संघ के सौ साल में हासिल है मोदी के 11 साल!

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सौ साल का संघ खुद को शक्तिशाली समझ सकता है। मगर बाहर की बात तो अलग है। खुद जिसे वह परिवार कहता है उसमें मोदी के सामने तो वह कमजोर साबित हो ही गया है। सरसंघचालक मोहन भागवत को 75 साल में रिटायर होने की बात कह कर बदलना पड़ा। केवल सांप्रदायिकता बढ़ाने के मामले में उसे और बीजेपी को सफलता मिली है। मगर सांप्रदायिकता बढ़ने से देश मजबूत हुआ है यह सिद्ध करना उसे मुश्किल साबित हो रहा है।

गांधी जयंती के साथ संघ के सौ साल! इस पर लिखते हुए सबसे पहले जो बात याद आती है वह यह है कि क्या आज भी संघ और भाजपा के लोगों की समझ वही नहीं है जो किसी समय संघ के और भाजपा के नेता केदारनाथ साहनी की थी। आरएसएस पर सबसे पहले विस्तार से लिखने वाले उसके पूर्व स्वयंसेवक देसराज गोयल ने लिखा है कि दिल्ली के मुख्य कार्यकारी पार्षद केदारनाथ साहनी ने बहुत सारे लोगों के साथ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और शेर – ए- दिल्ली कहलाने वाले चौधरी ब्रह्मप्रकाश को भी एक निमंत्रण पत्र भेजते हुए उनसे आने का आग्रह किया। निमंत्रण आरएसएस की दिल्ली शाखा के वार्षिक समारोह का था। जिसमें कहा गया था कि पधार कर संघ का और अधिक परिचय प्राप्त करें।

देसराज गोयल जिनका निधन अभी कुछ साल पूर्व ही हुआ उनकी किताब “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ “ संघ पर लिखी किताबों में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली किताब है। गोयल जी अपनी किताब की शुरुआत ही इस वाकये से करते हैं। इसका पहला अध्याय है ‘अज्ञान का आंनद लोकट है। इसमें वे कहते हैं कि साहनीजी पुराने स्वयंसेवक थे। उनका विश्वास था कि लोग संघ की आलोचना या तो विद्वेष के कारण करते हैं या नासमझी की वजह से। कोई भी व्यक्ति इस पुण्य अवसर का लाभ नहीं उठाएगा यह बात साहनी जी के कल्पना से परे थी।

आगे की बात बताने से पहले हम यहां यह जरूर याद कर लें कि अभी मंगलवार 30 सितम्बर को ही दिल्ली में भाजपा और संघ को बनाने वाले साहनी जी के समकालीन विजय कुमार मल्होत्रा भी नहीं रहे। साहनी जी कुछ साल पहले नहीं रहे थे। ये दोनों नेता दिल्ली में भाजपा और संघ को जमवाने वालों में थे। दोनों ही सब के साथ मिलकर काम करने वाले। आज की तरह सांप्रदायिक जहर से दूर। इनके साथ मदनलाल खुराना भी। अभी प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली भाजपा के कार्यालय का उद्घाटन किया। जैसे की बोलते हैं खूब लंबी चौड़ी बाते कीं। मगर कहीं देखने को नहीं मिला कि दिल्ली में भाजपा को खड़ा करने वाले इन नेताओं की भी तारीफ की।

खैर यह भाजपा और संघ के सोचने की बात है कि वे खुद को बनाने वाले नेताओं की याद क्यों नहीं करते हैं और कांग्रेस के नेताओं को ही ज्यादातर याद करते रहते हैं। सरदार पटेल हों या नेताजी सुभाषचन्द्र बोस भाजपा या संघ उन्हें ज्यादा याद करते हैं अपने नेताओं को कम।

बहरहाल साहनीजी जो सोच भी नहीं सकते थे वह हुआ। कुछ लोग आजादी के आंदोलन से निकले चौधरी ब्रह्मप्रकाश जैसे भी होते हैं। जिन्होंने निमंत्रण पत्र के उत्तर में लिखा कि आपने मुझे आरएसएस के वार्षिक समारोह में आने का निमंत्रण दिया जिसमें सरसंघचालक बालासाहब देवरस भी आ रहे हैं कि संघ के बारे में मेरी जानकारी बढ़े और गलतफहमी दूर हो जाए। क्या आपका ख्याल है कि अनुशासित प्रदर्शन, परेड, शारिरिक व्यायाम को देखकर और उसके साथ घिसे पिटे उपदेश सुनकर कोई यकीन कर लेगा कि आरएसएस एक निरिह संगठन है? मैं मानवीय चेतना और बोध को उच्चतर स्तर की चीज समझता हूं। ऐसे समारोहों के प्रदर्शन बच्चों या उन वयस्कों के लिए जो आरएसएस को नहीं जानते आकर्षक हो सकते हैं। मेरे जैसे लोग जो आरएसएस को जानते हैं इस पाखंडपूर्ण विनम्रता और अनुशासन से धोखा नहीं खा सकते।

चौधरी बह्मप्रकाश ने आगे लिखा कि आरएसएस के लोग अनुशासित हैं, विनम्रता दिखाने की भी ट्रेनिंग उन्हें मिली है। मगर साथ ही चरित्रहनन के लिए कानाफूसी का अभियान चलाने की भी पूरी ट्रेनिंग है। विनम्रता पूर्वक नमस्ते करने वाले हाथों को असहमत व्यक्तियों को छुरा भोंकने की भी पूरी ट्रेनिंग है।

आज जब आरएसएस सौ साल का हो रहा है तब भी संघ के लोग वही कहते हैं कि सवाल उठाने वाले संघ को जानते नहीं। वे किसी सवाल का जवाब नहीं देते हमेशा इसी आड़ में छुपते हैं कि संघ को नहीं जानते। नेहरू ने भी यह बात कही थी, सरदार पटेल ने भी और गांधी जी ने भी। पहले गांधी जी की बात। क्योंकि संघ के सौ साल गांधी जयंती पर पूरे हो रहे हैं।

गांधी जी ने क्या कहा था?  संघ द्वारा प्रकाशित सामग्री में कहा जाता है कि गांधी जी ने इस संगठन की तारीफ की थी। मगर इतिहास में इसके कहीं प्रणाम नहीं मिलते। हां गांधी जी का यह कहा जरूर मिलता है कि जब उनसे किसी ने संघ के अनुशासन की तारीफ की तो उन्होंने कहा कि लेकिन भूलो मत कि हिटलर के नाजी और मुसोलिनी के फासिस्ट भी ऐसे ही थे। गांधी ने संघ को निरंकुश दृष्टि वाला और सांप्रदायिक संगठन कहा।

और बाद में गांधी जी की हत्या के बाद तो सरदार पटेल जिन्हें भी वे अपने पाले में खींचने की कोशिश करते रहते हैं तो साफ तौर पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के उस पत्र के जवाब में जिसमें उन्होंने संघ की पैरवी की थी कहा था आरएसएस ने देश में ऐसा वातावरण बनाया कि ऐसी भंयकर दुखदायी घटना (गांधी जी की हत्या) संभव हुई। आरएसएस की गतिविधियों से सरकार और राज्य के अस्तित्व को ही खतरा हो गया था।

और तत्कालीन सरसंघचालक गोलवलकर के पत्र के जवाब में तो सरदार पटेल ने और स्पष्ट लिखा कि आरएसएस की सारी स्पीचेज सांप्रदायिक विष से भरी थीं। उस विष का परिणाम अंत में यही हुआ कि गांधी जी की अमूल्य जान की कुर्बानी देश को सहना पड़ी। और सरदार पटेल जिनकी सबसे ऊंची मूर्ति प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात में लगवाई है यह भी लिखा कि उनकी मृत्यु पर आरएसएस वालों ने हर्ष प्रकट किया और मिठाई बांटी।

ऊपर नेहरू का भी जिक्र किया था तो नेहरू ने क्या कहा? गोलवलकर के पत्र वैसे तो नेहरू सारे अपने गृहमंत्री पटेल को फारवर्ड कर देते थे मगर जब गोलवलकर उनसे मिलने के लिए लिख रहे थे तो नेहरु ने जवाब में लिखा कि मिलने से कोई फायदा नहीं। क्योंकि आपके घोषित उद्देश्य कुछ और हैं वास्तविक कुछ और! ये वास्तविक उद्देश्य भारतीय संसद के निर्णय और प्रस्तावित संविधान के प्रावधानों के बिल्कुल विपरित हैं। हमारी सूचना के अनुसार ये गतिविधियां राष्ट्रविरोधी और प्राय: भीतरघाती तथा हिंसापूर्ण होती हैं।

इतने सालों में क्या बदला है? सांप्रदायिक भाषणों के बाद अब तो धर्म के आधार पर खुले आम धमकियां दी जाने लगीं। प्रधानमंत्री से ख्यमंत्री के स्तर पर। पोस्टर बैनर लगने लगे मुसलमानों के खिलाफ! मुख्यमंत्री 7 पीढ़ियां याद रखेंगी जैसे बयान देने लगे। उसी तरह पिटोगे कहने लगे। उसी उत्तर प्रदेश में जहां प्रधानमंत्री ने श्मशान और कब्रिस्तान में फर्क समझाया था। होली दीवाली और ईद में।

क्या संघ जो भाजपा का मातृसंगठन है वहीं खड़ा है?

शायद नहीं। उससे मोहभंग बढ़ रहा है। संघ के तमाम पूर्व सदस्य समर्थक पिछले 11 साल में विरोध के स्वर बोलने लगे हैं। तमाम पत्रकार जो 11 साल पहले तक संघ और भाजपा के नजरिए से ही पत्रकारिता करते थे आज केवल प्रधानमंत्री मोदी पर ही नहीं संघ पर भी सवाल उठाने वालों में सबसे आगे हैं।

सौ साल का संघ खुद को शक्तिशाली समझ सकता है। मगर बाहर की बात तो अलग है। खुद जिसे वह परिवार कहता है उसमें मोदी के सामने तो वह कमजोर साबित हो ही गया है। सरसंघचालक मोहन भागवत को 75 साल में रिटायर होने की बात कह कर बदलना पड़ा। केवल सांप्रदायिकता बढ़ाने के मामले में उसे और बीजेपी को सफलता मिली है। मगर सांप्रदायिकता बढ़ने से देश मजबूत हुआ है यह सिद्ध करना उसे मुश्किल साबित हो रहा है।

कहने को अभी वह बहुत सारी बातें कहेंगे। बातों में उसकी मास्टरी का कोई मुकाबला नहीं कर सकता। मगर सौ साल पूरे होने पर संघ वहीं खड़ा है जहां से वह चला था। कारण वही हैं जो नेहरू, पटेल, गांधी, चौधरी ब्रह्मप्रकाश और अब बहुत सारे पूर्व संघी कहते हैं पाखंड, झूठ, नकारात्मकता, सांप्रदायिक विचार, नफरत जो अब जातियों में भी फैल गई है से नहीं निकल पाना। दूसरे के नुकसान में अपना फायदा देखना। जो होता नहीं है।

इतिहास में कभी नहीं हुआ कि दूसरों की लकीर छोटी करके आप अपनी लकीर बड़ी कर लो।


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