तो “दुबई मॉडल” भू-राजनीति की लपटों में!

Categorized as श्रुति व्यास कालम

“दुबईकरण” (“Dubaization”) शब्द जितना आकर्षक है, उतना ही विरोधाभासी भी। शहरी अध्ययन के विद्वान यासर एलशेश्तावी का गढ़ा गया यह शब्द उस विकास मॉडल का प्रतीक है जो तमाशे और चमक पर टिका है। आसमान छूती इमारतें, कृत्रिम द्वीप, असीम पूँजी और यह विश्वास कि समृद्धि राजनीति से आगे निकल सकती है। मगर इन दिनों कैसे वीडियों दिखलाई दे रहे है? विडंबना है कि “दुबईकरण” यह अवधारणा ऐसे क्षेत्र में जन्मी, जो वैचारिक, राजनीतिक उथल-पुथल और लगातार युद्धों का इलाका रहा है। फिर भी दुबई की कामयाबी चर्चे तो बने।

पश्चिम एसिया के इस अमीरात ने दुनिया के आगे एक सपना गढ़ा। आत्मविश्वासी, चमकदार और क्षेत्र की उथल-पुथल से थोड़ा दूर। निवेशक यहाँ इस विश्वास के साथ पहुंचे मानों भू-राजनीति कहीं रेगिस्तानी क्षितिज के पार रुक जाती है। पर्यटक आए यह मानकर कि मध्य-पूर्व के संघर्ष किसी और नक्शे की कहानी हैं। धीरे-धीरे दुनिया वहाँ बसने लगी। भारतीय, ब्रिटिश, अमेरिकी और यूरोपीय—वैश्वीकरण की बेचैन आबादी—इस शहर में आई, मानो यहाँ शांति को साँस उम्र भर के लिए है और समृद्धि को जीवन में मनमाफिक उतार सकते है।

इतना ही नहीं जब दुनिया के अन्य हिस्सों में युद्ध हुए, रूस-यूक्रेन से लेकर इज़राइल-ग़ाज़ा तक तो दुबई और भी आकर्षक शरणस्थली बना। एक ऐसी जगह जहाँ दुनिया की चिंताओं को कुछ समय के लिए किनारे रखा जा सकता है और व्यवस्था, संपन्नता और अवसर का वादा हमेशा सुरक्षित। कई देशों में बढ़ते टैक्स और सख्त वित्तीय नियमों ने भी उद्यमियों, निवेशकों और पेशेवरों को ऐसे ठिकानों की तलाश में धकेला था जहाँ टैक्स व्यवस्था अधिक अनुकूल हो। इन्ही कारणों से दुबई ने फलना-फूलना शुरू किया।

मैंने अपने आसपास लोगों को दुबई की चकाचौंध से सम्मोहित होते देखा है—कभी छुट्टियों के ठिकाने के रूप में, कभी दूसरे घर के रूप में, और कभी ऐसे निवेश के रूप में जहाँ टैक्स कम और महत्वाकांक्षाएँ ऊँची है। लोगों को इस चमक के नीचे छिपे विरोधाभास की थांह नहीं हुई। सब चमचमाते महानगर के आकर्षण, एक शांत वास्तुशिल्प में खोए हुए थे। विशाल प्रवासी श्रमबल, जो सोशल मीडिया की रीलों में शायद ही दिखाई देता है; असहमति पर सख्त सीमाएँ; और सार्वजनिक निगरानी की क्षेत्र की सबसे परिष्कृत प्रणालियों आदि सबकी अनदेखी करते हुए।

आकर्षण लगातार लोगों को लुभाता रहा। दुबई भविष्य का प्रतीक बना। वैसे ही जैसे कभी अमेरिका और ब्रिटेन था-अवसर की तलाश में आने वाले प्रवासियों के लिए चुंबक। यदि बीसवीं सदी अमेरिकी सपने की थी, तो इक्कीसवीं सदी की शुरुआत ने मानो उसका दुबई संस्करण गढ़ा।

उधर कई पश्चिमी लोकतंत्र आव्रजन को लेकर चिंतित होते जा रहे थे—सीमाएँ सख्त हो रही थी।  पहचान की बहसों तथा प्रवासियों के आर्थिक-सांस्कृतिक प्रभाव के सवाल थे। वही दुबई ने चुपचाप उलटा रास्ता अपनाया। उसने ईमानदारी से दुनिया की प्रतिभा, श्रम और पूँजी के लिए अपने दरवाज़े व्यावहारिकता के साथ खोले।

9/11 के बाद यह प्रवृत्ति और तेज हुई। पश्चिमी वित्तीय प्रणालियाँ अधिक सतर्क हुईं, मध्य-पूर्व के कई हिस्से संघर्ष में डूबते गए तो पैसा व प्रतिभा ऐसी जगहों की तलाश में निकल पड़ी जो स्थिर भी हों और वैश्विक नेटवर्क से कटे भी न हों। दुबई ने ठीक ऐसे ही गलियारे, ठिकाने के रूप में अपने को पेश किया। पूरे पश्चिम एसिया के बाज़ारों के करीब और वैश्विक पूँजी को आश्वस्त करने के लिए पर्याप्त सुरक्षित तथा व्यवस्थित।

दुबई के शासकों ने रेगिस्तानी अमीरात को कायदे से देश को दुनिया का आधुनिक व्यापारिक चौराहा बनाया। एक ऐसी जगह जहाँ प्रतिद्वंद्वी संसार टकराए बिना मिल सकें। पश्चिमी वित्त, एशियाई व्यापार, रूसी पूँजी, मध्य-पूर्वी ऊर्जा और दक्षिण एशियाई श्रम—सब एक ही चमकदार गलियारों से होकर गुजरें।

इसके पीछे सावधानी से गढ़ी गई कूटनीति भी थी। संयुक्त अरब अमीरात ने वाशिंगटन के साथ अपनी सुरक्षा छतरी बनाई। बीजिंग के साथ व्यापारिक और तकनीकी रिश्ते बढ़ाए। रूसी पूँजी का स्वागत किया। ब्रिक्स जैसे उभरते मंचों से जुड़ा और प्रतिद्वंद्वी खेमों के बीच कामकाजी संबंध बनाए रखे। रणनीतिकार इसे “हेजिंग” या “मल्टी-अलाइनमेंट” कहते हैं। दुबई के शासकों ने इसे बस व्यावहारिकता की तरह अपनाया।

परिणाम था—अमीरात सबके लिए उपयोगी हुआ मगर किसी एक का नहीं।

तभी एक ऐसी दुनिया में जो तटस्थ जमीन खोज रही थी, दुबई धीरे-धीरे खाड़ी का शहर कम और वैश्वीकरण का चमकदार, खुला और शांत चौराहा बना।

लेकिन 2 मार्च 2026 का दिन!

दुबई का शांत क्षितिज अचानक सायरनों और धमाकों से चीर दिया गया। ईरान ने अमेरिका और इज़राइल के हमलों के जवाब में खाड़ी के पार मिसाइलों और ड्रोन की लहरें दागी तो संयुक्त अरब अमीरात की ओर सैकड़ों प्रोजेक्टाइल भी छोड़े। अधिकांश को वायु रक्षा प्रणालियों ने रोक लिया, लेकिन उनके मलबे अबू धाबी और दुबई बिखर गए।

और एक पल में दुबई की समृद्धि युद्ध रिपोर्टों में लिपटी दिखलाई दी।

तबाही तेहरान या अन्य युद्धक्षेत्रों जैसी नहीं थी। लेकिन प्रतीकात्मक झटका कहीं अधिक तेज़ी से फैला। क्योंकि किसी ने भी कल्पना नहीं की थी कि “पूर्व का लंदन” कहे जाने वाला शहर—पश्चिम और पूर्व के बीच पुल, वैश्विक व्यापार का तटस्थ चौराहा अचानक मिसाइलों की छाया में होगा?

और प्रवासी चुपचाप निकलने का रास्ता तलाशने लगे। जो लोग दशकों से दुबई को अपना घर कहते थे, वे अब एयरलाइनों और ज़मीनी मार्गों से रियाद, सऊदी अरब और मस्कट, ओमान की ओर निकलने के विकल्प तलाश रहे हैं।

हालांकि बुलबुला अभी फूटा नहीं है। लेकिन भरोसा अब अटूट भी नहीं है।

जंग-लडाईयां सावधानी से गढ़ी गई कहानियों की परतें खोल देती हैं। अ कितनी भी संख्या में इन्फ्लुएंसर या चमकदार रीलें—और दुबई गर्व से खुद को दुनिया की इन्फ्लुएंसर राजधानी बनाएं,  यह सच्चाई पूरी तरह छुपाई नहीं जा सकतीं कि क्षेत्र में फैली लड़ाई दशकों पुराने जटिल टकराव से पैदा हुआ है: ईरान बनाम इज़राइल-अमेरिका का अमिट संघर्ष।

दुबई के शासकों ने अपनी समृद्धि उस कला पर खड़ी की थी जिसमें प्रतिद्वंद्विताओं के बीच खड़ा होना था, उनके भीतर नहीं। वर्षों तक यह संतुलन अद्भुत ढंग से काम करता रहा। वे इसलिए फलते-फूलते रहे क्योंकि हर रास्ता उनसे होकर गुजरता था।

लेकिन वही भूगोल यह भी सुनिश्चित करता है कि जब संघर्ष तीव्र होते हैं, तो यातायात की दिशा ही बदल जाती है।

दुबई ने बहुत समृद्धि बनाई है और वह अचानक नहीं मिटनी। लेकिन अब वह भ्रम नहीं लौटना है कि वह हमेशा पश्चिम एशिया के इतिहासजन्य संर्घष,  राजनीति से ऊपर रहेगा।  “दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह”—यह टैगलाइन जो इन्फ्लुएंसर्स और चमकदार रीलों में बार-बार दोहराई जाती थी—अब पहले जितनी भरोसेमंद नहीं लगती।

शायद “दुबईकरण” केवल तमाशे और रफ्तार की कहानी कभी था ही नहीं। वह एक प्रयोग मात्र था—यह देखने का कि क्या व्यापार और पैसा भूगोल, इतिहास को दरकिनार करते है या नहीं?


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