नेता दिखावा बंद करें तो कुछ काम हो

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वैसे तो भारत कृषि प्रधान देश कहा जाता है लेकिन राजनीति की बात करें तो भारत एक प्रदर्शन प्रधान देश है। यहां नेता कई तरह की कलाकारी का प्रदर्शन करते हैं और जनता को मूर्ख बनाते हैं। परफॉर्मेटिव पोलिटिक्स में जैसी महारत भारत के नेताओं को है वैसी दुनिया के किसी देश के नेता में नहीं होगी। तभी देश और दुनिया में तेल का संकट शुरू हुआ तो दुनिया भर के देशों ने अपने यहां इस संकट से निपटने के उपाय किए। भारत में पहले तो 70 दिन तक संकट को स्वीकार ही नहीं किया गया क्योंकि पांच राज्यों के चुनाव होने थे। चुनावों में बेहिसाब रैलियां हुईं, रोड शो हुए, नेताओं के विशेष विमान उड़ते रहे। शपथ ग्रहण समारोह तक यह तमाशा चला। उसके बाद अचानक तेल के संकट की याद आई और दूसरे तरह का दिखावा शुरू हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से पेट्रोल, डीजल, गैस आदि किफायत से खर्च करने को कहा। मिसाल बनाने के लिए एक दिन वे भी दो गाड़ियों के काफिले से निकले। उसके बाद नेताओं ने जो तमाशा शुरू किया है वह लोगों के लिए सिरदर्द बन गया है और सोशल मीडिया को कई महीनों तक के लिए मीम्स और मजाक का मसाला मिल गया है।

भाजपा के नेताओं में होड़ मची है कि कौन कितने क्रिएटिव तरीके से दिखावा कर सकता है। दिल्ली के मंत्री कपिल मिश्रा ने एक दिन मेट्रो पकड़ी। फिर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को समझ में आया कि यह तो अच्छा तरीका है मीडिया को दिखाने के लिए तो वे भी एक दिन मेट्रो से चलीं। राजस्थान और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्रियों के बारे में खबर आई कि उन्होंने अपने काफिले में गाड़ियों की संख्या काफी कम कर दी है। लेकिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने सबको पीछे छोड़ते हुए एक दिन बाइक चलाते हुए सचिवालय जाने का फैसला किया। सो, वे और उनके साथ ढेर सारे लोग बाइक चलाते हुए ऑफिस गए। राजस्थान में एक जज साहेब ने साइकिल से अदालत जाने का फैसला किया तो बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सबको पीछे छोड़ते हुए पैदल ही ऑफिस जाने का फैसला किया। वे पैदल चल कर सचिवालय गए। अब देखना है कि इससे आगे की क्रिएटिविटी कौन दिखाता है!

लेकिन अब सवाल है कि कोई बाइक से या साइकिल से या पैदल ऑफिस गया तो पूरे समय की वीडियो बनाने का काम किसने किया? यह साफ दिख रहा था कि बाइक के समानांतर गाड़ियां चल रही हैं, जिनसे वीडियो बनाने वाले बैठे हैं। उन्होंने वीडियो बनाई और उसका पीआर किया गया। दूसरा सवाल यह है कि कोई बाइक से, साइकिल से या पैदल सचिवालय गया तो लौटा कैसे? यह सवाल इसलिए है क्योंकि किसी नेता का कोई वीडिया सामने नहीं आया है, जिसमें वह शाम मे थका हारा कार्यालय से लौटता हुआ दिखे। तभी ऐसा माना जा रहा है कि नेता बाइक या साइकिल से या पैदल सचिवालय पहुंचा। फिर पीछे से उसकी गाड़ियां गईं, जिनसे वह शाम में या दिन में किसी समय वापस लौटा।

अब सोचें, जब गाड़ियां पीछे से जानी ही हैं तो फिर सुबह जाते समय दिखावा करने की क्या जरुरत है? लेकिन दिखावा इसलिए करना है कि भाजपा के सर्वोच्च नेता खुद भी दिखावा करते हैं और दिखावा पसंद भी करते हैं। यह भी तो सोचें कि जो काम वे खुद कर रहे हैं वही काम करने से किसी और को कैसे रोक सकते हैं? सो, इस समय देश में दिखावा काल चल रहा है। बाकी पेट्रोल, डीजल और गैस का जो संकट है वह अपनी जगह है और इनके दाम बढ़ने से जो महंगाई बढ़ रही है वह भी अपनी जगह है। प्रधानमंत्री ने लोगों से सोना खरीदना बंद करने और विदेश यात्रा रोकने की अपील की थी। अब देखना है कि भाजपा के लोग कब सुनार की दुकानों और अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे के बाहर लाठी लेकर खड़े होते हैं, लोगों को रोकने के लिए!


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