बिहार में हार, जीत पर सब निर्भर!

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बिहार चुनाव मोदी जी के अस्तित्व का सवाल बन गया है। हारे तो खेल खत्म। उन पर चारों तरफ से हमले हो रहे हैं। 11 साल तक उनकी बातों, भाषण, कहानियों का दौर रहा। मगर अब सवाल उठने लगे हैं। उनकी छवि गिर रही है। उन्होंने अपना छवि निर्माण राष्ट्रवाद पर किया था। मगर वह अब छद्म राष्ट्रवाद साबित होने लगा है।… सीजफायर करना मोदी को बहुत मंहगा पड़ा। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप रोज कहते हैं कि मैंने कहा और उन्होंने सीजफायर किया।

पिछले तीन दशकों में यह पहली बार है कि कांग्रेस में यह बहस नहीं हो रही है कि चुनाव गठबंधन में नहीं अकेले लड़ना चाहिए। नहीं तो बिहार यूपी के हर चुनाव से पहले कांग्रेस के नेता इसमें उलझे रहते थे। पांच साल पार्टी को मजबूत बनाने के लिए काम नहीं करते थे मगर चुनाव आते ही अकेले लड़ने की  पैरवी करने लगते थे।

मगर इस बार बिहार चुनाव से पहले ऐसी आवाजें सुनाई नहीं दे रही हैं। हांलाकि छुटपुट लोग बोल रहे हैं मगर अब कांग्रेस हाईकमान की समझ में आने लगा है ऐसे लोग उसके हितैषी नहीं हैं। बिना संगठन के अकेले चुनाव लड़ना अपनी मुट्ठी खुद खोल कर दिखाना है कि  खाली है। जब तक मुट्ठी में कुछ न हो उसे बंद रखने में ही समझदारी है यह बात कांग्रेस की समझ में आ गई है।

बिहार में आरजेडी ही बड़ा दल है। उसी के पास संगठन है। कांग्रेस वहां अकेले कुछ नहीं कर सकती है। कुछ लोग जो बीजेपी के समर्थक हैं मगर छुपे हुए वे घुमा फिराकर यह कह रहे हैं कि कांग्रेस को प्रशांत किशोर ,चिराग पासवान के साथ मिलकर लड़ना चाहिए। ये रास्ता कांग्रेस के अकेले लड़ने से भी ज्यादा खतरनाक है। जीतने के बाद प्रशांत किशोर और चिराग पासवान में से कोई कांग्रेस के पास नहीं रुकेगा। दस साल जब यूपीए की सरकार थी दोनों

कांग्रेस के ही साथ थे। तब चिराग मतलब उनके पिता रामविलास पासवान। मगर सरकार जाते ही दोनों भाग लिए। दरअसल इस तरह के सुझाव कांग्रेस के खिलाफ तो हैं ही मगर उससे ज्यादा आरजेडी से डर के कारण हैं। आरजेडी पर बहुत आरोप लगते हैं। उसकी वजह है। वह दो चीजों से कभी नहीं डिगी। एक सामाजिक न्याय और दूसरे धर्मनिरपेक्षता। यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।

और बीजेपी गोदी मीडिया भक्तों मतलब जातिवादी, सांप्रदायिक, दक्षिणपंथी, यथास्थितिवादियों को इसी से सबसे ज्यादा डर लगता है। सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्ष राजनीति में उन्हें परिवर्तन की आहट आती है। और परिवर्तन प्रगति को वे हमेशा रोकने की कोशिश करते हैं। इसीलिए सबसे पहला विशेष गहन पुनरीक्षण ( एसआईआर) बिहार में लाया गया। 65 लाख लोगों के नाम काट दिए गए। अभी फाइनल वोटर लिस्ट जारी नहीं हुई है। उससे पहले और भी लोगों के नाम काटे जा सकते हैं। चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट की भी नहीं सुन रहा।

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने अभी 17 सितंबर को प्रेस कान्फ्रेंस में वोटर लिस्ट में से नाम किस तरह काटे जा रहे हैं यह मय सबूतों के बताया। मगर चुनाव  आयोग कोई जवाब देना भी जरूरी नहीं समझता। वह पूरी तरह भाजपा सरकार के इशारों पर काम कर रहा है। अब तो उसे भाजपा का एक मोर्चा कहा जाने लगा है। भाजपा का फ्रंटल आर्गनाइजेशन ( अग्रिम संगठन)। जो बढ़ चढ़कर पार्टी की सेवा में लगा हुआ है।

बिहार चुनाव मोदी जी के अस्तित्व का सवाल बन गया है। हारे तो खेल खत्म। उन पर चारों तरफ से हमले हो रहे हैं। 11 साल तक उनकी बातों, भाषण, कहानियों का दौर रहा। मगर अब सवाल उठने लगे हैं। उनकी छवि गिर रही है। उन्होंने अपना छवि निर्माण राष्ट्रवाद पर किया था। मगर वह अब छद्म राष्ट्रवाद साबित होने लगा है। शुरू शुरू में तो उन्हें गोदी मीडिया ने बचा लिया। गलवान सबसे बड़ा झटका साबित हुआ था। चीन ने लद्दाख में अंदर घुसकर हमारे बीस जवानों को शहीद कर दिया था। मोदी जी कुछ नहीं कर पाए। उल्टा क्लीन चीट दे दी कि न कोई घुसा है और न कोई है। गोदी मीडिया इसी का ढोल पीटता रहा। चीन को टीवी स्क्रिन पर हराता रहा। राहुल ने सवाल उठाए। मगर मीडिया उल्टा उन्हीं पर हमले करने लगा। नेहरू से समय क्या हुआ था, राहुल चीन के समर्थक हैं जैसी बातों से मोदी को बचाता रहा।

मगर असली गेम चेंज हुआ 2024 लोकसभा चुनाव से। इसमें जो विपक्ष साथ मिलकर लड़ा उसी ने मोदी को 240 पर रोका। और गठबंधन का वही फायदा देखकर बिहार में कांग्रेसियों ने इस बार खुद को एकला चलो का राग अलापने से रोका। गठबंधन से ही बिहार में 2015 में सफलता मिली थी। उस समय तो 2014 का चुनाव जीतने के बाद मोदी जी पीक पर थे। हरियाणा विधानसभा जीत लिया था। महाराष्ट्र में सरकार बना ली थी। मगर जीत की यह खुशी बिहार में काफूर हो गई थी। वहां कांग्रेस आरजेडी नीतीश के गठबंधन ने भाजपा को हरा दिया था।

2020 में भी नीतीश के साथ भाजपा बहुत मुश्किल से जीत पाई थी। उस जीत पर बहुत सवाल खड़े हुए थे। कम मार्जिन की 17 सीटें भाजपा नीतीश के खाते में गिनती के अंतिम चरणों में गईं। जबकि दोनों के बीच एनडीए और महागठबंधन में केवल 15 सीटों का फर्क था। तेजस्वी ने उस समय आरोप लगाया था कि कम

मार्जिन की सीटों पर वे हारे नहीं हैं, बल्कि साजिश करके उन्हें हराया गया है। चुनाव में धांधली के जरिए जीत पर सबसे बड़ा सवाल यहीं से शुरू हुआ था। और उसके बाद ही बीजेपी और चुनाव आयोग संदेह के घेरे में आ गए थे। इस बार 2025 में भी यही कोशिशें हो रही हैं।

राहुल समय रहते सचेत हो गए हैं। वोट चोरी को उन्होंने राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया। पहले 7 अगस्त को इस पर पहली प्रेस कान्फ्रेंस करके उन्होंने बताया कि फर्जी वोट कैसे जोड़े जा रहे हैं। उसका भी चुनाव आयोग कोई जवाब नहीं दे पाया। जनता में मैसेज चला गया कि चुनाव आयोग पकड़ा गया। राहुल ने इसे और मजबूत बनाने के लिए बिहार में 16 दिन की सफल यात्रा की। आधे से ज्यादा बिहार से होकर गुजरी इस यात्रा की सबसे खास बात यह थी कि आरजेडी नेता तेजस्वी, सीपीआईमाले के महासचिव दीपकंर भट्टाचार्य और विकासशील इंसान पार्टी के मुकेश सहनी पूरी करीब 1500 किलोमीटर की यात्रा में राहुल के साथ रहे।

इसके बाद अब बिहार में सीडब्ल्यूसी की मीटिंग। आजादी के बाद पहली बार बिहार में कांग्रेस की सर्वोच्च नीति निर्धारक ईकाई सीडब्ल्यूसी की बैठक बड़ा संदेश है। वह यह कि कांग्रेस समझ गई है कि इस समय लोह गर्म है। चोट मारने से चूकना नहीं चाहिए। वाकई 11 साल तक मोदी पर किसी बात का असर नहीं हुआ। मगर विपक्ष की एकजुटता और उसका लोकसभा 2024 में असर दिखने के बाद अब कांग्रेस पूरी तरह आर पार के फैसले के मूड में आ गई है।

जहां से हमने लेख शुरू किया था कि इस बार अकेले लड़ने की धुन कहीं दिखाई नहीं दी। वह इन्हीं घटनाक्रमों के परिणामस्वरूप उपजी राजनीतिक समझ थी। दूसरा कारण जो हमने बीच में लिखा। मोदी जी के छद्म राष्ट्रवाद की कलई उतरना। गलवान के बाद जब पहलगाम में आतंकवादी हमला हुआ तो प्रधानमंत्री मोदी के आतंकवाद को खत्म कर दिया दावों पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया। और उसके बाद बीच संघर्ष में जब हमारी सेनाएं पाकिस्तान को कड़ा सबक सीखा ऱही थीं सीजफायर करना मोदी को बहुत मंहगा पड़ा। यह उनके राष्ट्रवाद पर सबसे बड़ा सवाल बना। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप रोज कहते हैं कि मैंने कहा और उन्होंने सीजफायर किया। मतलब मोदी ने ट्रंप का वर्चस्व स्वीकार कर लिया। जो इससे पहले किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने किसी अमेरिकी राष्ट्रपति का स्वीकार नहीं किया था।

यहीं मोदी का राष्ट्रवाद लोगों को छद्म दिखने लगा। फिर जुर्माने ठोकना। पचास प्रतिशत टैरिफ वही है। और फिर एच – 1बी वीजा की सौ गुनी बढ़ोत्तरी! मोदी और राहुल दोनों के लिए निर्णायक फैसले का समय। या तो मोदी के छद्म राष्ट्वाद का गुब्बारा फूट जाएगा या वे बिहार से फिर वापसी कर लेंगे।बड़ा सवाल! बिहार हार जीत पर सब निर्भर। मोदी का भविष्य भी और राहुल की आगे की राजनीति भी।


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