भाजपा, जदयू में शह मात का खेल

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बिहार में भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यू के बीच शह मात का खेल चल रहा है। भाजपा इंतजार में बैठी है कि नीतीश कुमार सेहत के हवाले रिटायर हों तो भाजपा का सीएम बने और दूसरी ओर नीतीश कुमार कड़ाके की ठंड में समृद्धि यात्रा पर निकल गए। वे पूरे प्रदेश की यात्रा करेंगे। भाजपा का इंतजार लंबा होता जा रहा है। इस बीच जनता दल यू के नेताओं ने अपने विधायकों की संख्या बढ़ा कर सबसे बड़ी पार्टी बनने का दांव खेलने की तैयारी शुरू कर दी है। हालांकि भाजपा नेता इस गेम से परिचित हैं इसलिए वे भी अपनी तैयारी कर रहे हैं। जनता दल यू की नजर कांग्रेस के छह विधायकों पर है तो भाजपा की नजर अपने ही सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा के तीन विधायकों पर है। कांग्रेस की सहयोगी आईआईपी के इकलौते विधायक आईपी गुप्ता पर भी भाजपा की नजर है तो दूसरी ओर बहुजन समाज पार्टी के इकलौते विधायक सतीश यादव उर्फ पिंटू यादव पर जनता दल यू की नजर है।

असल में यह खींचतान पहले दिन से दिख रही है। भाजपा के कई नेताओं ने दबी जुबान में आरोप लगाया कि वोटों की गिनती के दिन प्रशासन की मदद से नजदीकी मुकाबले वाली सीटों पर जदयू के कई उम्मीदवारों को कम वोट के अंतर से जिताया गया, जबकि ऐसे ही मुकाबले वाली सीटों पर भाजपा को हारने दिया गया या हरा दिया गया। जदयू नेताओं को इसका अफसोस था कि उनकी सीटें भाजपा से कम कैसे रह गईं या राजद को इतनी सीटें क्यों नहीं आईं कि भाजपा पर हमेशा यह दबाव रहे कि जदयू और राजद साथ मिल कर सरकार बना सकते हैं। वहीं खींचतान अब भी चल रही है। दोनों में सबसे बड़ी पार्टी बनने की होड़ है। अगर कांग्रेस के छह विधायक और बसपा के एक विधायक जदयू के साथ जाते हैं तो उसकी संख्या 92 होगी और अगर उपेंद्र कुशवाहा के तीन विधायक और आईपी गुप्ता भाजपा के साथ जाते हैं तो भाजपा की संख्या 93 होगी।

हालांकि अभी तुरंत ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा है। इस बात की चर्चा इसलिए शुरू हो गई क्योंकि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम ने दही चूड़ा का भोज दिया तो उसमें कांग्रेस का एक भी विधायक नहीं पहुंचा। ध्यान रहे कांग्रेस के छह विधायकों में से दो मुस्लिम हैं। कुल चार सीमांचल के विधायक हैं। वे भाजपा के साथ जाने की जोखिम नहीं ले सकते हैं। बहरहाल, अगर भाजपा और जदयू का शह मात का खेल नंबर गेम में जाता है तो ओवैसी की पार्टी के पांच विधायक अपना समर्थन जदयू के साथ दिखाएंगे। हो सकता है कि पिछली बार की तरह ओवैसी की पार्टी टूट जाए और उनके चार विधायक जदयू के साथ चले जाएं। सत्ता के लिए भाजपा और जदयू में अगर वास्तव में टकराव शुरू होता है तो राजद का समर्थन भी निश्चित रूप से जदयू के साथ रहेगा। हालांकि अभी ऐसा नहीं हो रहा है। भाजपा के नेताओं की पैनी नजर हर घटनाक्रम पर है। कहा जा रहा है कि उनका संपर्क तेजस्वी यादव की पार्टी के भी कई विधायकों पर है। सो, अगर टकराव हुआ तो बहुत उठापटक होगी और नीतीश कुमार की स्थिति अभी ऐसी नहीं दिख रही है वे खेल को संभाल सकेंगे। उनके आसपास ईमानदार और प्रतिबद्ध लोगों की कमी हो गई है।


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