल्कि गंगा-सरयू-गंडक के दोआब से लेकर समुद्र पार मॉरीशस, सूरीनाम, फ़िज़ी, त्रिनिदाद तक फैली एक विश्वव्यापी सांस्कृतिक भाषा है। इसे बोलने वालों की संख्या लगभग 20 करोड़ है। यही वह भाषा है जो प्रवासी भारतीयों के बीच पहचान, स्मृति और स्वाभिमान की मुख्य कड़ी बनी हुई है। भारतीयता के उस रूप का प्रतिनिधित्व करती है जो मज़दूरों के पसीने, लोकगीतों, चैन-चलन और संघर्षों से बुनी गई है, न कि केवल दरबारों, विश्वविद्यालयों और शास्त्रीय सभाओं से। फिर भी भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में भोजपुरी का नाम अनुपस्थित है, जबकि उससे कहीं कम जनसंख्या वाली अनेक भाषाएं इस सूची में स्थान पा चुकी हैं। यह विसंगति तब और चुभती है जब हम देखते हैं कि आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं को शिक्षा, प्रशासन, प्रतियोगी परीक्षाओं, अनुवाद कार्य, प्रकाशन, साहित्यिक संस्थानों और सरकारी योजनाओं में स्पष्ट लाभ और प्राथमिकता मिलती है। लिहाजा उनकी संस्थागत प्रतिष्ठा और विकास की गति तेज़ होती है। भोजपुरी को अभी भी ‘बोली’, ‘उपभाषा’ या ‘लोकभाषा’ जैसे अस्पष्ट और हाशिए के दर्जों में रखा गया है, जो राजनीतिक टालमटोल और नीतिगत उदासीनता का परिणाम है। लोकतांत्रिक दृष्टि से यह स्थिति न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि संवैधानिक भावना के भी विपरीत है, क्योंकि संविधान का भाग 17 (अनुच्छेद 343 से 351) भाषीय विविधता को संरक्षित करने और समान अवसर प्रदान करने का वादा करता है।
संविधान की आठवीं अनुसूची मूल रूप से हिंदी के विकास को बढ़ावा देने और भारतीय भाषाओं के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई थी। पर, समय के साथ यह भाषायी शक्ति संतुलन, संसाधन वितरण और राजनीतिक लाभ का औज़ार बन गई। वर्तमान ढांचे में एक ओर हिंदी और संस्कृत जैसी ‘प्रमुख’ भाषाएं हैं, दूसरी ओर अनुसूचित 22 भाषाएं, और इनके नीचे ‘ग़ैर अनुसूचित’ भाषाओं की एक लंबी सूची फैली हुई है, जिन्हें प्रायः ‘डायलेक्ट’, ‘ट्राइबल लैंग्वेज’ या ‘माइनर लैंग्वेज’ कह कर हाशिए पर धकेल दिया जाता है। इस संरचना ने भारत में ‘अनुक्रमिक बहुभाषिकता’ की स्थिति उत्पन्न कर दी है, जिसमें कुछ भाषाएं संवैधानिक रूप से शक्तिशाली और संसाधन संपन्न हैं, तो कुछ स्थायी रूप से कमतर और वंचित। ऐसी व्यवस्था में न तो सच्चा भाषायी न्याय संभव है, न ही सांस्कृतिक लोकतंत्र की कल्पना की जा सकती है। इसलिए भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग केवल एक भाषा विशेष की नहीं, बल्कि एक समग्र, पारदर्शी और न्यायसंगत भाषा नीति की मांग है।
ऐसी नीति में सबसे पहले आठवीं अनुसूची में किसी भाषा को शामिल करने या न करने के मापदंडों को स्पष्ट, सार्वजनिक और तर्कसंगत बनाना होगा। मसलन जनसंख्या, भौगोलिक प्रसार, साहित्यिक परंपरा, शैक्षिक उपयोगिता, प्रशासनिक आवश्यकता और सांस्कृतिक महत्व। दूसरा, भाषाओं को चार-पांच स्तरों में विभाजित करने के बजाय, विविधता को समान गरिमा के साथ स्वीकार करने वाली एक समतामूलक नीति की आवश्यकता है, जिसमें सभी भारतीय भाषाओं के लिए शिक्षा, न्याय, प्रशासन, मीडिया और डिजिटल क्षेत्र में स्पष्ट रोडमैप हो। तीसरा, भाषायी अल्पसंख्यकों और ग़ैर अनुसूचित भाषाओं के लिए विशेष कोटा, अनुवाद निधि, डिजिटल सामग्री विकास और शोध अनुदान जैसे व्यावहारिक कदम उठाए जाएं। जब तक ऐसी व्यापक भाषा नीति नहीं बनेगी, तब तक भोजपुरी जैसे भाषायी समुदाय बार-बार संसद के सामने ज्ञापन, विधेयक प्रस्ताव और सांस्कृतिक सम्मेलनों के माध्यम से अपनी मांग दोहराते रहेंगे, और हर सरकार इसे ‘विचाराधीन’, ‘समिति के अध्ययनाधीन’ या ‘भविष्य में विचार करने योग्य’ बताकर टालती रहेगी। यह प्रक्रिया न केवल समय की बरबादी है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।
भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता न मिलने के व्यावहारिक नुकसान गंभीर और बहुआयामी हैं। प्रथम, शिक्षा के क्षेत्र में यह सबसे बड़ा रोड़ा है। अनुसूचित भाषाओं के लिए पाठ्यपुस्तकें, पाठ्यक्रम, अध्यापक प्रशिक्षण, शोधवृत्तियां और विश्वविद्यालयीन अध्यापन पद उपलब्ध होते हैं, किंतु भोजपुरी माध्यम से औपचारिक शिक्षा का मार्ग लगभग अवरुद्ध है। इसके फलस्वरूप भोजपुरी में उच्चकोटि का मौखिक साहित्य, लोक-कथाएं, गीत और ज्ञान-परंपराएं मौजूद हैं, किंतु उनका संस्थागत दस्तावेज़ीकरण, संरक्षण और अंतरपीढ़ी हस्तांतरण कमज़ोर पड़ रहा है। ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों के बच्चे अपनी मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा न पा सकने के कारण सीखने की प्रक्रिया से ही वंचित हो जाते हैं, जो उनकी संज्ञानात्मक विकास को प्रभावित करता है।
दूसरा प्रमुख नुकसान प्रशासनिक और न्यायिक पहुंच का है। अनुसूचित भाषाओं के लिए सरकारी राजपत्र, फॉर्म, शिकायत पोर्टल, प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र, लोकसभा, राज्यसभा कार्यवाहियों का अनुवाद और केंद्रीय योजनाओं का प्रचार-प्रसार संभव होता है। किंतु भोजपुरी बोलने वाले करोड़ों नागरिकों को अपनी शिकायतें, अधिकार-मांग या सरकारी लाभ व्यक्त करने के लिए या तो हिंदी-अंग्रेज़ी का सहारा लेना पड़ता है, या चुप रह जाना पड़ता है। यह स्थिति विशेषकर उन प्रवासी और ग्रामीण समुदायों में आम है जहां साक्षरता दर कम है और भाषायी आत्मविश्वास की कमी है।
तीसरा नुकसान सामाजिक-मानसिक है, प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान का। जब कुछ भाषाओं को ‘पूर्ण भाषा’ का संवैधानिक दर्जा मिलता है और बाकी को ‘सिर्फ बोली’ कह दिया जाता है, तो एक सामाजिक-मानसिक पदानुक्रम स्थापित हो जाता है। इससे भोजपुरी भाषी युवा पीढ़ी अपनी मातृभाषा से विमुख हो जाती है, उसे ‘ग्रामीण’, ‘अशिष्ट’ या ‘बाज़ारू’ मान लेती है। यह वह समय है जब संसद में रवि किशन जैसे सांसद विधेयक पेश कर चुके हैं, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मांगें उठाई गई हैं, और भोजपुरी सम्मेलनों में संकल्प लिए जाते रहे हैं, किंतु निर्णय की घड़ी हर बार टल जाती है।
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के दौर में यह प्रश्न और भी तीव्र हो जाता है, क्योंकि भाषा अब केवल भावनात्मक या सांस्कृतिक मुद्दा नहीं, बल्कि तकनीकी और आर्थिक पूंजी का विषय बन चुकी है।
कुछ स्वतंत्र शोधकर्ता और ओपन-सोर्स समुदाय सीमित संसाधनों से भोजपुरी एआई मॉडल फ़ाइन-ट्यून करने का प्रयास कर रहे हैं, किंतु वे स्वयं मानते हैं कि डाटा की कमी, वर्तनी-अभाव और संस्थागत समर्थन न होने से परिणाम मिश्रित हैं। इस ‘डिजिटल अनुपस्थिति’ के दुष्परिणाम गंभीर हैं: एआई आधारित शिक्षा-सहायक (ट्यूटर्स, ई-लर्निंग ऐप्स) भोजपुरी में उपलब्ध न होने से ग्रामीण और प्रवासी छात्र मातृभाषा में सीखने से वंचित हैं। कृषि सलाह, स्वास्थ्य जागरूकता, कानूनी सहायता जैसे क्षेत्रों में लोकभाषा आधारित एआई टूल्स न होने से विकास कार्यों की पहुंच सीमित रहती है। सांस्कृतिक सामग्री जैसे लोकगीत, कहानियां, चैन-भजन आदि का डिजिटलीकरण, खोज और अनुशंसा, तंत्र कमज़ोर होने से नई पीढ़ी वैश्विक प्लेटफ़ॉर्म्स पर अपनी भाषा में सामग्री नहीं खोज पाती है। संवैधानिक मान्यता भोजपुरी को एआई में तत्काल दक्षता न दे, किंतु नीति संकेत अवश्य देगी कि यह भाषा शोध, स्टार्टअप्स, उद्योग और सरकारी निवेश की हक़दार है।
गृह मंत्रालय के समक्ष वर्षों से लंबित मांगों पर गठित उच्चस्तरीय समिति ने स्वयं स्वीकार किया है कि आठवीं अनुसूची में भाषा समावेश के लिए कोई स्पष्ट, सर्वस्वीकृत मापदंड नहीं हैं, और वर्तमान प्रक्रिया कई स्तरों पर तर्कसंगत कमियों से ग्रस्त है। यदि मापदंड अस्पष्ट हैं, तो प्रथम कर्तव्य उन्हें निर्धारित करना है, न कि इस अस्पष्टता का लाभ उठाकर भोजपुरी जैसी सशक्त लोकभाषा को अनिश्चितकाल के लिए ‘विचाराधीन’ की कोठरी में बंद रखना। भोजपुरी को मान्यता देना किसी अन्य भाषा के अधिकार को घटाना नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में भाषायी न्याय के दायरे को विस्तृत करना है।
विश्व मातृभाषा दिवस के इस अवसर पर समग्र भाषा नीति, पारदर्शी मापदंडों और एआई युग की अनिवार्यताओं का समन्वय करते हुए यदि आज निर्णय न लिया गया, तो इतिहास दर्ज करेगा कि भारत ने अपनी ही एक जीवंत, विश्वव्यापी लोकभाषा को अनावश्यक संकोच, राजनीतिक संकीर्णता और नीतिगत सुस्ती के कारण विलंब से स्वीकार किया। सवाल अब यह नहीं कि भोजपुरी तैयार है या नहीं; प्रश्न यह है कि नीति निर्माता कब तैयार होंगे यह मानने के लिए कि सच्चा लोकतंत्र भाषा के सम्मान को मंचों की घोषणाओं से नहीं, संविधान की पंक्तियों में अंकित फैसलों से मापता है। भोजपुरी केवल 20 करोड़ लोगों की नहीं, भारत की सांस्कृतिक आत्मा की पुकार है। इसे अनसुना करना भारत की अपनी विविधता के साथ विश्वासघात होगा। (लेखक साहित्य अकादमी के पूर्व सदस्य, मैथिली भोजपुरी अकादमी दिल्ली सरकार के पूर्व उपाध्यक्ष और भारतीय भाषाओं के पैरोकार हैं।)
