दुनिया में कम नेता हुए, जिन्होंने अपने वैचारिक और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को हिंसा के जरिए समाप्त किया। ऐसे नेताओं में हिटलर और स्टालिन का नाम मुख्य रूप से लिया जा सकता है। ऐसे ही राजनीतिक दल या विचारधारा के तौर पर सिर्फ माओवाद है, जिसने अपने शत्रुओं को हिंसा के जरिए समाप्त करने का प्रयास किआ और यह सिद्धांत दिया कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। विडम्बना देखिए कि भारत की मौजूदा सरकार ने ऐलान करके और टाइमलाइन तय करके माओवाद के विचार से प्रभावित नक्सल संगठनों को समाप्त किया।
उसके बाद प्रधानमंत्री ने ‘दिमागी नक्सल’ को पहचानने और उनसे मुक्ति पाने का आह्वान किया। लेकिन उनकी पार्टी मुक्ति पाने के उन्हीं तरीकों का इस्तेमाल करने का आङ्वान कर रही है, जो तरीके माओवाद के रहे हैं। भाजपा अपने प्रतिद्वंद्वियों से निपटने के लिए लाठी, तलवार और एके 47 का इस्तेमाल करना चाहती है। हालांकि यह अभी आभासी दुनिया में है लेकिन सोचें, अगर यह सच हो जाए तो क्या होगा?
पहले इसके संदर्भ को समझने की जरुरत है। पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी की नई बनी सोशल मीडिया टीम ने कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों के खिलाफ एक बेहद आक्रामक विज्ञापन की शृंखला जारी की। इसे भाजपा के हर प्रदेश के सोशल मीडिया अकाउंट से प्रसारित किया गया। वैसे तो कई विज्ञापन हैं लेकिन प्रतिनिधि तौर पर तीन विज्ञापनों को चुना जा सकता है, जो इतिहास के अलग अलग तीन दौर में इस्तेमाल होने वाले हथियारों को दिखाते हैं। एक विज्ञापन में दिखाया गया है कि भाजपा की सारी प्रदेश इकाइयां लाठी से कांग्रेस की धुनाई कर रही हैं। एक घेरा है, जिसके बीच में कांग्रेस पड़ी है और चारों तरफ से उसके ऊपर लाठियां बरसाई जा रही हैं।
दूसरा विज्ञापन है, जिसमें रोम के गुलाम विद्रोह पर बनी फिल्म का दृश्य है, जिसमें स्पार्ट्कस के नेतृत्व में गुलाम ग्लैडिएटर रोमन साम्राज्य के खिलाफ जंग का ऐलान करते हैं। इसमें सारे गुलाम योद्धा हाथ में तलवार लिए हुए हैं और बेहद हिंसक अंदाज में चीखते हुए कहते हैं कि वे हमले के लिए तैयार हैं। तीसरे विज्ञापन में दिखाया जा रहा है कि क्लाशनिकोव यानी एके 47 और एके 56 राइफल हाथ में लेकर भाजपा की प्रदेश कमेटियां ‘दिमागी नक्सलियों’ पर हमले कर रही हैं।
भाजपा ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों और सरकार का विरोध करने वाले लोगों के खिलाफ अपने विज्ञापन को आक्रामक दिखाने के लिए जितने भी प्रतीक चुने हैं, सब बेहद हिंसक हैं और लगभग हर विज्ञापन में भाजपा ने अपने को खलनायक के रूप में पेश किया है। फिल्मों और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के जिन सीरीज से दृश्य लिए गए हैं उनमें हर जगह खलनायक को भाजपा के रूप में दिखाया गया है, जबकि नायक या आम नागरिक को कांग्रेस या सरकार विरोधी के तौर पर दिखाया गया है। सन्नी देओल की ‘घातक’ फिल्म का एक दृश्य है, जिसमें खूंखार विलेन सन्नी देओल के पिता अमरीश पुरी के गले में पट्टा डाल कर कुत्ते की तरह चौराहे पर पुचकार रहा है। भाजपा ने इस दृश्य का इस्तेमाल किया है और उसके विज्ञापन में डैनी के रूप में भाजपा है और अमरीश पुरी के रूप में कांग्रेस!
भाजपा चाहती तो फिल्म के क्लाइमेक्स का दृश्य भी दिखा सकती थी, जिसमें नायक सन्नी देओल अपने पिता के अपमान का बदला लेता है और डैनी को मारता है। लेकिन उसमें वह बात नहीं थी। उसमें एक तरह की पवित्रता और बदले की भावना थी, जबकि विलेन जो कर रहा था उसमें ताकत के प्रदर्शन के साथ साथ मनमानी करने की इच्छा व क्षमता और सामान्य नागरिक के लिए नफरत का भाव था। इसलिए भाजपा ने वह दृश्य चुना ताकि वह दिखा सके कि वह कितनी ताकतवर है, कैसे मनमानी कर सकती है, आम आदमी उसके सामने कितना निरीह है और उसके लिए भाजपा के मन में कितनी नफरत है। यह मामूली बात नहीं है। ऐसे लग रहा है कि इस विज्ञापन के जरिए भाजपा सिर्फ कांग्रेस को नहीं, बल्कि सरकार के खिलाफ आंदोलन करने या उसके फैसलों पर सवाल उठाने वाले छात्रों, युवाओं सबको एक संदेश दे रही है।
इसी तरह एक विज्ञापन में ‘मिर्जापुर’ सीरीज के एक दृश्य का इस्तेमाल किया गया है, जिसमें एक सामान्य विद्यार्थी कॉलेज में छात्र संघ का चुनाव लड़ना चाहता है लेकिन सीरीज के खलनायक के गुंडे बेटे को यह बात कबूल नहीं है। वह गुंडा क्लासरूम में आकर छात्र की इस बात के लिए पिटाई करता है कि वह क्यों चुनाव लड़ना चाहता है। भाजपा दिखा रही है कि चुनाव लड़ना सिर्फ उसका काम है। दूसरे कमजोर लोगों को चुनाव नहीं लड़ना चाहिए और अगर वे लड़ने की सोचते हैं तो उनको पीटा जाएगा। भाजपा चाहती तो किसी फिल्म से पढ़ने वाले विद्यार्थी के किसी गुंडे के खिलाफ चुनाव लड़ने और जीतने का दृश्य भी विज्ञापन में इस्तेमाल कर सकती थी। लेकिन उसने अपने को गुंडे के तौर पर दिखाया तो इसका मकसद पढ़ने लिखने वाले छात्रों और युवाओं को डराना था।
भाजपा के विज्ञापनों की इस शृंखला में दो बातें बहुत स्पष्ट रूप से ध्यान देने वाली हैं। पहली बात तो यह कि उसने अपना संदेश प्रसारित करने के लिए हिंसा और आक्रामकता का रास्ता चुना और दूसरी बात यह कि फिल्मों और सीरीज के खलनायकों को अपना मैसेंजर बनाया। यह अनायास नहीं हुआ है और न किसी नौसिखुए का अनाड़ीपन है। यह जान बूझकर किया गया है। भाजपा को यह मैसेज देना था कि कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में उसने मांगें मान लीं इसका यह मतलब नहीं है कि वह कमजोर है या डर गई है।
उसने दिखाया कि वह डरा सकती है और अगर कोई नहीं डरेगा तो उसका वह हस्र होगा, जो विज्ञापन में दिखाया जा रहा है। विपक्ष के प्रति नफरत, उसको खत्म करने की हिंसक मानसिकता ये दोनों भाजपा के विज्ञापनों की नई शृंखला की पहचान है। इन विज्ञापनों का कथ्य जितना हिंसक और वितृष्णा पैदा करने वाला है उससे खराब इनकी प्रस्तुति है। इनमें कोई रचनात्मकता नहीं है और न प्रतीकों या रूपकों का बेहतर इस्तेमाल किया गया है। बिल्कुल भदेस अंदाज में मैसेज देने के लिए इन्हें तैयार किया गया है। सोनिया गांधी सहित दूसरे विपक्षी नेताओं के खिलाफ एआई के जरिए बहुत सा अश्लील और अपमानजनक कंटेंट भी तैयार किया गया है लेकिन नफरत और हिंसा वाले विज्ञापन ज्यादा चिंता पैदा करते हैं। अभी तो यह आभासी दुनिया में है लेकिन अगर यह सच हो जाए तो सोचें, क्या होगा!
