मुनीर के पंच बनने से भारत क्यों परेशान हो!

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पश्चिम एशिया मे चल रही जंग में मध्यस्थता करने के लिए अपने जैसा पंच चुना। ट्रंप ने अपने ‘फेवरिट फील्ड मार्शल’ आसिम मुनीर को यह जिम्मेदारी सौंपी की वे अमेरिका की ओर से तैयार किया गया 15 सूत्री शांति प्रस्ताव ईरान तक पहुंचाएं। हालांकि इससे ज्यादा भूमिका पाकिस्तान की नहीं दिख रही है। इसी भूमिका में तुर्किए भी है और मिस्र भी। ध्यान रहे पाकिस्तान अगर अपने को अल्लाह के आदेश से बना देश बताता है और मुस्लिम दुनिया की रहनुमाई का दावा करता है तो तुर्किए भी खलीफा के राज को जिंदा करने के प्रयासों में लगा है। जब से एर्दोआन वहां के राष्ट्रपति बने हैं तब से वे इस प्रयास में लगे हैं।

राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को मध्यस्थता के लिए चुनना अपने आप में एक कहानी है। इससे यह पता चल रहा है कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सत्ता सिर्फ दिखावे के लिए है। मुनीर ने वह हासिल कर लिया है, जिसे इससे पहले पाकिस्तान का कोई सैनिक तानाशाह हासिल नहीं कर पाया था। वे बिना किसी संवैधानिक पद और संवैधानिक जवाबदेही  के पाकिस्तान के शासक बन गए हैं। ट्रंप और मुनीर मे एक समानता यह है कि जिस तरह से फील्ड मार्शल आसिम मुनीर अपने इलहाम से पाकिस्तान की सेना का इस्तेमाल कर रहे हैं वैसे ही ट्रंप अमेरिका की सेना का कर रहे हैं। फर्क यह है कि अमेरिका दुनिया की महाशक्ति है और पाकिस्तान दुनिया का महाकंगाल देश है।

फिर भी जिस तरह से राष्ट्रपति ट्रंप ने वेनेजुएला से लेकर क्यूबा और नाइजीरिया से लेकर ईरान तक मोर्चा खोला है उसी तरह की मानसिकता में मुनीर भी काम कर रहे हैं। उन्होंने भी 2024 में ईरान से लड़ाई की तो 2026 में अफगानिस्तान से जंग कर रहे हैं। इस बीच भारत से भी एक सीमित जंग उन्होंने कर ली, जिसके बाद वे फील्ड मार्शल बने। अगर इजराइल और अमेरिका ने ईरान जंग में बच्चों के स्कूल पर मिसाइल दागी और सैकड़ों बच्चों को मार डाला तो उसी तरह आसिम मुनीर की सेना ने अफगानिस्तान के सबसे बड़े नशा निरोधक केंद्र पर हमला किया और चार सौ से ज्यादा मरीजों की हत्या कर दी। वह युद्ध अपराध था। चौथे जिनेवा कन्वेंशन में साफ तौर पर कहा गया है कि किसी भी हालत में अस्पताल पर हमला नहीं किया जा सकता है। लेकिन मुनीर ने किया। बहरहाल, ट्रंप ने अपनी तरह का पंच चुन लिया, जिस पर ईरान भी शायद ही भरोसा करे। ध्यान रहे 2024 में दोनों देशों के बीच सीमित युद्ध हुआ था। ईरान का आरोप है कि पाकिस्तान सुन्नी आतंकवादी समूहों को पनाह देता है और उनको ईरान के अंदर हमले के लिए उकसाता है। इसे लेकर दोनों के बीच विवाद इतना बढ़ गया था कि आतंकवादी समूहों को निशाना बनाने के लिए ईरान ने पाकिस्तान के अंदर घुस कर जैश अल अदल समूह के ठिकानों पर हमला किया था। इस हमले को पाकिस्तान ने अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया था और ईरान के अंदर बलूच आतंकी समूहों पर हमला किया था। तभी पाकिस्तान पर ईरान कितना भरोसा करेगा यह नहीं कहा जा सकता है।

परंतु सवाल यह है कि भारत को इस बात की चिंता क्यों करनी चाहिए या क्यों परेशान होना चाहिए? विदेश मंत्री एस जय़शंकर ने पाकिस्तान के मध्यस्थ चुने जाने पर जो प्रतिक्रिया दी उससे ऐसा लग रहा है कि भारत इस बात से परेशान है या चिढ़ गया है। पश्चिम एशिया के हालात पर बुलाई गई सर्वदलीय बैठक के बाद बताया गया कि बैठक में जब कांग्रेस के तारिक अनवर ने यह बात कही कि ईरान युद्ध में पाकिस्तान को अमेरिका ने मध्यस्थ चुना है और भारत की कोई भूमिका नहीं है तो इस पर जयशंकर ने कहा कि भारत ‘पाकिस्तान की तरह दलाल देश’ नहीं है। सबसे पहली बात तो यह है कि भारत की तरफ से ऐसी प्रतिक्रिया की कोई जरुरत नहीं थी। इससे ऐसा लग रहा है कि अमेरिका ने पाकिस्तान को चुन लिया इसलिए भारत चिढ़ गया है और पाकिस्तान को दलाल कह रहा है। भारत को यह स्वीकार करना चाहिए कि भारत से अमेरिका के जितने भी अच्छे संबंध हो जाएं पाकिस्तान उसकी प्राथमिकता में हमेशा ऊपर रहता है। निक्सन और किसिंजर के जमाने में भी चीन से संबंध सुधार के लिए अमेरिका को पाकिस्तान की जरुरत थी और आज भी कई कारणों से वह जरूरी है। दूसरी बात यह है कि जंग के बीच अमेरिका ने पाकिस्तान को एक काम के लिए चुना। इसमें पाकिस्तान से अपनी चिढ़ जाहिर करने का भी कोई अर्थ नहीं है।

जहां तक युद्ध के समय या भू राजनीतिक तनाव की स्थितियों में किसी देश की मध्यस्थता का सवाल है तो उसे ‘दलाली करना’ नहीं कहा जा सकता है। इस बात को विदेश मंत्री जयशंकर बखूबी जानते हैं। ईरान के साथ तनाव के बीच ओमान मध्यस्थता कर रहा था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर को वार्ताकार नियुक्त किया था। हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच सीधी बातचीत नहीं हो रही थी लेकिन ओमान के विदेश मंत्री के जरिए दोनों देशों में वार्ता हुई। पहले मस्कट में और फिर जिनेवा में बातचीत हुई थी। अगर विदेश मंत्री जयशंकर की पाकिस्तान के बारे में कही गई बातों को वहां तक ले जाएं तो क्या यह कहेंगे कि ओमान दलाली कर रहा था? उससे पहले कतर ने इजराइल और हमास के बीच मध्यस्थता का प्रयास किया। तो क्या कतर को दलाल देश कहेंगे? उससे भी पहले रूस और यूक्रेन युद्ध खत्म करने के लिए तुर्किए की मध्यस्थता में रूस और यूक्रेन के प्रतिनिधियों की कई बार वार्ता हुई। तो क्या तुर्किए की मध्यस्थता को दलाली करना कह सकते हैं? अमेरिका स्वंय रूस और यूक्रेन युद्ध में मध्यस्थता कर रहा है। तो उसे क्या कहेंगे? ऐसे ही दुनिया के कई देशों ने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी युद्ध रूकवा सकते हैं। वैसे तो अभी का भारत ऐसी कोई पहल नहीं करेगा लेकिन अगर करता तो उसे क्या कहा जाता?

विदेश मंत्री एस जय़शंकर करियर डिप्लोमेट हैं और उनको पता है कि कूटनीति शब्दों का ही खेल है। उसमें बातें कॉम्पलेक्स और लेयर्ड होती हैं। अगर किसी देश को दूसरे से चिढ़ भी है तो उसे किन शब्दों में जाहिर करेंगे इसी का प्रशिक्षण कूटनीति में दिया जाता है। अगर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भारत को नाराजगी है कि उन्होंने पाकिस्तान को क्यों चुना तो उसे भी जाहिर करने के लिए उन शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है, जिनका इस्तेमाल विदेश मंत्री ने किया। अगर पाकिस्तान को चुनने के पीछे भारत को चिढ़ाना ट्रंप का एक मकसद था तो वे उसमें कामयाब हो गए हैं। भारत के विदेश मंत्री के बयान से ऐसा लगा कि पाकिस्तान के लिए खराब से खराब विशेषण इस्तेमाल करने की कोई प्रतिस्पर्धा चल रही है, जिसमें उन्होंने सबको मात देने की ठानी है।


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