बिहार ‘जंगल राज’ की ओर नहीं लौटेगा!

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बिहार विधानसभा चुनाव को मदर ऑफ ऑल इलेक्शनकहा जाता है। इसका कारण यह है कि सबसे ज्यादा राजनीतिक प्रयोग बिहार में होते हैं। सबसे ज्यादा नारे बिहार में गढ़े जाते हैं और सबसे सघन प्रचार व लोगों की सहभागिता बिहार के चुनाव में होती है। यह संयोग है कि इस बार बिहार का विधानसभा चुनाव लोक आस्था के महापर्व छठ के तुरंत बाद हो रहा है।

बिहार आबादी, क्षेत्रफल, जीडीपी या विधानसभा, लोकसभा सीटों की संख्या के किसी भी पैमाने पर देश का सबसे बड़ा राज्य नहीं है। परंतु बिहार विधानसभा का चुनाव पूरे देश की दिलचस्पी का विषय होता है। बिहार की प्रति व्यक्ति आमदनी भले कम है लेकिन प्रति व्यक्ति राजनीतिक समझ और जागरूकता देश में सबसे ज्यादा है। तभी बिहार विधानसभा चुनाव को ‘मदर ऑफ ऑल इलेक्शन’ कहा जाता है। इसका कारण यह है कि सबसे ज्यादा राजनीतिक प्रयोग बिहार में होते हैं। सबसे ज्यादा नारे बिहार में गढ़े जाते हैं और सबसे सघन प्रचार व लोगों की सहभागिता बिहार के चुनाव में होती है।

यह संयोग है कि इस बार बिहार का विधानसभा चुनाव लोक आस्था के महापर्व छठ के तुरंत बाद हो रहा है। देश के अलग अलग हिस्सों में अपने रोजी, रोजगार के सिलसिले में बस गए बिहार के लोगों का बड़ा हिस्सा छठ के लिए अपने गांव, घर को लौटता है। केंद्र और बिहार सरकार ने दिवाली और छठ के अवसर पर लोगों की घर की यात्रा को सुगम बनाने के बहुत प्रभावी उपाय किए हैं। देश के अलग अलग हिस्सों से 11 हजार से ज्यादा विशेष ट्रेनें चलाई गई हैं। एसी और नॉन एसी बसों की भी व्यवस्था की गई है। हर साल छठ के लिए बिहार लौटने वाले लोग बिहार को बदलते देखते हैं। पिछले 20 वर्षों में बिहार में दो स्पष्ट बदलाव हर व्यक्ति को दिखाई देता है। एक है बिहार में बुनियादी ढांचे का विकास और दूसरा है अपराध व हिंसा की समाप्ति व कानून के राज की बहाली।

बिहार एक समय देश की अपराध राजधानी की तरह था, जिसके लिए अदालत ने ‘जंगल राज’ शब्द का प्रयोग किया था और अमेरिका की एक प्रतिष्ठित पत्रिका ने लिखा था कि बिहार में अपहरण एक करियर च्वाइस है। यानी सबसे ज्यादा फलता फूलता उद्योग अपहरण का था। यह लालू प्रसाद यादव और उनके जेल जाने के बाद उनकी जगह मुख्यमंत्री बनीं राबड़ी देवी के शासन का समय था। यह वही समय था, जब बिहार से बेहिसाब पलायन शुरू हुआ। यह ध्यान रखने की बात है कि पलायन और प्रवासन दोनों बिल्कुल अलग अलग चीजें हैं। बिहार से लोगों का प्रवासन बहुत पहले से होता था। बेहतर अवसर की तलाश में लोग दूसरे राज्यों में जाते थे। उस समय का कलकत्ता उनके लिए सबसे आकर्षक गंतव्य था। अब भी लोग बेहतर अवसर की तलाश में दूसरे राज्यों में जाते हैं। यह प्रवासन है। लेकिन 1990 से 2005 के बीच 15 वर्षों में पलायन हुआ। उद्यमी अपना कारोबार बंद करके राज्य से भागे, डॉक्टर अपनी अच्छी भली प्रैक्टिस बंद करके राज्य छोड़ गए, जिसके पास भी सामर्थ्य थी उसने अपने बच्चों को बाहर भेज दिया। यह पलायन था। बिहार के लोगों की स्मृति में आज भी इसकी यादें बिल्कुल ताजा हैं।

प्रधानमंत्री   नरेंद्र मोदी ने 15 अक्टूबर को ‘मेरा बूथ, सबसे मजबूत’ अभियान के दौरान बिहार के भाजपा कार्यकर्ताओं से संवाद किया तो उन्होंने कहा कि भाजपा के कार्यकर्ता बुजुर्ग लोगों को आगे लाएं और 18 से 35 साल की उम्र के जो लोग हैं उनको बिहार के ‘जंगल राज’ के बारे में जानकारी दें।   प्रधानमंत्री ने कहा कि जिन लोगों ने उस काले दौर को भुगता है वे अपनी आंखों देखी कहानियां 18 से 35 साल की उम्र के लोगों को सुनाएंगे तब उनको वास्तविकता का अहसास होगा। तब वे जानेंगे कि बिहार ने डेढ़ दशक तक कैसा दौर देखा है और कैसे एनडीए ने, भाजपा और जनता दल यू ने बिहार को उस दौर से निकाला और कैसे विकास के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ाया। नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए का शासन बिहार को अपराध, हिंसा, नरसंहार, कंगाली और बदहाली से निकाल कर विकास के रास्ते पर लाने का काल रहा है और इस बार के विधानसभा चुनाव में बिहार के लोग इसकी निरंतरता चाहते हैं। वे वापस उस दौर में नहीं लौटना चाहते हैं, जिसकी भयावह कहानियां उनके घर का हर बुजुर्ग सुना सकता है।

बीस साल पहले 2005 में जिस स्थिति में एनडीए को बिहार मिला था उस समय माना जा रहा था कि बिहार का कुछ नहीं हो सकता है। समूचा बुनियादी ढांचा चरमराया हुआ था। स्कूल, कॉलेज, अस्पताल जर्जर अवस्था में थे। चारों तरफ अपराध का बोलबाला था। अपराध के संगठित गिरोह थे, जिनका दायरा देश भर में फैला हुआ था। सरकार में आने के बाद एनडीए ने सबसे पहले कानून व्यवस्था की बहाली सुनिश्चित की। संगठित अपराध पर निर्णायक प्रहार हुआ। सारे अपराधी गिरोह के सरगना या तो जेल भेजे गए या पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारे गए। लोगों के मन में बैठे भय को सरकार ने बाहर निकाला और उसके बाद डर से होने वाला पलायन रूका। लोग वापस लौटने लगे। बिहार छोड़ गए लोगों ने वापस बिहार में जमीनें खरीदनी शुरू की और घर बनाए जाने लगे। उसके बाद सरकार ने बुनियादी ढांचे का विकास शुरू किया, जिसे बिहार के किसी भी हिस्से में महसूस किया जा सकता है।

नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने सबसे पहले बिहार में ही स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था लागू की। महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए सरकार ने स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए पोशाक और साइकिल की योजना शुरू की। पोशाक और साइकिल ने किस तरह से स्कूलों में बच्चियों की उपस्थिति बढ़ा दी, इसका अध्ययन दुनिया भर में किया गया। महिला सशक्तिकऱण की नीतियों की निरंतरता के तहत ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शराबबंदी का फैसला किया और इस बार विधानसभा चुनाव से पहले सरकारी नौकरियों में बिहार के महिलाओं के लिए 35 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की। सरकार ने मुख्यमंत्री महिला उद्यमी योजना के तहत एक करोड़ 21 लाख महिलाओं के खाते में 10-10 हजार रुपए नकद भेजे हैं और उन्हें नया उद्यम शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया है।

महिलाओं के साथ साथ सरकार ने युवाओं के लिए भी अनेक योजनाएं शुरू की हैं। चार लाख रुपए तक के स्टूडेंट लोन को ब्याज मुक्त किया है। बेरोजगार स्नात्तकों के लिए एक एक हजार रुपए का भत्ता शुरू किया है। अगले पांच साल में एक करोड़ नौकरी और रोजगार की घोषणा की गई है। 2020 से 2025 के कार्यकाल में सरकार ने 10 लाख नौकरी और 10 लाख रोजगार दिए हैं। सरकार ने विधवा, दिव्यांगजन और वृद्धों के मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा पेंशन को चार सौ से बढ़ा कर 11 सौ रुपए कर दिया है। स्कूलों के पीटी टीचर्स और नाइट गार्ड्स के मानदेय दोगुने किए गए हैं। जीविका दीदी, आशा दीदी, ममता दीदी आदि के मानदेय में भी बढ़ोतरी की गई है। सरकार नया रजिस्ट्रेशन कराने वाले वकीलों को तीन साल तक पांच पांच हजार रुपए की राशि हर महीने देगी। पहली बार ऐसा हुआ है कि सरकार ने हर घर में 125 यूनिट बिजली बिल्कुल मुफ्त में देनी शुरू की है। ऐसी तमाम योजनाएं बिहार की एनडीए सरकार की ओर से राज्य के नागरिकों के कल्याण की प्रतिबद्धता को दिखाती हैं। इनके अलावा केंद्र सरकार की लोक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ बहुत प्रभावी तरीके से बिहार सरकार राज्य के नागरिकों को पहुंचा रही है। लगातार 20 साल के शासन से अगर नागरिकों को कुछ शिकायतें थीं तो उसे दूर करने के लिए सरकार ने अनेक कदम उठाए हैं। तभी बिहार के लोग वर्तमान सरकार की निरंतरता चाहते हैं। वे ‘जंगल राज’ की वापसी नहीं चाहते। उनको लग रहा है कि बिहार विकास की दिशा में बड़ी छलांग लगाने को तैयार है और डबल इंजन की सरकार में ही यह संभव हो पाएगा।

जहां तक राजनीतिक स्थितियों की बात है तो उसमें चुनाव से पहले ही एनडीए मीलों आगे दिख रहा है। एनडीए के सभी घटक दलों ने बहुत सद्भाव के साथ सीटों की संख्या तय की और उसके बाद सीटों का बंटवारा किया। दूसरी ओर विपक्ष के महागठबंधन में पहले चरण के नामांकन की अंतिम तिथि बीत जाने के बाद तक आपस में लड़ाई चलती रही। शुक्रवार, 17 अक्टूबर को नामांकन के आखिरी दिन तक महागठबंधन के घटक दलों ने सीटों की संख्या का फैसला नहीं किया और न यह तय किया कि किस सीट पर कौन सी पार्टी लड़ेगी और उम्मीदवार कौन होगा। इसका परिणाम यह हुआ कि अनेक सीटों पर घटक दलों के उम्मीदवार ही एक दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं। बिहार को लूटने के लिए सत्ता हासिल करने की होड़ में सभी पार्टियां ज्यादा सीट हासिल करने के लिए लड़ती रहीं। बिहार की जनता ने महागठबंधन की पार्टियों के इस झगड़े को देखा है और समझा है कि उनका असली उद्देश्य क्या है।

एनडीए में सभी 243 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा हो गई और पहले चरण की 121 सीटों पर आपसी तालमेल के साथ नामांकन होकर प्रचार अभियान शुरू हो गया। केंद्रीय गृह मंत्री   अमित शाह लगातार तीन दिन बिहार में बैठे और धारदार चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत की। तो दूसरी ओर महागठबंधन की पार्टियों की सीटों की संख्या ही तय नहीं हुई। एक तरफ जहां एनडीए में तय हो गया कि पूरा गठबंधन नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ेगा और चुनाव परिणामों के बाद मुख्यमंत्री का फैसला होगा वही महागठबंधन में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री के लिए होड़ मची रही। सो, विपक्ष के पास न तो बिहार के विकास की कोई दृष्टि है और न कोई इच्छा है। ऊपर से आतंक का पर्याय रहे शहाबुद्दीन के बेटे को जिस तरह से महागठबंधन की ओर से उम्मीदवार बनाया गया उससे बिहार के लोगों को और समझ में आ गया है कि यह गठबंधन फिर से बिहार को अपराध और हिंसा के दलदल में धकेलने वाला है। तभी बिहार के राजनीतिक रूप से सजग नागरिक यथास्थिति बनाए रखते हुए डबल इंजन की सरकार को चुनेंगे और विकास की गति की निरंतरता बनाए रखने के लिए छह और 11 नवंबर को मतदान करेंगे।(लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)


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