असम में क्या सचमुच एकतरफा मुकाबला?

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असम की 126 विधानसभा सीटों के लिए कल यानी नौ अप्रैल को मतदान होगा। राज्य में प्रचार समाप्त होने से पहले यानी सात अप्रैल की शाम तक जो ओपिनियन पोल आए उनमें मुकाबला एकतरफा दिखाया गया। लगभग सभी सर्वेक्षणों में भाजपा ने एक सौ सीटों तक पहुंचता दिखाया गया। बहुमत मिलने की भविष्यवाणी तो सभी ने की है। यहां तक कि आमने सामने के मुकाबले में कांग्रेस और भाजपा के वोट में 10 फीसदी तक के अंतर का अनुमान जताया गया है। क्या सचमुच असम में चुनाव इतना एकतरफा है?

असल में 2023 के परिसीमन के बाद से ही यह माना जा रहा है कि असम में कांग्रेस के लिए कोई मौका नहीं है। यह भी कहा जा रहा है कि पहले मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 39 थी, जो अब घट कर 22 रह गई है। खुद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपनी चुनावी सभा में इसका जिक्र किया। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कांग्रेस की स्थिति वैसी नहीं है, जैसी बताई जा रही है। इसका कारण गौरव गोगोई और उनका बनाया गठबंधन है। उन्होंने अहोम जाति की पहचान को आगे किया है। यह धारणा बनी है कि भाजपा के राज में अहोम संस्कृति का क्षरण हो रहा है। दूसरा कारण यह है कि आमतौर पर असम में अपर असम का नेता सीएम बनता था। हिमंत बिस्वा सरमा लोअर असम के नेता हैं। अपर और लोअर के विभाजन में कांग्रेस कुछ फायदा उठा सकती है। तीसरा कारण हिमंत बिस्वा सरमा का ब्राह्मण होना है, जिसकी आबादी दो फीसदी के आसपास है। चौथा कारण यह बताया जा रहा है कि भाजपा ने एक तिहाई टिकट कांग्रेस से आए नेताओं को दी है, जिससे भाजपा का अपना कैडर नाराज है।


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