मंदिर में सब एक दूसरे को बचा रहे हैं

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अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावा चोरी के मामले में लीपापोती का काम जोर शोर से चल रहा है। ऐसा लग रहा है कि सब एक दूसरे को बचाने में लगे हैं। कोई नहीं चाहता है कि ईमानदारी से जांच हो और गड़बड़ी करने वालों या उनको बचाने वालों की पहचान करके उनको सजा दिलाई जाए। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की छह जुलाई की बैठक में चंपत राय और अनिल मिश्रा का इस्तीफा स्वीकार करने के बाद हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष महंत गोविंद गिरी ने जो बातें कही उनका लब्बोलुआब यह था कि कुछ प्रक्रियागत गड़बड़ियां थीं, जिनको ठीक कर लिया गया है। गोविंद गिरी ने पूरे विवाद के केंद्र में रहे चंपत राय की जितनी तारीफ की वह हैरान करने वाली थी। उन्होंने चंपत राय का अभिनंदन और सम्मान करने की बात कही। ऊपर से मीडिया और विपक्षी पार्टियों के आरोपों को प्रलाप कहा और यह भी कहा कि मंदिर को बदनाम करने के लिए प्रपंच रचे जा रहे हैं।

अब सवाल है कि क्यों ट्रस्ट के लोग या पदाधिकारी चंपत राय पर कोई आरोप नहीं लगा रहे हैं? वे चोरी में शामिल हैं या नहीं यह तो बाद में पता चलेगा लेकिन यह तो पहले पता चल चुका है कि उनको दस बार कहा गया कि चोरी हो रही है और उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की। यह भी पता चल चुका है कि जब पानी सिर के ऊपर से गुजर गया तो खुद पुलिस बन कर चंपत राय निकले और चोरी करने वालों को पकड़ कर उनसे पैसे वसूलने लगे। उन लोगों ने ही बताया कि 80 लाख के करीब रिकवरी हुई है। यह भी पता चल चुका है कि चंपत राय ने चोरी करने वालों को कमरे में बंद किया। यह भी सब जानते हैं कि उन्होंने मामले के ढकने का प्रयास किया। उन्होंने जून के पहले हफ्ते तक कहा कि कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। सोचें, चोरों को संरक्षण देने, खुद कानून हाथ में लेकर कार्रवाई करने, मामले को छिपाने और न्याय के रास्ते में बाधा डालने के आरोप प्रमाणित हैं। जो जिम्मेदारी दी गई थी, उसके निर्वहन में अक्षमता भी पूरी तरह से प्रमाणित है। फिर भी अभिनंदन किया जा रहा है! क्या उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करके आगे की कार्रवाई नहीं होनी चाहिए?

अब बलि का बकरा अनिल मिश्रा को बनाने की तैयारी हो रही है। क्या इसका कारण यह है कि अगर किसी ने चंपत राय को कुछ किया तो वे भी सबके राज खोलेंगे? ध्यान रहे ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद गिरी अयोध्या में नहीं रहते हैं। उनका कोई चार्टर्ड अकाउंटेंट महीने में पांच दिन के लिए अयोध्या जाकर जांच करता था। उनकी जवाबदेही कोई तय नहीं कर रहा है कि वे कोषाध्यक्ष थे और कोष में गड़बड़ी हुई है तो क्यों नहीं उनसे पूछताछ हो? इस पूरी जांच में कोई कह रहा है कि लखनऊ में बैठे बड़े लोग अमुक अमुक व्यक्ति को फंसाना या बचाना चाहते हैं। एसआईटी की रिपोर्ट को इसी निगाह से देखा जा रहा है। कोई कह रहा है कि नागपुर के लोग अमुक व्यक्ति को बचाने में लगे हैं तो दिल्ली के बारे में भी कहा जा रहा है कि वहां से भी निर्देश आ जा रहे हैं। अयोध्या का सत्ता केंद्र तो अपने को बचाने में लगा ही है। जानकार सूत्रों का कहना है कि पूरे इकोसिस्टम को बचाने की कोशिश हो रही है। कोई नहीं चाहता है कि सिस्टम बदले। विश्व हिंदू परिषद ने तो डंके की चोट पर कहा है कि किसी भी कीमत पर सरकार के हाथ में मंदिर को नहीं जाने दिया जाएगा। सो, अभी जो इकोसिस्टम काम कर रहा है उसे अपने को मुकदमे में फंसने  से बचाना है और साथ ही यह भी ध्यान रखना है कि वर्चस्व की लड़ाई में दूसरा हावी न हो जाए। सोचें, आस्था के नाम पर अयोध्या में जो व्यवस्था बनाई गई है वह किस तरह से काम कर रही है? यहा मंदिर है, जो सीधे आरएसएस, विहिप द्वारा संचालित है।


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