नेपाल में जनता का संघर्ष बार-बार

Categorized as लेख

नेपाल बार-बार दिखाता है कि सत्ता और जनता का रिश्ता संविधान से नहीं, सड़कों पर गिरते लहू, आंसुओं और टूटती आवाज़ों से मापा जाता है। तराई से पहाड़ तक पथराव हुआ, गोलियां चलीं और लाठियां टूटीं। यह विरोध केवल आज का नहीं है; यह उन असंतोषों की कड़ी है, जो कभी मधेश आंदोलन, कभी जातीय असमानता और राजनीतिक वादाख़िलाफ़ी के रूप में उभरते रहे।

नेपाल की जनता ने अपनी सरकार को आईना दिखाया है। पूछा है क्या ऐसे ही दिन का वादा था? वहां की सत्ता ने क्या जुल्म के सितम का पहाड़ खड़ा कर दिया था। सर्वसत्ता की लालसा के लिए नेपाल के नेताओं ने अपनी ही जनता को महत्वहीन मान लेने की गलती की। खुद के भ्रष्टाचार व अपराध दबाने-छुपाने के चक्कर में तकनीकी युग में पले-बड़े युवाओं को इंटरनेट से ही वंचित करने की मुहिम चलाई।

युवाओं का विरोध प्रदर्शन जब नेताओं की कार्यगुजारी पर चल रहा था तो सरकार ने पुलिस से आंसू-गैस व गोली चलवा दी। उन्नीस युवा मारे गए। और दो-सौ से ज्यादा घायल हुए। इससे गुस्साए युवा अगले दिन इतनी संख्या में जुटे कि नेता व सेना दोनों स्तब्ध रह गए। फिर जो हुआ वो हम सभी ने देखा। लेकिन जो हुआ, क्या वह लाज़िम था?

सरकार में जो नेता कभी सत्ता के शिखर पर थे उनको ही नेपाल की जनता से जान बचाते-छुपते-भागते सभी ने देखा। सरकार ने जैसी हिंसा का उपयोग विरोध करते युवाओं पर किया, नेपाल की जनता ने अपने विरोध को वैसी ही अराजक हिंसा में बदल दिया। जनता ने खुद के द्वारा चुने अपने नुमाइंदों को सरेआम लज्जित किया, निर्वस्त्र कर दौड़ाया और मार-पिटाई की। तकनीक पर बड़ी-पली युवा पीढ़ी के हिंसक विरोध ने अपने ही सत्तातंत्र को तार-तार कर धुएं में उड़ा दिया। फिर आगजनी का जो मंजर देखा उसने नेपाल के सत्तातंत्र के होश उड़ा दिए। युवाओं की अनियंत्रित भीड़ ने संसद से लेकर नेताओं के घर तक फूंक दिए। सरकारी भवन व लोक व्यवस्था को तहस-नहस किया। राष्ट्रीय जेल में घुस कर, अपनी ही न्यायपालिका द्वारा करार अपराधियों को रिहा किया जिससे नेपाल की राष्ट्रीय न्याय व्यवस्था ही शर्मसार हुई।

नेपाल की राजनीति में विभिन्न दलों के कुछ ही नेता कुर्सियां बदल बदल कर जनता को भरमाते रहे हैं। नेपाल में राजवाद, साम्यवाद व समाजवाद के बीच सत्ता का संघर्ष चलता रहा है। वहां गृह युद्ध भी हुए। खुद के लिए सत्ता के संघर्ष के कारण कुछ ही नेता अदल-बदल कर सत्ता पर बने रहे हैं। तकनीक की जेन-जेड पीढ़ी के ताजा संघर्ष के केंद्र में भी चौथी बार प्रधानमंत्री बने केपी शर्मा ओली ही रहे हैं।

उनकी तानाशाह सरकार पर भ्रष्टाचार, अपने-अपनो का फायदा और बढ़ती बेरोजगारी व महंगाई के आरोप लगाए गए। ओली सरकार ने इन आरोपों को दिखाने-दर्शाने वाले सोशल मीडिया को ही बंद करने का तय किया ताकी युवा पीढ़ी को सूचना-जानकारी का अभाव रहे। जबकि दुनिया भर में इंटरनेट माध्यम से अभिव्यक्ति की आज़ादी को कैसे भी आधुनिक सत्तातंत्र के चलने-चलाने का आधार मान लिया गया है।

फिर नेपाल या अन्य किसी भी देश की सत्ता को अपनी ही जनता के जानने-समझने से भय क्यों लगना चाहिए? आज जब कहीं का भी और कैसा भी सत्तातंत्र बिना भरोसेमंद ऑनलाइन व्यवस्था व वातावरण के चल नहीं सकता है तो सत्ता क्यों अपनी ही जनता को बहलाने-भरमाने में लगती है। नेपाल में पहले सत्ता ने, और फिर जनता ने जो किया उसको न तो लोकतांत्रिक कह सकते हैं न ही सामाजिक मान सकते हैं। मानवीय सभ्यता तो कतई नहीं कह सकते। फिर अगर अपने भारत के आस-पड़ोस के देशों में अपन अपने सत्तातंत्र का प्रभाव प्रस्तुत नहीं कर सकते हैं तो आगे चल कर अपनी सत्ता का अस्तित्व भी खतरे में आ सकता है। आसपास आग फैले तो बीच में शांति व समृद्धि संभव नहीं हो सकती है।

नेपाल में नौबत यहां तक पहुंच गई है कि संकट देश बचाने का है। देश बनाना तो उसके बाद ही किया जा सकता है। नेपाल की जनता जिस शांति और समृद्धि के लिए विरोध करते हुए अराजक हो रही है उसमें दोनों के रास्ते अलग अलग ही रहे हैं। शांति पाने के लिए हिंसा का रास्ता नहीं अपनाना जा सकता। और बिना सामाजिक सौहार्द व सत्ता के सेवाभाव के समृद्धि पाना असंभव ही रहेगा। शांति लाने और समृद्धि पाने के लिए नेपाल की जनता को भी तप, त्याग और बलिदान करना सीखना होगा। यह जानते-समझते हुए की दुनिया भर की सत्ता तो सिर्फ सर्वसत्ता के लिए ही काम करती है।


Previous News Next News

More News

वंदे मातरम पर ‘इंडिया’ ब्लॉक में मतभेद

September 13, 2026

कांग्रेस पार्टी ने अचानक वंदे मातरम को बड़ा मुद्दा बना दिया है और इस पर टकराव पैदा कर रही है। यह अचानक हुआ इसलिए लग रहा है क्योंकि संसद के मानसून सत्र में कांग्रेस इस पर अपनै स्टैंड स्पष्ट करने से बच रही थी। कांग्रेस के नेता इस बात से खुश थे कि जंतर मंतर…

केजरीवाल, पंकज गुप्ता और एनडी गुप्ता

September 13, 2026

भारत में राजनीति को जाति के स्टीरियोटाइप में देखा जाता है। जब भी किसी पार्टी के संगठन के पदाधिकारियों की घोषणा होती है तो देखा जाता है कि उसमें जातीय समीकरण का कितना ध्यान रखा गया है। ऐसे की सरकार के मंत्रियों के चयन में भी सामाजिक, क्षेत्रीय संतुलन की बात होती है। हर जाति…

टकराव की राजनीति बढ़ा रहे हैं केजरीवाल

September 13, 2026

आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल इन दिनों पूरी तरह से पंजाब की राजनीति में लगे हैं। वे रैलियां और चुनावी कार्यक्रम कर रहे हैं और साथ साथ टिकट बंटवारे से लेकर चुनावी रणनीति बनाने में भी लगे हैं। राघव चड्ढा और उनसे भी ज्यादा संदीप पाठक के पार्टी छोड़ने के बाद केजरीवाल पर…

धीरेंद्र शास्त्री ने भाजपा का नुकसान कर दिया

September 13, 2026

पश्चिम बंगाल में सरकार बनने के बाद बड़े धूमधड़ाके से बागेश्वर धाम के धीरेंद्र शास्त्री बंगाल पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी की सरकार थी तो उनको राज्य में नहीं आने दिया जाता था। उन्होंने यह भी कहा कि अब सरकार बदल गई है और लोगों का मन बदलना चाहिए। सोचें, बंगाल में लोगों…

आर्थिक विकासः इतने बंटे हुए क्यों हैं अहसास!

September 13, 2026

लोग यह पूछने लगे हैं कि अगर तेज गति से आर्थिक वृद्धि दर्ज हो रही है, तो वह आम जिंदगी में महसूस क्यों नहीं हो रही है? आंकड़ों की साख का सवाल तो पुराना है, मगर ताजा बहस के क्रम में आम तजुर्बे के खिलाफ आए आंकड़ों पर सरल, लेकिन कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण सवाल उठाए…

logo