निखिल गुप्ता केस में भारत की दुविधा

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अमेरिका में खालिस्तानी आतंकवादी गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश रचने वाले निखिल गुप्ता के मामले में भारत सरकार की स्थिति सांप छुछुंदर वाली हो गई है। निखिल गुप्ता ने अपना गुनाह कबूल कर लिया है। लेकिन अमेरिका सरकार इस पर क्यों यकीन करे कि चेक गणराज्य में रहने वाला कोई निजी नागरिक पन्नू की हत्या के लिए सुपारी देगा? यहां तक कि 15 हजार डॉलर एडवांस कर देगा! तभी अमेरिकी जांच एजेंसी और अदालत ने भारत की खुफिया एजेंसी रॉ का भी नाम लिया है। सूत्रों के हवाले से पहले खबर आ चुकी है, जिस भारतीय अधिकारी को अमेरिकी एजेंसी ने सीसी-1 कोड नेम दिया है वह विकास यादव है। हरियाणा के विकास यादव को अपहरण और जबरन वसूली के मामले में भारत में गिरफ्तार किया गया था। अदालत ने बाद में उसे जमानत पर रिहा कर दिया।

भारत के सामने दुविधा की स्थिति है। भारत किसी भी हाल में स्वीकार नहीं कर सकता है कि उसकी खुफिया एजेंसी में काम करने वाले किसी एजेंट ने विदेश में किसी को सुपारी दी और एक अमेरिकी नागरिक, भले वह आतंकवादी घोषित हो, की हत्या करने की साजिश रची। अगर सरकार स्वीकार करेगी तो पूरी दुनिया में देश की बदनामी होगी और ‘रोग नेशन (rouge nation)’ के तौर पर भारत को देखा जाएगा। लेकिन अगर यह कहते हैं कि भारत को पता ही नहीं था कि उसका एक एजेंट इस तरह के काम कर रहा है तो वह एजेंसी की कमजोरी जाहिर करने वाली बात होगी। तभी सवाल है कि यह मामला कैसे हैंडल नहीं हो सका? निखिल गुप्ता के परिजनों का कहना है कि उसने सब कुछ अपने ऊपर ले लिया ताकि यह मामला समाप्त हो। लेकिन सब कुछ अपने ऊपर नहीं लेता तो उसके सामने क्या विकल्प था?


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