मनोज अग्रवाल और सुब्रत गुप्ता का क्या मैसेज?

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भारतीय जनता पार्टी और उसकी पश्चिम बंगाल सरकार ने मनोज अग्रवाल को राज्य का मुख्य सचिव और सुब्रत गुप्ता को राज्य सरकार का सलाहकार बना कर क्या मैसेज दिया है? यह समझना मुश्किल नहीं है। भाजपा ने दिखाया है कि तटस्थता और निरपेक्षता की उसकी अपनी परिभाषा है, जिसका सार्वभौमिक परिभाषा से कोई लेना देना नहीं है। उसने यह भी बताया है कि राजनीति के लोक लाज से भी उसका कोई मतलब नहीं है। तीसरा मैसेज अधिकारियों को है कि भाजपा उन्हें कुछ भी दे सकती है। यह मैसेज साधारण नहीं है। ज्यादातर अधिकारी वैसे भी अच्छा पद पाने के लिए कुछ भी समझौता करने को तैयार रहते हैं। अब भाजपा ने उनके लिए रास्ता और आसान कर दिया है।

सोचें, सुब्रत गुप्ता को पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की निगरानी के लिए विशेष पर्यवेक्षक बनाया गया था। सबको पता है कि एसआईआर में क्या हुआ। चुनाव आयोग ने करीब 91 लाख नाम काट दिए। इसमें 27 लाख 10 हजार तो ऐसे लोग हैं, जो जिंदा हैं, बंगाल में रहते हैं और उनके पास दस्तावेज भी हैं, लेकिन तार्किक विसंगति के नाम पर उनके नाम हटाए गए और समय की कमी के कारण न्यायाधिकरण में उनके दस्तावेजों की जांच नहीं हो सकी, जिससे वे वोट नहीं डाल सके।

इस तरह का पक्षपातपूर्ण एसआईआर जिसकी देखरेख में हुआ वह सुब्रत गुप्ता चुनाव खत्म होते ही भाजपा सरकार के सलाहकार बना दिए गए। इसके थोड़े दिन के बाद मनोज अग्रवाल को राज्य का मुख्य सचिव नियुक्त किया गया। मनोज अग्रवाल राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी थी, जिनकी देखरेख में एसआईआर की प्रक्रिया हुई, सुरक्षा बलों की तैनाती हुई और चुनाव व गिनती की प्रक्रिया संपन्न हुई।


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