कांग्रेस ‘वोट चोरी’ का मुद्दा नहीं छोड़ेगी

Categorized as लेख

कांग्रेस पार्टी ने बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों की समीक्षा नहीं की है। राष्ट्रीय जनता दल ने समीक्षा बैठक बुलाई तो उसमें समीक्षा कुछ नहीं हुई, तेजस्वी यादव को विधायक दल का नेता चुना गया। उधर कांग्रेस ने चुनाव नतीजों की समीक्षा की बजाय मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की समीक्षा के लिए बैठक बुलाई।

कांग्रेस मुख्यालय इंदिरा भवन में इस बैठक के लिए राहुल गांधी के पहुंचने की वीडियो कांग्रेस इकोसिस्टम ने सोशल मीडिया में खूब शेयर किया, जिसका कैप्शन था कि, ‘तूफान आ रहा है, एसआईआर की सबसे बड़ी बैठक के लिए पहुंचे राहुल’। वैसे भी राहुल गांधी को आंधी, तूफान, चट्टान और पता नहीं क्या क्या बताने का बड़ा सुनियोजित अभियान सोशल मीडिया में चल रहा है। बहरहाल, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की अध्यक्षता में एसआईआर पर बैठक हुई, जिसमें दिसंबर के पहले हफ्ते में ‘वोट चोरी’ पर दिल्ली के रामलीला मैदान में एक बड़ी रैली करने का फैसला हुआ।

सोचें, राजनीतिक विमर्श की बजाय घूम फिर कर मामला ‘वोट चोरी’ पर पहुंच गया। ऐसा लग रहा है कि राहुल गांधी को चोरी शब्द से बहुत प्रेम है। पहले उन्होंने ‘चौकीदार चोर है’ का नारा लगाया था। उसके बाद उन्होंने ‘सारे मोदी चोर होते हैं’ की बात कही। फिर व्यापारी चोर हैं का नारा लगाया और अब चुनाव आयोग चोर है, जो ‘वोट चोरी’ करा रहा है की बात कर रहे हैं। अभी तक चोरी के उनके आरोपों का कोई लाभ कांग्रेस को या उसकी सहयोगी पार्टियों को नहीं हुआ है। फिर भी ‘वोट चोरी’ का मुद्दा राहुल गांधी के समूचे राजनीतिक विमर्श का केंद्रीय मुद्दा है। असल में कांग्रेस पार्टी की लगातार हार की समीक्षा करने पर राहुल गांधी को सबसे आसान कारण ‘वोट चोरी’ का समझ में आ रहा है। इसलिए वे इसी पर अड़े हैं। लेकिन यह बिल्ली को देख कर कबूतर के आंख बंद कर लेने वाली एप्रोच है। इस बात को राहुल गांधी और उनकी टीम नहीं समझ पा रही है।

यह साधारण सी राजनीतिक बात पता नहीं क्यों कांग्रेस नेताओं को नहीं समझ में आ रही है कि वे अगर मेहनत करते, ईमानदारी से गठबंधन बनाते, राजनीतिक व सामाजिक वास्तविकताओं को ध्यान में रख कर सीटों व टिकटों का बंटवारा करते, प्रचार में दम लगाते और उसके बाद हारते तो वोट चोरी के आरोपों पर लोगों को यकीन भी होता। लेकिन अगर पहले दिन से यह मैसेज हो कि कांग्रेस या उसके गठबंधन सहयोगी अच्छे तरीके से नहीं लड़ रहे हैं तो फिर ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर कोई कैसे भरोसा करेगा? ध्यान रहे अच्छे से लड़ना चुनाव जीतने की गारंटी नहीं है लेकिन अच्छे से लड़ कर हारने पर लोगों की सहानुभूति मिलती है और समर्थन बढ़ता है। कांग्रेस यह काम नहीं कर पा रही है। बिहार का चुनाव ताजा मिसाल है।

बिहार में कांग्रेस पहले दिन से अपने ही गठबंधन का खेल बिगाड़ने में लगी रही। उसने ऐन चुनाव से पहले तमाम जनाधार वाले नेताओं को हटा दिया और कांग्रेस में नौकरी करने वाले नेताओं को गठबंधन संभालने और चुनाव लड़ाने के काम में लगाया। तेजस्वी को रोकने के लिए सारे प्रयास किए तो लेफ्ट को उसका लेनिनग्राद कहे जाने वाले बेगूसराय में खत्म करने के लिए राहुल गांधी व प्रियंका गांधी वाड्रा दोनों ने पूरी मेहनत की। बदले में लेफ्ट ने भी कांग्रेस की जीती हुई सीटों पर अपने उम्मीदवार देकर उसको हरवाया। राहुल ने बिना मतलब एसआईआर के मुद्दे पर 16 दिन बिहार में यात्रा की और उसके बाद 57 दिन तक बिहार का रुख नहीं किया।

वैसे भी बिहार चुनाव को लेकर कोई भ्रम कभी नहीं था। इस बार पहले दिन से कोई मुकाबला नहीं था। यह चुनाव 2010 की तरह पहले दिन से दिख रहा था। 2010 में केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और एसवाई कुरैशी मुख्य चुनाव आयुक्त थे तो बिहार में जनता दल यू और भाजपा गठबंधन को 206 सीटें आई थीं। उस समय लालू प्रसाद और रामविलास पासवान एक साथ लड़े थे और कांग्रेस अलग लड़ी थी। उस चुनाव में एनडीए को 39 फीसदी वोट मिला था।

उसके बाद मोटे तौर पर हर चुनाव में उसका वोट इतना ही रहा। इस बार उसमें चिराग पासवान की वजह से नया वोट जुड़ा, जो चुनाव के पहले से जुड़ता दिख रहा था। सवाल है कि 2010 में 206 सीट मिलने पर कोई सवाल नहीं उठाने वाली कांग्रेस एक ज्यादा बड़े गठबंधन को 202 सीट मिलने पर ‘वोट चोरी’ के आरोप क्यों लगा रही है? इस तर्क के जवाब में ज्यादा समझदार लोग कहते हैं कि यह मामला इतना सरल नहीं है। लेकिन इसकी जटिलता भी कोई नहीं समझा रहा है। कोई भी व्यक्ति यह नहीं समझा रहा है कि एसआईआर से ‘वोट चोरी’ कैसे हुई है?

अपनी हाइड्रोजन बम वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने बिहार के जमुई जिले के पांच लोगों को मंच पर बुलाया कि उनका नाम मतदाता सूची से कट गया है। सवाल है कि जब अंतिम मतदाता सूची जारी हुई और सुप्रीम कोर्ट के आदेश से उसको हर बूथ के हिसाब से वार्ड पार्षद के पास, प्रखंड में और चुनाव कार्यालय में उपलब्ध कराया गया और कहा गया कि अधिसूचना जारी होने तक लोग अपना नाम जुड़वाने के लिए आवेदन कर सकते हैं तो इन लोगों ने आवेदन क्यों नहीं किया?

कांग्रेस या राजद के बूथ लेवल एजेंट्स ने इनके नाम जुड़वाने के लिए क्या कोई पहल की थी? यह नहीं बताया गया। हकीकत यह है कि अंतिम मतदाता सूची आने के बाद एक भी आपत्ति चुनाव आयोग को नहीं मिली। उसके बाद यह पहली बार हुआ कि बिहार के एक भी मतदान केंद्र पर रिपोलिंग नहीं हुई। मतदान केंद्रों पर किसी पार्टी के किसी पोलिंग एजेंट ने बोगस वोटिंग की शिकायत नहीं की। इसके बाद भी राहुल गांधी कह रहे हैं कि ‘वोट चोरी’ के खिलाफ रैली करेंगे!

असल में एसआईआर के खिलाफ यात्रा या ‘वोट चोरी’ के खिलाफ रैली से राहुल गांधी कांग्रेस की कमजोरियां छिपा रहे हैं। कम से कम एसआईआर कोई चुनावी मुद्दा नहीं है और न एसआईआर के जरिए ‘वोट चोरी’ हो रही है। उलटे एसआईआर के जरिए ‘वोट चोरी’ का रास्ता बंद हो रहा है। बोगस वोटिंग की शिकायत बिहार में इसलिए नहीं मिली क्योंकि बोगस नाम कट गए थे। हालांकि हो सकता है कि एसआईआर में कुछ कमियां हों। लेकिन उसका समाधान यह है कि पार्टियां अपने बूथ लेवल एजेंट्स के जरिए गड़बड़ियों को न्यूनतम रखने का प्रयास करें। ‘वोट चोरी’ के आरोप भी सोच समझ कर लगाना चाहिए।

महात्मा गांधी ने जब चंपारण में पहला सत्याग्रह किया तो उसके बाद उन्होंने कहा था कि, ‘सत्य इस रूप में सामने आना चाहिए कि उसे कहीं भी प्रस्तुत किया जा सके और वह गलत नहीं साबित हो’। लेकिन राहुल गांधी का ‘वोट चोरी’ का सत्य सिर्फ उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रस्तुत होता है और उसके बाद हर जांच में गलत साबित हो जाता है। इससे उनकी गंभीरता और साख कम होती है। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कर्नाटक में ‘वोट चोरी’ कर लिया, जबकि वहां कांग्रेस की सरकार थी और लोकसभा चुनाव से एक साल पहले उसी मतदाता सूची और उसी चुनाव आयोग के रहते कांग्रेस ने बड़े बहुमत से जीत हासिल की थी।

यानी भाजपा ने 2023 में ‘वोट चोरी’ नहीं और 2024 में कर ली। 2024 में भी कर्नाटक में जहां कांग्रेस की सरकार थी वहां ‘वोट चोरी’ कर ली लेकिन महाराष्ट्र में जहां खुद भाजपा की सरकार थी वहां नहीं की! वहां बुरी तरह से हार गई। तभी आरोपों में संगति नहीं बैठती है। राहुल को समझना चाहिए कि कम से कम कांग्रेस में उनके नेतृत्व को कोई चुनौती नहीं है। अनंतकाल तक कांग्रेस का सर्वोच्च नेतृत्व उनके परिवार के पास ही रहना है। इसलिए उनसे उम्मीद की जाती है कि वे हार का बहाना ‘वोट चोरी’ में खोजने की बजाय कांग्रेस संगठन को मजबूत करने और मजबूती से चुनाव लड़ने के उपाय करेंगे।


Previous News Next News

More News

क्रॉस वोटिंग का पता कैसे चलेगा?

June 21, 2026

इस बार का झारखंड के राज्यसभा चुनाव से कई दिलचस्प ट्रेंड उभरे हैं। उनमें से एक यह है कि भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार और रिलायंस समूह के परिमल नाथवानी के पक्ष में किसने क्रॉस वोटिंग की? आमतौर पर राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग की जानकारी तुरंत मिल जाती थी क्योंकि हर विधायक को अपना वोट…

बिहार, झारखंड में दांव पर महागठबंधन

June 21, 2026

झारखंड के राज्यसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल के विधायकों के क्रॉस वोटिंग करने की सबसे ज्यादा चर्चा है। जानकार सूत्रों का कहना है कि लालू और तेजस्वी यादव ने अपने विधायकों को नाथवानी के पक्ष में वोट करने को कहा था। इसके तीन कारण बताए गए हैं। पहला तो यह कि रिलायंस समूह और…

भाजपा विधायकों से क्रॉस वोटिंग कराने का कमाल

June 21, 2026

एक तरफ जहां पूरे देश में विपक्षी पार्टियों के सांसद और विधायक भाजपा के पक्ष में या भाजपा समर्थित निर्दलीय के पक्ष में क्रॉस वोटिंग कर रहे हैं वही दूसरी ओर कर्नाटक में विधान परिषद के चुनाव में भाजपा के विधायकों ने कांग्रेस उम्मीदवार के समर्थन में क्रॉस वोटिंग की। भाजपा के कितने विधायकों ने…

उद्धव के विधायक, पार्षद तोड़ने की तैयारी

June 21, 2026

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की समस्याएं समाप्त होने का नाम नहीं ले रही हैं। पार्टी टूटने के बाद का घटनाक्रम उनके लिए मिश्रित था। उनकी पार्टी और गठबंधन ने लोकसभा चुनाव में बहुत शानदार प्रदर्शन किया लेकिन विधानसभा चुनाव में हार गए। वहां तक ठीक था। लेकिन बृहन्नमुंबई महानगर निगम यानी बीएमसी का चुनाव हारने…

योग शिक्षकों के भविष्य पर सवाल

June 21, 2026

देश के कई विश्वविद्यालयों से योग में बीए, एमए और पीजी डिप्लोमा करने वाले युवाओं का कहना है कि पढ़ाई के दौरान उन्हें बताया जाता है कि योग का क्षेत्र बहुत व्यापक है, लेकिन वास्तविकता में सरकारी नौकरियां बेहद सीमित हैं।   स्कूलों में योग शिक्षकों के नियमित पद बहुत कम हैं। अधिकांश राज्यों में योग…

logo