मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धांत इस प्रस्थापना पर टिका है कि कोई भी विचार पूर्ण नहीं होता है। जैसे ही एक विचार प्रकट होता है उसका प्रति विचार भी प्रकट हो जाता है। फिर इन दोनों में टकराव से एक नया विचार पैदा होता है और उसके पैदा होते ही उसका प्रति विचार भी पैदा हो जाता है। यह सतत चलने वाली प्रक्रिया है। लोकतंत्र का सिद्धांत भी कहीं न कहीं इससे जुड़ा है। कोई भी सरकार पूर्ण नहीं होती है और न उसके निर्णय पूरी तरह से सही होते हैं। इसलिए जनता सरकार के साथ साथ विपक्ष भी चुनती है और विपक्ष की जिम्मेदारी होती है कि वह सरकार को जवाबदेह बनाए।
वह सरकार की नीतियों या फैसलों में कमी बताए, बिना भय या संकोच के अपनी असहमति जाहिर करे और सरकार का कर्तव्य है कि वह असहमति की आवाजों को सम्मान के साथ सुने। यह स्वीकार करे कि उससे असहमत होने वाला उसका शत्रु नहीं है। वह इसके लिए भी खुले दिल से तैयार रहे कि उससे असहमत होने वाली आवाज हो सकता है कि सही हो। अगर असहमति की आवाज सही है तो उसे स्वीकार करने का साहस होना सबसे बड़ा गुण है। अगर किसी सरकार में यह गुण हो तो उसे सर्वाधिक लोकतांत्रिक माना जाएगा।
दुर्भाग्य से पिछले कुछ समय से भारत में असहमति की आवाजों को शत्रु माना जाने लगा है। उसे स्वीकार करना या सुनना तो दूर की बात है उसे दबा देने की हरसंभव कोशिश हो रही है। प्रयास किया जा रहा है कि असहमति की आवाज निकले ही नहीं। तभी सरकार के खिलाफ हर प्रदर्शन को विदेशी साजिश करार दिया जा रहा है। हर विरोध प्रदर्शन को देश विरोधी टूलकिट की साजिश बताया जा रहा है। सरकार से असहमत हर व्यक्ति की साख बिगाड़ने और देश व समाज के प्रति उसकी निष्ठा को संदिग्ध बनाने की कोशिश हो रही है। इसमें संदेह नहीं है कि राजनीति आधारित संसदीय व्यवस्था में विपक्ष का कुछ विरोध या असहमति राजनीतिक होगी या बढ़ा चढ़ा कर बताई जा रही होगी। कई बार विपक्ष का विरोध का तरीका सामान्य स्वीकार्य मानकों के अनुरूप नहीं होगा। कई बार मंशा सही होते हुए भी विरोध प्रदर्शन का तरीका गलत हो सकता है। ले
किन तब भी सरकार का काम यह नहीं है कि वह प्रदर्शन के तरीके को आधार बना कर समूचे विपक्ष को देशद्रोही या पापी ठहराए और उनके ऊपर पुलिस की कार्रवाई कराए। पहले की सरकारों ने भी विपक्ष पर ज्यादती की। इंदिरा गांधी ने तो समूचे विपक्ष को ही जेल में बंद कर दिया था। अन्ना हजारे और रामदेव के आंदोलन को भी दबाया गया या दबाने की भरपूर कोशिश हुई।
इसके बावजूद ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ कि सरकार के खिलाफ विपक्ष का हर छोटा बड़ा प्रदर्शन साजिश माना जा रहा है। परंतु अब हर असहमति को साजिश मानना भारत के लोकतंत्र की वास्तविकता बन गई है। चाहे किसान आंदोलन हो या सीएए विरोधी आंदोलन। सरकार ने किस तरह से इसको हैंडल किया और सरकार के इकोसिस्टम ने इन प्रदर्शनों के बारे में क्या कुछ कहा और लिखा उसे दोहराने की जरुरत नहीं है। सीएए के विरोध में उतरी 90 साल की महिला का भी अपमान हुआ तो किसानों का समर्थन करने वाली 21 साल की दिशा रवि को भी ‘टूलकिट’ बताया गया। अब पता नहीं वह ‘टूलकिट’ कहा हैं? इन बीती बातों को छोड़ दें तो ताजा घटनाक्रम और चिंता पैदा करने वाला है।
राजधानी दिल्ली के भारत मंडपम में इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 का आयोजन हुआ। उसके आखिरी दिन यूथ कांग्रेस के कुछ नेता और कार्यकर्ता सम्मेलन के अंदर घुसे और उन्होंने कपड़े उतार कर प्रदर्शन किए। प्रदर्शन के इस तरीके की ज्यादातर लोगों ने आलोचना की। कांग्रेस की कई सहयोगी पार्टियों ने भी इस पर सवाल उठाए। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यूथ कांग्रेस का प्रदर्शन करने का तरीका गलत था। भारत मंडपम में एआई समिट चल रहा था, वहां गुरिल्ला वॉर की तरह जाकर प्रदर्शन करने की कोई जरुरत नहीं थी। दुनिया भर के देशों के प्रतिनिधियों के सामने उस तरह कपड़े उतार कर प्रदर्शन करना तो बहुत ही खराब था।
प्रदर्शन का तरीका गलत था और साथ ही स्थान व समय का चुनाव भी गलत था लेकिन क्या इस आधार पर देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के यूथ संगठन को देशद्रोही कहने, विपक्षी नेताओं पर साजिश के आरोप लगाने और अंत में प्रधानमंत्री का इस प्रदर्शन को पाप कहने को न्यायसंगत कहा जा सकता है? कांग्रेस के कुछ नेताओं ने ब्राउनी प्वाइंट्स हासिल करने के लिए इस तरह का प्रदर्शन कर दिया, लोगों का ध्यान खींचने के लिए अति उत्साह में प्रदर्शन का अपारंपरिक तरीका चुना लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि वे लोग देश के विरोधी हैं या किसी साजिश के तहत वहां गए थे या उनका मकसद एआई समिट में कोई विघ्न डालना था या भारत की छवि खराब करना था।
अगर कोई यह सोचता है कि यूथ कांग्रेस के लोगों ने कपड़े उतार कर प्रदर्शन कर दिए तो उससे अब भारत में एआई की संभावित क्रांति थम जाएगी या दुनिया के देश अब भारत में एआई में निवेश नहीं करेंगे तो उससे बड़ा मूर्ख कोई नहीं होगा। दुनिया भारत की छवि खराब होने की बात को और भी बेहूदा बात है। किसी देश की छवि ऐसी बातों से खरीब नहीं हुआ करती है। और अगर भाजपा के इकोसिस्टम की बात मानें तो प्रधानमंत्री ने तो भारत को विश्वगुरू बना दिया है तो क्या विश्वगुरू की छवि इतनी कमजोर है कि कुछ युवाओं के प्रदर्शन करने से खराब हो जाएगी?
बहरहाल, अमेरिका और यूरोप के देशों से ज्यादा प्रदर्शन और कहीं नहीं होते हैं। हर वैश्विक सम्मेलन से बाहर एक नहीं, कई कई संगठन लगातार प्रदर्शन कर रहे होते हैं। उनके पोस्टर ज्यादा भड़काऊ होते हैं और सीधे अटैक करने वाले होते हैं। पेरिस में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के समय ऐतिहासिक लूव्र म्यूजियम के सामने पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने बिल्कुल नग्न होकर प्रदर्शन किया। लेकिन फ्रांस के किसी नेता ने नहीं कहा कि इससे देश की छवि खराब हुई है। हर साल होने वाले संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के समय न्यूयॉर्क में या विश्व आर्थिक मंच की बैठक के समय दावोस में लगातार किसी न किसी मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन चलता रहता है। लेकिन कोई भी सरकार या देश इसे साजिश और देशद्रोह नहीं कहता है।
इसके उलट भारत में इसे न सिर्फ साजिश और देशद्रोह कहा गया, बल्कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेरठ की एक जनसभा में कहा कि कांग्रेस ने पाप किया है। सवाल है कि लोकतंत्र में प्रदर्शन करना कब से पाप हो गया? उनके प्रदर्शन का तरीका गलत हो सकता है, स्थान व समय का चयन भी गलत हो सकता है लेकिन इस आधार पर न तो विरोध प्रदर्शन को पाप कहा जा सकता है और न साजिश या देशद्रोह। पता नहीं कांग्रेस के विरोध से देश की छवि खराब हुई या नहीं लेकिन उसके बाद पुलिस जो कर रही है उससे जरूर एक लोकतंत्र के नाते भारत की छवि खराब हो रही है।
असल में भारत मंडपम में कांग्रेस के प्रदर्शन के बाद सरकार ने जैसी प्रतिक्रिया दी है वह असहमति की आवश्यकता से इनकार की सोच का लक्षण है। यह भारत की राजनीति का स्थायी तत्व बन गया है। अगर विपक्ष को सरकार की कोई भी बात सहमत होने लायक नहीं लग रही है तो सरकार को भी विपक्ष की कोई भी आलोचना सुनने योग्य नहीं प्रतीत हो रही है। तभी संसद में राहुल गांधी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर भाषण नहीं दे पाए और जब विपक्ष ने इसके जवाब में सत्तापक्ष के भाषण को बाधित किया तो प्रधानमंत्री इस आधार पर संसद में चर्चा का जवाब नहीं देने आए कि कुछ अप्रत्याशित घट
सकता है।
सोचें, संसद के अंदर, चुने हुए सांसदों को लेकर इतनी शंका और इतना अविश्वास होगा तो लोकतंत्र कैसे चलेगा? इतना ही नहीं राष्ट्रपति के अभिभाषण का विवाद निपटा तो राहुल गांधी बजट पर बोले और उसे लेकर भी उनके खिलाफ सब्सटेंसिव मोशन पेश कर दिया गया। सवाल है कि सरकार क्या चाहती है? विपक्ष संसद में भी नहीं बोले और बाहर भी उसके लोग प्रदर्शन न करें? या जिस तरह भाजपा के लोग अपने शीर्ष नेतृत्व की सारी बातें सिर झुका कर और आंख बंद करके मानते हैं वैसे ही विपक्ष भी माने? क्या ऐसी सोच से लोकतंत्र मजबूत होगा और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की छवि मजबूत होगी?
