समस्या से खराब समाधान है

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

पेपर लीक के कारण नीट की परीक्षा रद्द होने और 12वीं के बोर्ड की परीक्षा में मूल्यांकन की ऑन स्क्रीन मार्किंग यानी ओएसएम की व्यवस्था से लाखों छात्रों को हुई परेशानी का मामला भाजपा की केंद्र सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द है। यह सीधे युवाओं से जुड़ा मामला है, जिसके लिए नेपाल की क्रांति के बाद जेन जी का जुमला खूब लोकप्रिय हुआ है। राहुल गांधी और दूसरे विपक्षी नेता भी जेन जी से बड़ी उम्मीद लगाए बैठे हैं।

अब तक इस समूह को सरकार के कामकाज से ज्यादा मतलब नहीं था। उसने दुनियादारी नहीं देखी थी और न नौकरी के संघर्ष से परिचित था। तभी किशोर और युवा उम्र के लोगों का बड़ा समूह नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार का समर्थन करता था। राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के मुद्दे पर सरकार की राय से इत्तेफाक दिखाता था। लेकिन अब उसके ऊपर आन पड़ी है, जिससे जेन जी और उसके परिजन भी परेशान हैं। यह बात सरकार को परेशान कर रही है।

इस मसले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सोशल मीडिया में उम्मीद जताई जा रही थी कि प्रधानमंत्री मोदी मन की बात में इस बारे में कुछ कहेंगे। लेकिन रविवार, 30 मई को मन की बात भी कह गए। उन्होंने छात्रों की परेशानी को छोड़ कर बाकी अनेक चीजों पर अपने मन की बात कही। सो, क्या माना जाए कि उनके मन में छात्रों की परेशानी को लेकर कोई बात नहीं है? दूसरी ओर राहुल गांधी 12वीं बोर्ड की परीक्षा में गड़बड़ियों से प्रभावित छात्रों से मिले और उनके साथ खूब खुल कर चर्चा की।

एक तरफ राहुल गांधी युवाओं का भरोसा जीतने की कोशिश कर रहे हैं तो दूसरी ओर केंद्र सरकार छात्रों को भरोसा दिलाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी का नाम ले रही है! सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में कहा गया कि मेडिकल में दाखिले के लिए नीट यूजी की 21 जून को दोबारा परीक्षा होगी और उसकी निगरानी सीधे प्रधानमंत्री मोदी करेंगे। देश के दूसरे सबसे बड़े कानूनी अधिकारी तुषार मेहता ने यह बात सुप्रीम कोर्ट में कही। बाद में केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने भी कहा कि प्रधानमंत्री मोदी दोबारा हो रही परीक्षा की निगरानी करेंगे।

लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने मन की बात में इस बारे में भी कुछ नहीं कहा। अगर उनकी सरकार उनके नाम से भरोसा दिला रही है तो वे खुद क्यों नहीं भरोसा दिलाते? प्रधानमंत्री खुद भरोसा दिलाएंगे तो हो सकता है कि किशोर उम्र के छात्रों का मनोबल बढ़ेगा और पेपर लीक करने वालों का मनोबल घटेगा। लेकिन प्रधानमंत्री ने मन की बात का इस्तेमाल यह समझाने के लिए किया कि गर्मी बहुत है और लोगों को नींबू पानी, सत्तू, नारियल पानी, शरबत आदि पीते रहना चाहिए!

बहरहाल, किशोर और युवा छात्रों को हुई परेशानी ने केंद्र सरकार की चिंता बढ़ाई है। मुश्किल यह है कि सरकार की चिंता परीक्षा बेहतर ढंग से कराने और परीक्षा व पढ़ाई में होने वाली संरचनागत खामियों को दूर करने की नहीं है, बल्कि इस बात की है कि नैरेटिव पर से नियंत्रण कमजोर हो रहा है और समर्थकों का बड़ा समूह खिलाफ हो रहा है। इसलिए डैमेज कंट्रोल की योजना के तहत नैरेटिव कंट्रोल करने या उसे बदलने का प्रयास किया जा रहा है। इसके प्रयास में सेना को भी शामिल किया गया है। जब नैरेटिव हाथ से निकलने लगा तो शिक्षा मंत्री ने रक्षा मंत्री से मुलाकात की। सोचें, शिक्षा मंत्री को शिक्षाविदों से मिलना चाहिए था लेकिन वे रक्षा मंत्री से मिले और वहां यह तय हुआ कि 21 जून को नीट की दोबारा हो रही परीक्षा में वायु सेना के विमानों से प्रश्न पत्र पहुंचाए जाएंगे। इस तरह सरकार ने साफ सुथरे ढंग से परीक्षा कराने में संपूर्ण नाकामी को स्वीकार कर लिया। वैसे नहीं भी स्वीकार करती तो देश देख रहा था कि सरकार पूरी तरह से नाकाम रही है। लेकिन प्रधानमंत्री के बाद सेना को इसमें शामिल करना अलग लेवल की होशियारी है।

ध्यान रहे जब सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से बताया गया कि प्रधानमंत्री खुद परीक्षा की निगरानी करेंगे और सेना का इस्तेमाल प्रश्नपत्र पहुंचाने के लिए किया जाएगा तो अदालत ने इस पर तंज करते हुए कहा था कि परीक्षा कराने वालों को शर्म आनी चाहिए। लेकिन परीक्षा कराने वाली एजेंसी यानी एनटीए और उससे ऊपर शिक्षा मंत्रालय को किसी बात में शर्म नहीं है। एक योजना के तहत प्रधानमंत्री और वायु सेना को इसमें जोड़ा गया है। याद करें कैसे 2024 में जब पेपर लीक हुआ था और नीट यूजी की परीक्षा कई जगह रद्द हुई थी तो शिक्षा मंत्रालय ने इसरो के अध्यक्ष की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई थी। के राधाकृष्णन कमेटी की सिफारिशें धूल फांक रही हैं और फिर पेपर लीक हो गया।

असल में उस समय भी सरकार को कुछ नहीं करना था। सिर्फ इसरो का नाम लेकर लोगों के गुस्से को शांत किया गया। वैसे ही अब भी प्रधानमंत्री की निगरानी और वायु सेना के विमानों से प्रश्न पत्र पहुंचवाने की बात करके लोगों के गुस्से को ठंडा किया जा रहा है और उनकी निराशा को दूर किया जा रहा है। इसी मकसद से शिक्षा मंत्री ने परीक्षा में दो आईआईटी को भी शामिल करने की बात कही थी। सरकार को भी पता है कि आईआईटी, प्रधानमंत्री और वायु सेना से समस्या का समाधान नहीं होना हैं। भांग कुएं में पड़ी है, मटके की सफाई करने से कुछ नहीं बदलना है। हालांकि इसका एक लाभ यह होगा कि फिर पेपर लीक हो गया और तब किसी ने सवाल उठाया तो उससे कहा जाएगा कि वह सेना पर सवाल उठा रहा है और इसलिए देशद्रोही है।

असल में प्रश्न पत्र सेंटर पर पहुंचाने के क्रम में पेपर लीक होना सॉल्वर गैंग के मोडस ऑपरेंडी का सिर्फ एक तरीका है। इस बार तो जहां प्रश्न पत्र तैयार किए गए वहीं से पेपर लीक हो गया था। ऐसी स्थिति में आप किसी भी तरीके से प्रश्न पत्र पहुंचाएं कोई फर्क नहीं पड़ता है। इसी तरह परीक्षा केंद्र पर किसी तरह की गड़बड़ी हो तब भी प्रश्न पत्र पहुंचाने के तरीके से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। सबसे पहले यह समझने की जरुरत है कि समस्या बहुस्तरीय है और संरचनात्मक है। इसे दूर करने के लिए संरचनात्मक तरीके से सुधार करने होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यूपीएससी से सबक लें। अगर सबक लें तो उसी तरह से एनटीए को संवैधानिक या वैधानिक संस्था बनाएं।

उसका डेडिकेटेड कैडर तैयार करें, ताकि अधिकारियों की जवाबदेही बने। प्रश्न पत्र तैयार करने के लिए विशेषज्ञों का बड़ा पूल तैयार करें, जिसमें किसी को यह पता नहीं हो कि किसके बनाए गए सेट से कितने प्रश्न परीक्षा में लिए जाएंगे। यूपीएससी की तरह प्रीलिम्स, मेन्स और इंटरव्यू की तीन स्तरीय व्यवस्था बनाएं या कम से कम जेईई मेन्स और एडवांस की तरह दो स्तरीय व्यवस्था बनाएं। साथ ही मेडिकल की पढ़ाई को सस्ता बनाएं। आज भी लोगों को दाखिले के लिए लाखों की कैपिटेशन फीस देनी होती है और एक करोड़ या उससे ज्यादा की फीस होती है। तभी लोग 10 या 20 लाख देकर प्रश्न पत्र खरीदने के विकल्प को चुनते हैं। इसलिए जो संरचनात्मक समस्या है उसके सुधार के लिए तात्कालिक उपायों से कुछ नहीं होगा। अभी तो यह दिख रहा है कि सरकार जो समाधान ले आई है वह समस्या से खराब है।


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