एनसीपी के बाद बाकी पार्टियों की बारी

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एनसीपी ने हथियार डाल दिए हैं। पार्टी टूटने की आशंका में शरद पवार ने भाजपा के सामने सरेंडर किया। उनकी बेटी और बारामती की सांसद सुप्रिया सुले ने प्रेस कॉऩ्फ्रेंस करके कहा कि अगर सरकार हर राज्य में 50 फीसदी सीटें बढ़ाने का भरोसा देती है तो उनकी पार्टी इसका समर्थन करने को तैयार है। कहने की जरुरत नहीं है कि इस प्रेस कॉन्फ्रेंस की पूरी स्क्रिप्ट कहीं और से लिख कर दी गई थी। यह भी सबको पता है कि अप्रैल में 16 से 18 के बीच विशेष सत्र में नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन बिल पर चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि उनको एक घंटे का समय दीजिए वे बिल में 50 फीसदी सीटें बढ़ाने की बात शामिल करके उसे फिर पेश कर देंगे। इसका अर्थ है कि सरकार हर राज्य में समान रूप से 50 फीसदी सीटें बढ़ाने के लिए सैद्धांतिक तौर पर पहले से तैयार है। इसलिए सुप्रिया सुले का यह कहना कि अगर सरकार 50 फीसदी सीट बढ़ाने का भरोसा दे तो वे समर्थन पर विचार करेंगे, दिखाता है कि उनकी सरकार से बात हो गई है।

अब सवाल है कि क्या इसी तर्क के आधार पर दूसरी पार्टियां भी सरकार के इस प्रस्ताव का समर्थन करेंगी? पिछली बार एकजुट विपक्ष ने बड़े अंतर से सरकार का बिल फेल करा दिया था। सरकार के विधेयक के समर्थन में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े थे। सरकार को तब बिल पास कराने के लिए 352 वोट की जरुरत थी। अब सरकार इंच इंच करके इस संख्या के पास तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। अभी एनडीए को समर्थक सांसदों की संख्या 320 हो गई है। उसमें शरद पवार की एनसीपी के आठ सांसदों को भी जोड़ लेना चाहिए। इससे यह संख्या 328 पहुंच जाती है। जानकार सूत्रों का कहना है कि कई अन्य पार्टियों के नेताओं से भाजपा के बड़े नेता संपर्क में हैं। संसद सत्र शुरू होने से पहले इन पार्टियों का रुख सामने आ जाएगा। कहा जा रहा है कि उत्तर भारत की पार्टियों को परिसीमन और 50 फीसदी सीटें बढ़ाने के प्रस्ताव का समर्थन करने में कोई समस्या नहीं आएगी।

जानकार सूत्रों के मुताबिक बुधवार, 16 जुलाई की रात को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भाजपा के बड़े नेताओं की बैठक हुई है। इसमें संसद के मानसून सत्र में संविधान संशोधन के सारे बिल पास कराने पर की रणनीति पर चर्चा हुई है। भाजपा के जानकार नेताओं का कहना है कि कांग्रेस को छोड़ कर ज्यादातर पार्टियां पिछले सत्र से पहले भी तैयार हो गई थीं कि सीटें बढ़ाने और महिला आरक्षण लागू करने का बिल पास कराया जाए। लेकिन ऐन मौके पर कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके और उद्धव ठाकरे की शिव सेना ने बाकी पार्टियों पर दबाव बना कर उनको बिल का विरोध करने के लिए तैयार कराया। यह भी कहा जा रहा है कि मोदी और अमित शाह इसे अपने साथ धोखा मान रहे हैं और यही कारण है कि इतने आक्रामक तरीक से अभियान चला कर ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे की पार्टी तोड़ी गई। संयोग भी भाजपा के साथ है, जो तृणमूल कांग्रेस और डीएमके चुनाव हार गए। न सिर्फ दोनों पार्टियां हारीं, बल्कि ममता बनर्जी और एमके स्टालिन भी अपनी सीट हार गए। भाजपा बाकी नेताओं को समझा रही है कि ये दोनों जनता का मूड नहीं भांप पाए। भाजपा का कहना है कि जनता का मूड परिसीमन और महिला आरक्षण के पक्ष में है। तभी यह तय माना जा रहा है कि सुप्रिया सुले की तरह बाकी पार्टियां ऐलान करें या न करें वे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बिल का समर्थन करेंगे और अगले सत्र में बिल पास होगा। तय मानें कि अगला चुनाव साढ़े आठ सौ सीटों का होगा, जिसमें 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।


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