रुबियो के लिए प्रोटोकॉल ताक पर

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अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत के दौरे पर हैं। वे 26 मई को क्वाड के विदेश मंत्रियों की बैठक करके वापस लौटेंगे। वे जब दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर उतरे तो वहां की तस्वीरें देख कर कई राइटविंग के लोगों ने कहा कि भारत ने औकात बता दी। सिर्फ अमेरिकी राजदूत गए रिसीव करने और भारत सरकार के दो जूनियर अधिकारी पहुंचे थे। सवाल है कि क्या किसी देश का विदेश मंत्री आता है तो विदेश मंत्री या प्रधानमंत्री उसको रिसीव करने जाते हैं? प्रोटोकॉल के तहत ही रुबियो को हवाईअड्डे पर रिसीव किया गया। लेकिन उसके बाद जो हुई वह अभूतपूर्व था।

अमेरिकी विदेश मंत्री हवाईअड्डे से निकले और दनदनाते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंचे। ऐसा लग रहा है, जैसे वहां प्रधानमंत्री पलक पांवड़े बिछाए उनका इंतजार कर रहे थे। वहां रुबियो ने प्रधानमंत्री के साथ एक घंटे तक दोपक्षीय वार्ता की, जिसके बारे में बताया गया कि ऊर्जा सुरक्षा से लेकर तकनीक, व्यापार और पश्चिम एशिया के संकट के बारे में बात हुई। सोचें, यह प्रोटोकॉल का कितना बड़ा उल्लंघन है कि भारत का प्रधानमंत्री किसी देश के विदेश मंत्री के साथ दोपक्षीय वार्ता कर रहा है? वार्ता में विदेश मंत्री एस जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल भी मौजूद थे। रुबियो के साथ भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर और एक उप मंत्री एलिसन हूकर भी मौजूद थीं।

आमतौर पर किसी देश का विदेश मंत्री भारत के दौरे पर आता है या भारत के विदेश मंत्री किसी देश के दौरे पर जाते हैं तो उनकी बात अपने समकक्ष से होती है। इस लिहाज से रुबियो की बात जयशंकर से होनी चाहिए थी। विदेश मंत्रियों की दोपक्षीय वार्ता में सारे मुद्दों पर बातचीत की जाती है। जो कूटनीति होनी है या जोड़तोड़ होनी है, जो समझौता या मोलभाव होना है वह उनके बीच होती है। उसके बाद जब दोनों किसी सहमति पर पहुंच जाते हैं तो उसके बाद औपचारिकता के तौर पर प्रधानमंत्री से उनकी मुलाकात होती है। उस मुलाकात में विदेश मेहमान अपने देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति का संदेश प्रधानमंत्री को देते हैं और तस्वीरें खिंचवाई जाती है।

कभी ऐसा नहीं होता है कि प्रधानमंत्री किसी देश के विदेश मंत्री के साथ दोपक्षीय वार्ता करे। प्रधानमंत्री तो प्रधानमंत्री के साथ दोपक्षीय वार्ता करेगा। कूटनीति में आमतौर पर ऐसा ही होता है। प्रधानमंत्री चाहे कितने भी छोटे देश का हो, नई दिल्ली आएगा तो प्रधानमंत्री के साथ वार्ता करेगा और विदेश मंत्री चाहे कितने भी बड़े देश का हो वह विदेश मंत्री से ही वार्ता करेगा। लेकिन जरूर कुछ खास होगा तभी सीधे प्रधानमंत्री ने एक घंटे तक बातचीत की।

ऐसी भी नहीं है कि रुबियो कोई बड़ा प्रस्ताव लेकर आए हैं। कम से कम सार्वजनिक रूप से तो ऐसा नहीं दिख रहा है। दिल्ली आने से पहले वे कोलकाता गए, जहां मदर टेरेसा के बनाए मिशनरीज ऑफ चैरिटी का दौरा किया। जाहिर है वह अपनी घरेलू राजनीति के लिए किया गया। वे कैथोलिक धार्मिक पहचान बताने में बहुत आगे रहते हैं। हो सकता है कि प्रधानमंत्री के साथ वार्ता में उन्होंने एफसीआरए का मुद्दा उठाया भी हो क्योंकि इस तरह की मिशनरीज को एफसीआरए के जरिए बहुत चंदा बाहर से आता है। जाते जाते औपचारिकता के लिए वे रुबियो क्वाड के विदेश मंत्रियों की बैठक में शामिल होंगे।

सोचें, अमेरिका की पहल पर ही क्वाड बना और फिर खुद उसने इसकी उपयोगिता कम कर दी। पिछले दिनों जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन गए और राष्ट्रपति शी जिनपिंग को महान नेता और अपना दोस्त बना दिया तो समझा जा सकता है कि क्वाड का उनके लिए क्या मतलब है। उसमें भी हैरानी की बात यह है कि चीन जाने से पहले ट्रंप ने जापान की प्रधानमंत्री शाने तकाइची को फोन किया लेकिन भारत को बताने की जरुरत नहीं समझी। उसके बाद रुबियो भारत आकर क्वाड का महत्व समझा रहे हैं!


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