‘राष्ट्रीय प्रतीक’ का कश्मीर में विरोध

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सवाल है कि भारत के राष्ट्रीय प्रतीक ‘अशोक स्तंभ’ को हजरतबल दरगाह की शिलापट्ट पर वांछित सम्मान क्यों नहीं मिला? इसकी असली वजह इस्लाम-पूर्व सांस्कृतिक विरोध में निहित है। अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश इसी मानसिकता से उपजे बिना जड़ों के वे देश हैं जहां के लोग मौलिक सनातन जड़ों से कटकर स्वयं को अरब और मध्य-पूर्व संस्कृति से जोड़ने का असफल प्रयास करते हैं। कश्मीर घाटी का ‘इको-सिस्टम’ भी उसी से जुड़ा हुआ है।

गत ‘ईद-ए-मिलाद’ के रोज कश्मीर में हजरतबल दरगाह स्थित नवीनीकरण पट्टिका को तोड़ने की घटना सामने आई। नैरेटिव बनाया जा रहा है कि नमाज के बाद भीड़ ने शिलापट्ट को इसलिए नुकसान पहुंचाया, क्योंकि उसमें राष्ट्रीय प्रतीक ‘अशोक स्तंभ’ था, जो मुस्लिम पक्षकारों के मुताबिक कथित रूप से ‘इस्लाम विरोधी’ है। यहां तक जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला सहित अन्य स्थानीय मुस्लिम नेताओं ने उन्मादी भीड़ का प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से बचाव करते हुए दरगाह में ‘अशोक चिन्ह’ होने की जरूरत पर सवाल उठाया और इसे ‘मूर्ति-पूजा’ से जोड़ दिया। लेकिन प्रश्न यह उठता है: क्या राष्ट्रीय प्रतीक वाकई इस्लाम में ‘हराम’ है और इसका दरगाह/मस्जिद में होना ‘मुस्लिम-विरोधी’ है? या यह उस विषाक्त मानसिकता की परछाई है, जिसने 1947 में देश का विभाजन करवाया और जो आज भी भारतीय उपमहाद्वीप में सदियों से हिंदू-मुस्लिम संबंधों में तनाव का कारण बनी हुई है?

इस्लाम में मूर्तिपूजा वर्जित है। इस्लामी शब्दावली में इसे ‘शिर्क’ कहा जाता है। क्या ‘अशोक स्तंभ’ कोई ‘मूर्ति’ है? बिल्कुल नहीं। यह देश का राजकीय प्रतीक है, जिसकी भारत सरकार, राज्य सरकारों, संसद, न्यायपालिका और हर सरकारी दफ्तरों से लेकर पासपोर्ट, वोटर कार्ड, आधार, पैन, स्टांप पेपर और करेंसी नोट आदि तक में छाप है। यह हालिया विवाद तब है, जब कई घोषित इस्लामी देशों की मस्जिदों की होर्डिंग्स-शिलापट्ट में वहां के राष्ट्रीय प्रतीक अंकित है। यही नहीं, जिस वक्फ बोर्ड को देश की मस्जिदों, मदरसों और दरगाहों का ‘संरक्षक’ बताया जाता है, इसके अधिकांश लोगो में भी यही ‘अशोक स्तंभ’ मिलता है।

अब हालिया उदाहरण— कश्मीर की हजरतबल दरगाह। मोदी सरकार ने इसे ‘तीर्थयात्रा पुनरुद्धार और आध्यात्मिक, विरासत संवर्धन अभियान (प्रसाद)’ योजना के तहत 46 करोड़ रुपये खर्च कर नवीनीकृत किया। यह पूरा खर्च उन्हीं सरकारी नोटों और फाइलों के जरिए हुआ, जिनपर ‘अशोक स्तंभ’ मुद्रित है। वर्ष 1993 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले में आदेश दिया था कि मस्जिदों में कार्यरत इमामों को वक्फ बोर्ड के माध्यम से मानदेय/वेतन दिया जाए। तब से विवादों के बीच कई इमामों-मुअज्जिनों को नियमित भुगतान हो रहा है। अगर अब भी ‘अशोक स्तंभ’ को लेकर यही तर्क है कि वह ‘मूर्ति’ है, तो क्या इमाम-मुअज्जिन वेतन के रूप में मिल रहे भारतीय रुपयों को ठुकराएंगे? क्या वे इसी आधार पर वोटर कार्ड, आधार, पैन के साथ हज यात्रा के लिए आवश्यक पासपोर्ट का बहिष्कार करेंगे?

देश में ‘अशोक स्तंभ’ चलन कोई नया नहीं है और न ही यह मोदी सरकार के किसी उपक्रम का हिस्सा है। इसका एक स्वर्णिम इतिहास है। भारत का राजचिह्न सारनाथ के ‘अशोक स्तंभ’ पर आधारित है, जिसे सम्राट अशोक ने लगभग 250 ईसा पूर्व यानी 2250 वर्ष से अधिक पहले सारनाथ (उत्तरप्रदेश) में स्थापित करवाया था। यहीं पर ढाई हजार साल पहले भगवान गौतमबुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश दिया। इसी स्थान पर 1905 में अन्य अवशेषों के साथ प्रख्यात अशोक स्तंभ की खोज जर्मनी के इंजीनियर फ्रेडरिक ऑर्टेल ने की थी।

स्वतंत्रता के बाद इसे 26 जनवरी 1950 को भारत के नीति-निर्माताओं ने राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया। तब न तो भाजपा या जनसंघ का कोई अस्तित्व था और न ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज में उतना प्रभावशाली था। यही नहीं, जिस संविधान की दुहाई देकर या उसे लहराकर अक्सर ‘मुस्लिमों के संवैधानिक अधिकारों’ का झंडा बुलंद किया जाता है, उसकी मूल प्रति के आवरण-पृष्ठ पर न केवल ‘अशोक स्तंभ’ अंकित है, साथ ही सिंधु घाटी सभ्यता, गुरुकुल, रामायण, भगवद्गीता, गौतमबुद्ध, महावीर, शिव नटराज, अर्जुन की तपस्या, छत्रपति शिवाजी महाराज, गुरु गोबिंद सिंहजी आदि की छवियां भी मिलती है।

जिस पवित्र हजरतबल दरगाह की यह घटना है, उसे लेकर मुसलमानों की मान्यता है कि यहां पैगंबर मोहम्मद साहब की पवित्र दाढ़ी का बाल (मू-ए-मुकद्दस) रखा है। इसे निसंदेह पैगंबर साहब की व्यक्तिगत निशानी के तौर सम्मान दिया जाता है, परंतु इस्लामी परंपरा के अनुरूप मुसलमान इसकी इबादत नहीं करते। यह रोचक है कि इस्लाम की जन्मस्थली सऊदी अरब के शासनतंत्र पर उस वहाबीवाद का प्रभाव है, जो बकौल एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका— मजारों, समाधियों और पवित्र वस्तुओं की इबादत को निषिद्ध करता है। यही कारण है कि सऊदी शासन ने इस्लाम के प्रारंभिक ऐतिहासिक स्थलों को विकास के नाम पर ध्वस्त कर दिया। एक आकलन के अनुसार, पवित्र मक्का-मदीना के आसपास 95 प्रतिशत ऐसे स्थलों को हटाया जा चुका है।

उपरोक्त पृष्ठभूमि में यक्ष प्रश्न उठता है कि भारत के राष्ट्रीय प्रतीक ‘अशोक स्तंभ’ को हजरतबल दरगाह की शिलापट्ट पर वांछित सम्मान क्यों नहीं मिला? वस्तुतः इसकी असली वजह इस्लाम-पूर्व सांस्कृतिक विरोध में निहित है। यह अकाट्य सत्य है कि भारतीय उपमहाद्वीप के लगभग 99 प्रतिशत मुसलमान मतांतरित हैं। उनके पूर्वज कभी हिंदू, बौद्ध या सिख थे। मतांतरण के बाद वे पीढ़ी दर पीढ़ी कुछ चरणों से गुजरे। पहले उन्होंने अपनी मौलिक पूजा-पद्धति और सांस्कृतिक परंपराओं का त्याग किया। फिर अपने पूर्वजों की पहचान से दूरी बनाई, जो धीरे-धीरे घृणा, अलगाववाद और फिर शत्रुता में बदल गई। अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश इसी मानसिकता से उपजे कृत्रिम राष्ट्र हैं, जो अपनी मौलिक सनातन जड़ों से कटकर स्वयं को अरब और मध्य-पूर्व संस्कृति से जोड़ने का असफल प्रयास करते हैं। यही उनके कई विरोधाभासों का कारण भी है। कश्मीर का ‘इको-सिस्टम’ भी उसी वैचारिक गर्भनाल से जुड़ा हुआ है।

घाटी के शीर्ष नेता शेख अब्दुल्ला ने महाराजा हरि सिंह को ‘सेकुलर’ माना था, परंतु कश्मीरी मुस्लिम समाज ने उन्हें अस्वीकार कर दिया, क्योंकि वे इस्लाम-पूर्व संस्कृति के प्रतीक थे। यही मानस 1947 में भी सामने आया, जब विभाजन के बाद पाकिस्तानी हमले के दौरान रियासती सेना की मुस्लिम टुकड़ियां मजहबी कारणों से अपने देश के साथ गद्दारी कर शत्रुओं में शामिल हो गई। रियासत के उत्तराधिकारी और लंबे समय तक कांग्रेसी सांसद रहे डॉ कर्ण सिंह की आत्मकथा ‘हेयर अपेरेंट’ के साथ पूर्व राज्यपाल जगमोहन की पुस्तक ‘माय फ्रोजन टर्बुलेंस इन कश्मीर’ में इसका विस्तृत वर्णन है। 1980–90 के दशक में कश्मीरी पंडितों का नरसंहार-पलायन, मंदिरों पर हमले और सुरक्षाबलों पर पथराव— इसी विषाक्त सोच की परिणति थे। अब हजरतबल दरगाह में ‘अशोक स्तंभ’ का पत्थरों द्वारा ध्वस्तीकरण— उसी अलगाववादी भारत-विरोधी मानसिकता का विस्तार है।


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