अपेक्षित यह है कि संबंधित पक्ष विवाद को उलझाने वाले कदम ना उठाएं। मगर चीन ने ऐसा ही किया है। अतः भारत को उसी अंदाज में चीन को सख्त संदेश देना चाहिए, जैसा उसने पाकिस्तान के मामले में किया है।
भारत ने उचित ही पाकिस्तान-चीन संयुक्त सीमा आयोग को सक्रिय करने के उन दोनों देशों के पैंतरे को ठुकरा दिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने दो टूक कहा कि भारतीय क्षेत्रों से जुड़ा चीन-पाकिस्तान का कोई कथित सीमा सहयोग भारत को अस्वीकार्य है। भारत की हमेशा से ये राय है कि पाकिस्तान और चीन के बीच कोई सीमा नहीं है। ऐसे में तथाकथित संयुक्त आयोग का कोई कानूनी आधार नहीं है। गौरतलब है कि पाकिस्तान और चीन ने बुधवार को पाकिस्तान-चीन बाउंड्री जॉइंट कमीशन को ऑपरेशनल करने की घोषणा की। इस कथित आयोग की पहली बैठक इस्लामाबाद में हुई। पाकिस्तान के मुताबिक इस व्यवस्था के जरिए दोनों देश सीमा प्रबंधन, संयुक्त सीमा सर्वेक्षण, व्यापार, और लोगों के बीच संपर्क में सहयोग बढ़ाएंगे।
इस विवाद का संबंध 1963 में उठाए गए पाकिस्तान के उस अवैध कदम से है, जिसके जरिए अपने कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के 5,300 वर्ग किलोमीटर इलाके उसने चीन को सौंप दिए। अब उस अवैध कब्जे को वैध ठहराने की कोशिश में उसने चीन के साथ मिल कर साझा सीमा आयोग बनाने की चाल चली है। एक बार फिर ऐसे प्रयास में चीन उसका सहभागी बना है। इसके पहले उस क्षेत्र में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के निर्माण के जरिए भी चीन भारत की प्रादेशिक अखंडता के उल्लंघन में सहभागी बना था।
इस बार यह कदम उसने तब उठाया है, जब मीडिया हेडलाइन्स में भारत और चीन के बीच संबंध में सुधार की खबरें छायी हुई हैं। हाल में भारत और चीन के बीच विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता में सीमा विवाद हल करने के लिए आठ बिंदुओं पर सहमति बनी थी। इसके तहत सीमा निर्धारण के लिए विशेषज्ञों का एक समूह बनाने और सीमा प्रबंधन के लिए कार्य दल बनाने पर रजामंदी हुई। इस पृष्ठभूमि में यह सहज अपेक्षित है कि संबंधित पक्ष विवाद को उलझाने वाले कदम ना उठाएं। मगर चीन ने ऐसा ही किया है। इससे आपसी अविश्वास की खाई और बढ़ेगी। अतः भारत सरकार से अपेक्षा है कि वह उसी अंदाज में चीन को भी सख्त संदेश दे, जैसा उसने पाकिस्तान के मामले में किया है।
