मुफ्त की रेवड़ी से बचने का तरीका

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मुफ्त की रेवड़ी राजनीतिक दलों के लिए चुनाव जीतने का रामबाण फॉर्मूला है। तभी चुनाव के समय पार्टियां कुछ भी वादा करती हैं। लेकिन सबको पता है कि इस तरह की योजनाओं के कारण राज्यों की वित्तीय स्थिति खराब हो रही है। राज्यों में वेतन, पेंशन देने की मुश्किल आ रही है और विकास की योजनाएं सीमित होती जा रही हैं। अब ऐसा लग रहा है कि चुनाव के समय घोषित मुफ्त की योजनाओं के वित्तीय असर को कम करने का पार्टियों ने नया तरीका निकाल लिया है। चुनाव के समय जो घोषणा की जा रही है उसमें शर्तें जोड़ दी जा रही हैं, जो उस समय नहीं बताई जाती हैं। इन शर्तों के जरिए लाभार्थियों की संख्या की जा रही है ताकि वित्तीय बोझ कम पड़े।

महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद डेढ़ साल के अंदर माझी लड़की बहिन योजना के लाभार्थियों की संख्या 90 लाख कम कर दी है। महाराष्ट्र सरकार का बिल इस योजना के चलते 46 हजार करोड़ रुपए सालाना बढ़ गया था। अब उसमें 20 हजार करोड़ रुपए तक की कमी आ सकती है। इसी तरह दिल्ली में सरकार ने योजना ही नहीं शुरू की। डेढ़ साल बीत जाने के बाद अब कहा जा रहा है कि अगले महीने योजना शुरू हो सकती है। लेकिन उससे पहले इतनी शर्तें लगा दी गईं कि इस योजना की लाभार्थी महिलाओं की संख्या सिर्फ 22 लाख होगी। सो, योजना लागू करने में देरी और लाभार्थियों की संख्या तय करने की नई शर्तों के जरिए सरकारें इसके असर को कम करने के रास्ते निकाल रही हैं।


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