नोटबंदी, कोविड के बाद फिर कतार का समय!

Categorized as श्रुति व्यास कालम

भारत में फिर संकट की स्थिति है। यह वाक्य असाधारण नहीं है। रोजमर्रा की बात है। कई मायनों में संकट देश की एक स्थायी राष्ट्रीय स्थिति बन गया है। एक के बाद एक संकट मोदी सरकार की पहचान हैं। इसे आज के शेयर बाजार से भी बूझ सकते है। हल्का सा तेज होता है और फिर घड़ाम नीचे। सरकार हो या निवेशक या लोग—अनुमान लगा ही नहीं सकते कि संकट के भंवर कैसे और कितने गहरे हैं। शेयर बाजार के सेंसेक्स में एक ही दिन में ढाई हजार प्वाइंट की गिरावट! हालांकि यह संकट ऐसा है जिस पर भारत का बस नहीं है, मगर ऐसे संकट अधिक हैं जो स्वयं निर्मित हैं या थे। ये बार-बार बताते हैं कि तैयारी की कमी और दिखावे की राजनीति में खोए रहने से संकटों का सिलसिला स्थाई है।

साल 2016 की नोटबंदी किसी परिस्थिति की दुर्घटना नहीं थी, बल्कि एक ऐसा निर्णय था जिसकी नैतिक आवश्यकता के रूप में घोषणा हुई। मतलब भ्रष्टाचार खत्म करना, काला धन समाप्त करना और अर्थव्यवस्था को अनुशासित करने की गारंटी का वादा। लेकिन जो सामने आया, वह अव्यवस्था थी। इससे भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़, असंगठित क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ। कई लोग उससे कभी पूरी तरह उबर नहीं पाए। असल में जो हुआ वह थी लंबी कतारें, छोटे रोज़गारों का झटका और काले धन के नए सर्कल का निर्माण। उस वर्ष से ही आर्थिक अनिश्चितता का स्थायी अनुभव बना हुआ है।

छह साल बाद, 2020 में कोविड आया। एक वैश्विक आपदा, लेकिन भारत में वह एक दर्पण बन गया। उसने हमारे सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र की कमजोरी, सत्ता की उदासीनता और प्रशासनिक अव्यवस्था को उजागर किया। उसने दिखाया कि राज्य कितना अप्रस्तुत था। कैसे पीड़ा एक बाज़ार में बदल गई। जब लोग ऑक्सीजन, अस्पताल के बिस्तर, दवाइयाँ और गरिमा खोज रहे थे, तब जनता से कहा गया—दीया जलाओ, बर्तन बजाओ। लंबी कतारों में लोग खड़े थे, चिंता और पीड़ा के साथ, एक धीमी, गहराती निराशा में। अनिश्चितता गुजर नहीं रही थी, वह बस ठहर रही थी।

और उसके बाद से पूरी चिकित्सा व्यवस्था आम जिंदगी में बाज़ार, महंगे इलाज और सेहत की स्थायी चिंता का पर्याय बन गई है।

और अब, लगभग एक लय की तरह, एक और नया संकट सामने है।

फिर छह साल बाद, उसी महीने में, भारत—और दुनिया—एक बार फिर एक नए दबाव से जूझ रहे हैं। इस बार कारण है पश्चिम एशिया की अस्थिरता और ऊर्जा संकट। इसके साथ एक बार फिर वही दृश्य सामने है। नियंत्रण का भ्रम टूट रहा है। व्यवस्था फिर अपने असली रूप में दिख रही है—डिज़ाइन में कमजोर, असर में असमान, और संकट के बिना खुद को प्रकट करने में असमर्थ। कतारें लौट आई हैं, सूचना से तेज़ भ्रम फैल रहा है, काला बाज़ार सक्रिय होने लगा है, और दृश्य फिर से जाना-पहचाना लगता है। अनिश्चितता अब अचानक नहीं है, वह जैसे स्वाभाविक हो गई है।

एक मार्च से लोग सुबह से रात तक गैस एजेंसियों के बाहर 14.2 किलो के घरेलू सिलेंडर के लिए खड़े हैं। और यह—एक सामान्य परिवार के घर के चूल्हे की बुनियादी ज़रूरत है। इस समय भी केवल कमी ही नहीं, बल्कि भ्रम, कन्फ्यूजन और सरकार की नीयत को लेकर लोग परेशान हैं। मेरे यहाँ काम करने वाली एक महिला ने पिछले हफ्ते सहजता से कहा—“सब लोग गैस एजेंसी जा रहे थे, तो मैंने भी अपने बेटे को भेज दिया देखने कि क्या हो रहा है।” स्पष्टता नहीं है, केवल अनुकरण है। लोग कतार में इसलिए लग रहे हैं क्योंकि कतारें मौजूद हैं।

सड़क पर किसी ने पूछा—ईरान में युद्ध मेरे रसोई तक कैसे पहुँच गया? हिसाब से यह सवाल सरकार और उसके हर नीति-निर्माता को असहज करने वाला होना चाहिए।

घरों में एक समान स्थिति है। किसी को स्पष्ट नहीं कि गैस की कमी क्यों हुई? जानकारी टुकड़ों में आती है, अगर आती है तो। कई परिवार अब एक सिलेंडर पर गुज़ारा कर रहे हैं। दूसरा कई दिन पहले खत्म हो चुका है। बुकिंग के हर रास्ते—ऐप, व्हाट्सएप, फोन—आजमाए जा रहे हैं, पर कुछ नहीं हो रहा। अंत में परिवार का कोई बुज़ुर्ग सदस्य, जो पहले से स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा होता है, घंटों लाइन में खड़ा होता है और उसे कुछ दिनों बाद आने को कहा जाता है। तारीख मिलना एक तरह की राहत देता है, लेकिन भीतर यह समझ भी होती है कि यह समाधान नहीं, टालना है।

3 मार्च को सरकारी सूत्रों ने कहा कि भारत “आरामदायक स्थिति” में है—दो से तीन सप्ताह की गैस, 50 दिन तक का ईंधन भंडार। यह आश्वासन था। लेकिन बिना निरंतरता के आश्वासन जल्दी समाप्त हो जाता है। अब वे तीन सप्ताह लगभग पूरे होने को हैं। स्पष्टता अभी भी नहीं आई है।

अब तक प्रधानमंत्री की ओर से कोई सीधा, निरंतर संवाद नहीं आया, जो इस स्थिति के अनुरूप हो। यह उस नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण अनुपस्थिति है, जिसने अपनी राजनीति सीधे संवाद पर बनाई है। जैसे-जैसे संकट बढ़ा, राजनीतिक ऊर्जा कहीं और दिखाई दी—चुनावों में, विपक्ष में, अतीत में।

संसद सत्र में होने के बावजूद, यह तात्कालिकता उसके भीतर नहीं पहुँची। विपक्ष—243 सांसद—बार-बार इस पर चर्चा की मांग कर रहे हैं। लेकिन संसद, जो सामूहिक उत्तरदायित्व का मंच होनी चाहिए, वह फिर से स्थगन, व्यवधान और टालने का मंच बन जाती है। ऐसा नहीं है कि संसद चर्चा नहीं कर सकती, बल्कि यह है कि अब व्यवस्था संकट को चर्चा योग्य विषय मानती ही नहीं।

दूसरे देशों से तुलना करें।

जापान और दक्षिण कोरिया, जो आयातित ऊर्जा पर अधिक निर्भर हैं, उसी संकट का सामना कर रहे हैं। लेकिन उनकी प्रतिक्रिया अलग है। वे जल्दी संवाद करते हैं, चरणबद्ध ढंग से रिजर्व का तेल जारी करते हैं, उद्योग से समन्वय करते हैं और नागरिकों से संयम की अपील करते हैं। संदेश यह नहीं होता कि संकट नहीं है। संदेश यह होता है—हाँ, संकट है, यह स्थिति है, और यह हम कर रहे हैं।

वियतनाम जैसे छोटे देश ने भी व्यवहार स्तर पर तेजी दिखाई है। वर्क फ्रॉम होम, यात्रा में कमी, मूल्य नियंत्रण और शुरुआती हस्तक्षेप—ताकि संकट सड़क पर दिखने से पहले नियंत्रित हो जाए।

भारत में क्रम उल्टा दिखाई देता है। पहले संकट दिखता है। राज्य की प्रतिक्रिया बाद में तैयार होती है।

भारत आज खुद को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था कहता है। एक उभरती शक्ति, वैश्विक दक्षिण की आवाज़। लेकिन यह कथित बड़ा आर्थिक आकार प्रशासनिक दक्षता की गारंटी नहीं देता। वैश्विक स्थिति घरेलू स्थिरता सुनिश्चित नहीं करती।

संकट में ताकत का मापदंड अलग होता है—प्रतिक्रिया की गति, संवाद की स्पष्टता और आम जीवन को झटकों से बचाने की क्षमता।

इसके बजाय, हमें शासन के स्थान पर संकेत मिलते हैं। सरकार नागरिकों से घबराकर खरीदारी न करने की अपील करती है, जबकि खुद वैकल्पिक आपूर्ति तलाश रही है। लेकिन नागरिकों की प्रतिक्रिया क्या वास्तव में असंगत है?

जाहिर है, भरोसा और चैन सलाह से नहीं बनते। वह सरकार की साफ नीयत और स्पष्टता से आते हैं।

और जब स्पष्टता नहीं है, तो आम आदमी अपने परिवार के लिए तैयारी क्यों न करे? जिसे जमाखोरी कहा जा रहा है, वह दरअसल आत्म-प्रबंधन है—नागरिक वही कर रहे हैं, जो राज्य को करना चाहिए था।

सबसे चिंताजनक यह है कि यह सब सामान्य लगता जा रहा है। लोग सवाल भी नहीं कर रहे। ईरान पर पहला हमला होते ही कतारें लग गईं। इंडक्शन स्टोव खरीदे जा रहे हैं। गांवों में चूल्हे लौट रहे हैं। ट्रेन में फिर से उपले बिक रहे हैं। कोयला, लकड़ी—जो भी जल सके—संग्रह किया जा रहा है।

खाड़ी की लड़ाई चौथे सप्ताह में प्रवेश कर रही है और उसका प्रभाव अब दूर नहीं रहा।

भारत फिर संकट में है। लेकिन यह अब केवल संकट नहीं है।

2016 की नोटबंदी को सुधार कहा गया था, लेकिन उसने एक उलटी आदत बनाई। एक ऐसा देश, जो बिना सवाल किए व्यवधान सहने के लिए तैयार हो गया। कतार में खड़ा रहना, स्पष्टता का इंतजार करना, उस व्यवस्था का इंतजार करना जो हमेशा पीछे चलती है—पर संकट आने पर ताली-थाली बजाने के लिए कहती है!

यह एक निरंतरता है।

धीरे-धीरे अनिश्चितता को जीना।

और यही अब भारत की वास्तविकता है।


Previous News Next News

More News

प्रदर्शनकारियों को डराने का अभियान

July 31, 2026

छात्रों और युवाओं के आंदोलन से घबरा कर केंद्र सरकार ने उनकी मांगें तो मान लीं लेकिन ऐसा लग नहीं रहा है कि उन मांगों को पूरी तरह से स्वीकार करने का सरकार का इरादा है। अब कई तरह के अगर मगर किए जा रहे हैं और दूसरी ओर कॉकरोच जनता पार्टी के नेता व…

अब नहीं हो पाएगा छात्रों का प्रदर्शन

July 31, 2026

बुधवार की शाम को छात्रों के कई समूह जंतर मंतर पर पहुंचे थे। करीब दो घंटे तक उन्होंने प्रदर्शन किया। लेकिन उसमें बहुत उत्साह नहीं दिखा। छात्रों के ये समूह वामपंथी पार्टियों से जुड़े हुए हैं। गौरतलब है कि कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को भी वामपंथी पार्टियों ने समर्थन दिया था। आईसा, एआईएसएफ और…

थरूर, तिवारी आदि शिक्षा पर बहस से बाहर रहे

July 31, 2026

कांग्रेस पार्टी के नेता भाजपा के अनुशासन और एक नेता के प्रति सबके समर्पण को लेकर भाजपा और संघ का मजाक उड़ाते हैं। लेकिन असल में कांग्रेस में भी सब कुछ वैसा ही है, जैसा भाजपा में है। कांग्रेस में भी आलाकमान के खिलाफ बोलने या उससे अलग राय रखने वालों के लिए कोई जगह…

दिल्ली में सिर्फ 17 लाख महिलाओं को मिलेगा लाभ

July 31, 2026

दिल्ली की आबादी दो करोड़ के करीब है और डेढ़ करोड़ मतदाता हैं। अगर सिर्फ मतदाताओं की संख्या के लिहाज से देखें तो 70 लाख के आसपास वयस्क महिलाएं हैं, जो मतदाता हैं। लेकिन दिल्ली की रेखा गुप्ता सरकार ने महिला सम्मान के नाम पर जिस लक्ष्मी योजना की शुरुआत की है उसमें सिर्फ 17…

बंगाल में अलग प्रयोग चल रहा है

July 31, 2026

पश्चिम बंगाल सरकार ने स्कूलों में बच्चों के मिड डे मील में अंडा शामिल करने का ऐलान किया है। इससे लेफ्ट, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के नेता काफी खुश हैं कि उन्होंने दबाव डाल कर सरकार को मजबूर किया कि वह बच्चों के खाने में अंडा शामिल करे। लेकिन क्या सचमुच सरकार को लगा है…

logo