बिहार में कोई काम नहीं है। सचमुच कोई काम नहीं है। शराबबंदी ने जरूर कुछ लोगों को काम पर लगाया है, जैसे स्कूली बच्चे और बच्चियां अपने स्कूल बैग में शराब की बोतलें ढो रहे हैं। जमीन के कारोबार में भी कुछ भी लोग लगे हैं। हालांकि इनमें भी ज्यादातर काम फर्जीवाड़े का है। जिन लोगों के पास सरकारी नौकरी है उनकी बात छोड़ दें तो अधिकतर परिवार खेती पर आश्रित हैं। घरों में बूढ़े बचे हुए हैं, जो बाहर कमाने वाले अपने बच्चों की ओर से पैसे आने का इंतजार कर रहे होते हैं।
लगभग हर परिवार से एक या उससे ज्यादा व्यक्ति बाहर हैं। जो गरीब है, अक्षम है उसके बच्चे कमाने गए हैं और जो सक्षम है उसके बच्चे पढ़ने गए हैं या पढ़ लिख कर बाहर ही सेटल हो गए हैं। भयावह स्थिति है बिहार में। लेकिन सरकार के मुखिया नीतीश कुमार पूरी तरह से गाफिल हैं। उनको न अपनी सुध बुध है और न सरकार की। उनके बदले में जो लोग सरकार चला रहे हैं सब सत्तालोलुप और स्वार्थी लोग हैं, जिन्हें बिहार की बेहतरी से कोई मतलब नहीं है।
वैसे बिहार की यह दुर्दशा पिछले करीब चार दशक से है लेकिन अब स्थिति और खराब हो गई है। लेकिन इसमें भी नेता बिहार के लोगों को मूर्ख बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। पिछले साल दिसंबर में जब एनडीए को दो सौ सीटों से ज्यादा का बहुमत मिला और सरकार बनी तो कैबिनेट की पहली बैठक में बिहार में सेमीकंडक्टर हब बनाने, आईटी सिटी बनाने, सेटेलाइट शहर विकसित करने जैसे बड़े प्रस्ताव पास किए गए। लोगों को लगा कि अब उनका जीवन बदलने वाला है। लेकिन बजट आया तो उसमें ऐसा कुछ नहीं था, जिससे लगे कि बिहार में कुछ बदलने का प्रयास होगा। अगले साल का बिहार का बजट तीन लाख 47 हजार करोड़ रुपए का है, जिसमें से 74 फीसदी हिस्सा केंद्रीय करों में हिस्से के रूप में और केंद्र से अनुदान के रूप में मिलेगा।
सोचें, बिहार अपने राजस्व से अपने बजट का सिर्फ 26 फीसदी हिस्सा जुटा पाता है। इसमें भी टैक्स और नॉन टैक्स राजस्व कुल 65 हजार करोड़ रुपए का ही है। बिहार पर चार लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का कर्ज है। सरकार का सारा पैसा वेतन, भत्ते, पेंशन, कर्ज का ब्याज आदि चुकाने में खर्च होता है। सरकार के पास राजस्व बढ़ाने की कोई दृष्टि नहीं है और न कोई राजनीतिक इच्छाशक्ति है। नीति आयोग के आंकड़ों की याद दिलाने की जरुरत नहीं है कि विकास के हर मानक पर बिहार सबसे नीचे है।
ऐसी वित्तीय स्थिति वाले राज्य में जब नया हवाईअड्डा बनाने की बात सुनाई दे तो कैसा महसूस होगा? बिहार के लोग राजनीतिक रूप से बहुत जागरूक बताए जाते हैं। लेकिन पता नहीं ऐसे मामलों में उनकी जागरूकता कहां चली जाती है? पिछले दिनों बिहार सरकार ने कैबिनेट की बैठक में पटना से सटे सोनपुर में एक ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट के निर्माण का ऐलान किया। कहा गया कि इसके लिए 42 सौ एकड़ जमीन का अधिग्रहण होगा। जमीन अधिग्रहण के लिए 1,302 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया। दावा किया गया कि यह नवी मुंबई के एयरपोर्ट की तरह होगा। सोनपुर में प्रस्तावित हवाईअड्डे का बजट चार हजार करोड़ रुपए से कुछ ज्यादा का है।
सवाल है कि बिहार जैसे राज्य की प्राथमिकता में पटना के बगल में एक और हवाईअड्डा बनाने की बात कैसे आ सकती है? किसी भी समझदार और बिहार के प्रति ईमानदारी व्यक्ति को बिहार के लिए जरूरी एक हजार कामों की सूची बनाने को कहा जाए तो उसमें भी हवाईअड्डे को निर्माण को जगह नहीं मिलेगी। लेकिन यहां सरकार की पहली प्राथमिकता हवाईअड्डा बनाने की दिख रही है!
यह कितना गैरजरूरी है इसे बिहार के हवाईअड्डों की स्थिति और हवाई यात्रियों की संख्या से समझा जा सकता है। सोनपुर में जहां नया हवाईअड्डा प्रस्तावित किया गया है वह पटना हवाईअड्डे से अधिकतम 25 किलोमीटर की दूरी पर है। सो, पहला सवाल तो यही है कि पटना हवाईअड्डे से 25 किलोमीटर दूर एक और हवाईअड्डा क्यों बनाना है? क्या पटना हवाई ट्रैफिक का लोड नहीं उठा पा रहा है?
क्या सोनपुर कोई बड़ा औद्योगिक शहर है, जहां दुनिया भर से लोग आते हैं और जहां से लाखों टन माल की आपूर्ति होती है? सोनपुर क्या कोई गिफ्ट सिटी है? कोई साइबर सिटी है? ऐसा कुछ नहीं है! फिर भी वहां ग्रीनफील्ड हवाईअड्डे का प्रस्ताव है, जिसे 2030 तक बना देना है। हालांकि सबको पता है कि कुछ नहीं होगा। कोई हवाईअड्डा नहीं बनेगा। सिर्फ इतना होगा कि आसपास की जमीनें महंगी हो जाएंगी और कुछ शरीफ लोग जमीनों में फर्जीवाड़ा करने वालों के जाल में फंस जाएंगे।
ऐसा मानने के कई कारण हैं। पहला कारण तो यह है कि बिहार में हवाई जहाज पर चढ़ने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है। पटना के जयप्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे से हर दिन नौ से 10 हजार लोग औसतन सफर करते हैं। राज्य के दूसरे सबसे बड़े एयरपोर्ट दरभंगा हवाईअड्डे से हर दिन दो से ढाई हजार लोग सफर करते हैं। सोचें, यह उत्तर बिहार का इकलौता एयरपोर्ट है। तिरहुत और सारण दोनों कमिश्नरी के अलावा कोशी का पूरा इलाके इसके दायरे में आता है। बिहार चुनाव से पहले पूर्णिया में हवाईअड्डा बना। वहां का रोज का ट्रैफिक पांच से सात सौ यात्रियों का है। वहां प्री फैब्रिकेटेड मैटेरियल से हवाईअड्डा बना हुआ है। दोनों हवाईअड्डों पर बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं।
पटना से दूसरी तरफ चलेंगे तो बिहटा में हवाईअड्डा बनने की बात बरसों से चल रही है तो गया का इंटरनेशनल एयरपोर्ट चल रहा है। गया जैसे शहर में, जहां पूरे दक्षिण बिहार का इकलौता हवाईअड्डा है और बोधगया, राजगीर जैसे टूरिस्ट प्लेस हैं, बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा तीर्थस्थल है और फिर भी गिनती की उड़ानें संचालित होती हैं। वहां कुल नौ सौ से एक हजार यात्री हर दिन सफर करते हैं। इस तरह राज्य में संचालित चार हवाईअड्डों से औसतन 13 से 14 हजार लोग हर दिन सफर करते हैं यानी महीने में चार लाख और साल में 50 लाख से कुछ कम।
इतना कम हवाई ट्रैफिक का कारण यह है कि बिहार में लोगों की आर्थिक स्थिति हवाई जहाज में उड़ने की नहीं है। दूसरी बात यह है बिहार में न तो कोई औद्योगिक गतिविधि है, न कारोबारी गतिविधि है, न शैक्षिक या सांस्कृतिक गतिविधि है फिर हवाई जहाज से कौन आएगा या जाएगा! क्या बिहार के नेता समझ रहे हैं कि हवाईअड्डा खुल जाएगा तो होली, दिवाली में या शादी के सीजन में ट्रेनों से लद कर जाने वाले लोग हवाई जहाज से जाने लगेंगे? ऊपर से यह बेहूदा दावा किया गया कि नवी मुंबई जैसा हवाईअड्डा बना देंगे। सोचें, नवी मुंबई पर पहले चरण में सालाना दो करोड़ यात्रियों को हैंडल करने की व्यवस्था है, जबकि बिहार के चार हवाईअड्डे पर दिन में औसतन 13 से 14 हजार और साल में 50 लाख से कम यात्री आते जाते हैं।
कहां नवी मुंबई एयरपोर्ट पर पहले चरण में दो करोड़ और कहां पूरे बिहार में 50 लाख यात्री! इस हकीकत के बावजूद सोनपुर में एक और हवाईअड्डा बनाने की घोषणा हो गई।
सोचें, बिहार में केंद्रीय विद्यालय खोलने के लिए नीतीश कुमार ने जमीन देने से मना कर दिया था। उपेंद्र कुशवाहा जब केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री थे तब उन्होंने कई केंद्रीय विद्यालय मंजूर कराए थे। लेकिन नीतीश कुमार ने कहा कि उनके पास एक केंद्रीय विद्यालय के लिए पांच एकड़ जमीन देने के लिए नहीं है। अब वही नीतीश कुमार सरकार कह रही है कि 42 सौ एकड़ जमीन हवाईअड्डा के लिए देंगे! ध्यान रहे जमीन का अधिग्रहण बिहार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
असल में जब नेताओं के पास कुछ करने को नहीं होता है तो वे इस तरह की बातों में लोगों को उलझाते हैं। पहले बिहार के नेता दिल्ली के सत्ता गलियारे में फाइल लेकर सिर्फ इसलिए घूमते थे कि अपने चुनाव क्षेत्र में कहीं ट्रेन का स्टॉपेज करा देंगे, कोई नया स्टेशन बनवा दें या कोई नई ट्रेन चलवा दें। वहीं नेता अब हर शहर में हवाईअड्डा खोल रहे हैं। उत्तर बिहार में रक्सौल, मोतिहारी और मुजफ्फरपुर में हवाईअड्डा खोलने का ऐलान हो चुका है। दरभंगा में खुल चुका है। सोनपुर में घोषणा हो गई है। सीमांचल में पूर्णिया में हवाईअड्डा शुरू हो गया है। पटना, गया और बिहटा में हवाईअड्डा है तो नालंदा में भी बनाने की चर्चा है। इस तरह राज्य के हर छोटे बड़े शहर में एक हवाईअड्डा होगा। चाहे वहां से हवाई जहाज पर चढ़ने वाला कोई हो या नहीं हो!
