कांग्रेस चुनाव लड़ भी रही है या नहीं?

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भारतीय जनता पार्टी की चुनाव तैयारियों के साथ कांग्रेस की तैयारियों की तुलना करें तो दिखेगा कि कांग्रेस मीलों पीछे है। यह भी कह सकते हैं कि कांग्रेस ने अभी तैयारी शुरू ही नहीं की है, जबकि वह तमिलनाडु को छोड़ कर हर चुनावी राज्य में विपक्ष में है। विपक्षी पार्टी के नेताओं के पास स्वाभाविक रूप से राजनीति करने के लिए ज्यादा समय होता है, लेकिन कांग्रेस और भाजपा की चुनाव तैयारियों में जमीन आसमान का अंतर है।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती शुरू हो गई है। अप्रैल के अंत तक चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। इसलिए मार्च में यानी अगले महीने किसी समय चुनाव की घोषणा होगी। लेकिन देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस कहीं भी चुनाव लड़ती नहीं दिख रही है। अगर भारतीय जनता पार्टी की चुनाव तैयारियों के साथ कांग्रेस की तैयारियों की तुलना करें तो दिखेगा कि कांग्रेस मीलों पीछे है। यह भी कह सकते हैं कि कांग्रेस ने अभी तैयारी शुरू ही नहीं की है, जबकि वह तमिलनाडु को छोड़ कर हर चुनावी राज्य में विपक्ष में है। विपक्षी पार्टी के नेताओं के पास स्वाभाविक रूप से राजनीति करने के लिए ज्यादा समय होता है, सरकार को घेरने वाले मुद्दे होते हैं और उसे ज्यादा मेहनत करने की जरुरत भी होती है। दूसरी ओर भाजपा भी असम और पुडुचेरी को छोड़ कर तीनों बड़े राज्यों में विपक्षी पार्टी है। लेकिन कांग्रेस और भाजपा की चुनाव तैयारियों में जमीन आसमान का अंतर है।

पांच राज्यों के चुनाव में निश्चित रूप से पश्चिम बंगाल का चुनाव सबसे अहम है। वहां भाजपा 75 विधायकों के साथ मुख्य विपक्षी पार्टी है। 2021 के विधानसभा चुनाव में वह 77 सीट के साथ दूसरे नंबर की पार्टी बन कर उभरी थी। लेकिन उससे ठीक पहले यानी 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के सिर्फ तीन विधायक थे और कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी के तौर पर उभरी थी। बंगाल के लोगों ने कांग्रेस को मुख्य विपक्षी पार्टी बनाया था। लेकिन पांच साल के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस जीरो पर आ गई और तीन विघायक वाली भाजपा 77 सीटें जीत गई। यह देख कर हैरानी होती है कि 44 सीट से जीरो पर पहुंची कांग्रेस अपनी स्थिति में सुधार के लिए कुछ नहीं कर रही है।

दूसरी ओर 77 सीट को दोगुना करके बहुमत हासिल करने के लिए भारतीय जनता पार्टी दिन रात मेहनत कर रही है। एक महीने में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तीसरी बार पश्चिम बंगाल के दौरे पर पहुंचे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी एक महीने में दो बार बंगाल के दौरे पर आ चुके हैं। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री हर बार पश्चिम बंगाल और असम का दौरा एक साथ कर रहे हैं। दोनों राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने भी पश्चिम बंगाल का दौरा किया और जनसभाओं को संबोधित किया। लेकिन कांग्रेस के नेता राहुल गांधी कितने दिनों से इन दोनों राज्यों के दौरे पर नहीं गए हैं यह अंदाजा लगाना मुश्किल है। वे विपक्ष में रह कर भी राज्यों के दौरे पर नहीं जाते हैं और न राज्यों में पार्टी संगठन को मजबूत करने के लिए कुछ करते हैं। यह भी तय नहीं है कि कांग्रेस पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी या पिछली बार की तरह सीपीएम के नेतृत्व वाले लेफ्ट मोर्चे से तालमेल होगा। पिछली बार इस तालमेल का कोई फायदा दोनों पार्टियों को नहीं हुआ था लेकिन उधर केरल में कांग्रेस को इसका नुकसान हो गया था।

बहरहाल, पश्चिम बंगाल में भाजपा हर तरह से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी यात्राओं में हजारों करोड़ रुपए की परियोजनाओं के उद्घाटन और शिलान्यास कर रहे हैं। संगठन के स्तर पर पार्टी के सभी नेताओं की एकजुटता बनवाई जा रही है। अपनी पिछली यात्रा में अमित शाह ने पूर्व अध्यक्ष दिलीप घोष को पार्टी की एक अहम बैठक में बुलाया और उनको सक्रिय होकर काम करने के निर्देश दिए। प्रदेश अध्यक्ष पद से हटने के बाद उनकी सक्रियता कम हो गई थी। इस बीच वे दीघा में जगन्नाथ धाम मंदिर के उद्घाटन के समय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ भी दिखे थे। उसके बाद से उनकी नाराजगी की चर्चा चल रही थी। अमित शाह ने खुद बुला कर उनसे बात की, जिससे उनकी अगर कोई नाराजगी थी तो वह दूर हुई। पार्टी के सभी नेताओं के बीच समन्वय बनाया जा रहा है। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री दोनों ने घुसपैठ को सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया है।

बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा इस पार पश्चिम बंगाल के लोगों की दुखती रग है। पहले बांग्ला बोलने वाले हिंदुओं के लिए यह बड़ी समस्या नहीं होती थी। वे बांग्लादेशी मुसलमानों के साथ बहुत सहज होते थे क्योंकि दोनों की बोली, भाषा, खान-पान, पहनावा एक जैसा होता था। भाषा और सांस्कृतिक पहचान उनको जोड़े हुए होती थी, जिससे घुसपैठ का मुद्दा उठाने के बावजूद भाजपा चुनाव जीतने लायक बहुमत नहीं जुटा पाती थी। इस बार वह स्थिति बदली हुई दिख रही है। बंगाली हिंदू भी घुसपैठियों से परेशान है और मन ही मन भाजपा के इस एजेंडे का समर्थन कर रहा है। हो सकता है कि इस बार पहले के मुकाबले बांग्ला बोलने वाले हिंदुओं का ज्यादा वोट भाजपा को मिले। यह किसी राजनीतिक बदलाव की आकांक्षा से ज्यादा उनकी निजी परेशानियों और चिंताओं से निर्देशित होगा। घुसपैठियों के कारण एक के बाद एक जिले में बदलती जनसंख्या संरचना से वे चिंता में हैं। उनको लग रहा है कि अगर घुसपैठ नहीं रूकी और जनसंख्या संरचना बदलती रही तो उनकी और आने वाली पीढ़ियों का जीवन मुश्किल होगा। इस चिंता में वे भारतीय जनता पार्टी को वोट कर सकते हैं। इसलिए कह सकते हैं कि भाजपा ने बंगाली लोगों की दुखती रग पहचानी है और उसे बड़े राजनीतिक व चुनावी मुद्दे में बदल दिया है। दूसरी ओर ममता बनर्जी सनातनी वोट के लिए मंदिर बनवा रही हैं। दीघा में जगन्नाथ धाम के बाद न्यू कोलकाता टाउन में दुर्गा मंदिर और सिलिगुड़ी में शिव मंदिर का शिलान्यास किया है। परंतु उनकी समस्या यह है कि सनातनी वोट साथ नहीं आ रहा है और मुस्लिम वोट में टूट की संभावना पैदा हो गई है। हुमायूं कबीर की जेयूपी का असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम, नौशाद सिद्दीकी की आईएसएफ और बदरूद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ से गठबंधन तय प्रतीत होता है। वरिष्ठ वामपंथी नेता मोहम्मद सलीम की हुमायूं कबीर से साथ बैठकें भीतरी गठजोड़ का संकेत दे रही हैं।

चुनाव तैयारियों में एक अहम पहलू मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआऱ का है। देश के दूसरे किसी भी राज्य के मुकाबले एसआईआर का मुद्दा पश्चिम बंगाल में ज्यादा विवादित हुआ है। पहले तो यही लगा था कि मसौदा सूची में जिन 58 लाख लोगों के नाम नहीं हैं उनके ही नाम कटेंगे। लेकिन बाद में 32 लाख अनमैप्ड मतदाताओं को नोटिस भेजा गया और उसके बाद सवा करोड़ लोगों को लॉजिकल डिस्क्रिपेंसीज के नाम पर नोटिस भेजा गया। इसे लेकर राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट गई तो लोगों को 10 दिन की राहत मिली। अदालत ने 10 दिन में सभी लोगों को दस्तावेज जमा कराने के निर्देश दिए। इन तीनों श्रेणियों को मिला कर बड़ी संख्या में लोगों के नाम कटने की संभावना है। हालांकि अभी अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन में देरी हो रही है। चुनाव आय़ोग ने कहा है वह 14 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची नहीं जारी कर पाएगा। अगर इसमें देरी होती है तो समय से चुनाव होने पर भी सवाल खडे होंगे।

इस पूरे प्रकरण में सबसे दिलचस्प यह है कि इसमें कही भी कांग्रेस पार्टी नहीं दिख रही है। बिहार में जब एसआईआऱ की प्रक्रिया शुरू हुई तो कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 15 दिन की एक यात्रा निकाली। उन्होंने सभी गठबंधन दलों को लेकर वोटर अधिकार यात्रा निकाली। लेकिन दूसरे चरण में पांच चुनावी राज्यों सहित 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर शुरू हुई तो राहुल गांधी कहीं दिखाई नहीं दिए। उनका कोई बयान भी नहीं आया। उनकी पार्टी कहीं भी एसआईआऱ की प्रक्रिया में शामिल नहीं दिख रही है। इस तरह हर स्तर पर चुनाव तैयारी में भाजपा और कांग्रेस के बीच अंतर दिख रहा है। भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और नए अध्यक्ष नितिन नबीन दौरे कर रहे हैं, रणनीति बना रहे हैं, केंद्र सरकार की ओर से अनेक तरह के फैसले हो रहे हैं, जिनसे राज्यों में आम लोगों के प्रति भाजपा की ओर रूझान बढ़ रहा है तो दूसरी ओर राहुल गांधी इस साल के पहले महीने में ही दो विदेश दौरे कर चुके हैं। कम से कम पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की न तो कोई तैयारी है, न कोई गठबंधन है, न कोई रणनीति है और न उसके पास कोई मुद्दा है।

कमोबेश यही हाल असम का है। वहां भाजपा 10 साल से सत्ता में है लेकिन कांग्रेस कोई सत्ता विरोधी माहौल नहीं बना पाई है। उलटे भाजपा ने चुनाव से ठीक पहले घुसपैठ को केंद्रीय मुद्दा बना दिया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अपने ताजा दौरे में कहा कि भाजपा की सरकार बनी तो एक एक घुसपैठिए को बाहर निकाला जाएगा। उन्होंने इस कार्यकाल में असम की बाढ़ की समस्या को पूरी तरह से समाप्त कर देने का वादा किया। वहां भी पूरी पार्टी एकजुट होकर लड़ रही है। प्रधानमंत्री के दो और गृह मंत्री के तीन दौरे एक महीने में हुए हैं। परंतु वहां भी राहुल गांधी नदारद हैं। पिछली बार बदरूद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ और हाग्रामा मोहिलारी की बीपीएफ से तालमेल करके कांग्रेस ने चुनाव लड़ा था। इस दोनों सहयोगी उससे अलग हैं।

राहुल गांधी ने चुनावी राज्यों में सिर्फ तमिलनाडु और केरल का दौरा किया। वास्तविकता यह है कि तमिलनाडु में कांग्रेस को कुछ नहीं करना है। कांग्रेस वहां एक गठबंधन का हिस्सा है। 234 सदस्यों की विधानसभा में कांग्रेस पिछली बार सिर्फ 25 सीट लड़ी थी और इस बार भी डीएमके ने साफ कर दिया है कि वह कांग्रेस को इससे ज्यादा सीट नहीं देगी। कितनी हैरानी की बात है कि कांग्रेस को तमिलनाडु विधानसभा की कुल सीट का 10 फीसदी लड़ना है। लेकिन वह राहुल गांधी और कांग्रेस की प्राथमिकता में है! केरल में दो बार से चुनाव हार रही कांग्रेस सत्ता प्राप्त करने की संभावना देख रही है। लेकिन वहां भी पार्टी इतने खेमे में बंटी है कि चुनाव से पहले ही संभावनाओं पर ग्रहण लग गया है। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने इन दोनों राज्यों में भी गठबंधन से लेकर रणनीति और नेतृत्व से लेकर मुद्दों तक में बढ़त हासिल की है। तमिलनाडु में फिल्म स्टार विजय की पार्टी डीएमके की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकती है। दूसरी ओर भाजपा ने पहल करके अन्ना डीएमके से निकले नेताओं की एनडीए में वापसी शुरू कराई है और एक व्यापक गठबंधन किया है। त्रिकोणात्मक लड़ाई में इस बार एनडीए बहुत अच्छी स्थिति में है। तमिलनाडु में इस बार केंद्र सरकार ने 13 लोगों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया है। उधर केरल में भाजपा का वोट आधार बढ़ कर 19 फीसदी हो गया है। तभी ऐसा लग रहा है कि जैसे 2019 के लोकसभा और 2021 के विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में भाजपा के पक्ष में चमत्कारिक नतीजे आए थे वैसे नतीजे की उम्मीद केरल में की जा सकती है। लोकसभा में भाजपा त्रिशुर सीट पर जीती और तिरुवनंतपुरम सीट पर सिर्फ 16 हजार वोट से हारी। इस तरह से भाजपा ने उन राज्यों में चुनाव दिलचस्प बना दिया है, जहां वह पारंपरिक रूप से बहुत मजबूत नहीं रही है, जबकि कांग्रेस पारंपरिक रूप से अपने असर वाले इलाकों में भी चुनावी मुकाबले से बाहर दिख रही है।   (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)


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