क्या सपा और बसपा में तालमेल होगा?

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इस बात की अटकलें तेज हो गई हैं कि एक बार फिर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच तालमेल हो सकता है। हालांकि इसको लेकर कहीं से भी ठोस संकेत नहीं मिले हैं लेकिन दोनों पार्टियों की दूसरी पंक्ति के नेता इस बारे में बात कर रहे हैं। उनकी ओर से जो तर्क दिया जा रहा है वह दमदार है। समाजवादी पार्टी के नेताओं का कहना है कि कांग्रेस पार्टी जो तेवर दिखा रही है उसका कोई आधार नहीं है। कांग्रेस जबरदस्ती लोकसभा चुनाव की जीत का श्रेय राहुल गांधी को दे रही है और ज्यादा सीटों की मांग कर रही है। कांग्रेस के नेताओं ने बिहार में इसी तरह की राजनीति करके राजद को नुकसान पहुंचाया और खुद भी खत्म हुई। कांग्रेस अपनी सुविधा के हिसाब से महाराष्ट्र में अलग हो गई है। आम आदमी पार्टी के साथ भी अपनी  सुविधा से राजनीति की और अब तमिलनाडु में डीएमके पर दबाव बना रही है कि वह उसको ज्यादा सीट दे और सरकार में शामिल करे। ऐसे ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के नेता सभी 403 सीटों पर तैयारी की बात कर रहे हैं और ज्यादा सीटों के लिए अभी से दबाव बनाने लगे हैं।

सपा नेताओं का यह भी कहना है कि अगर ज्यादा सीटें कांग्रेस को देनी हैं तो उससे बेहतर है कि ज्यादा सीट देकर बसपा से तालमेल कर लिया जाए। ध्यान रहे उत्तर प्रदेश की 403 सीटों में से बसपा के पास सिर्फ एक सीट है और 80 लोकसभा में से वह एक भी सीट नहीं जीत पाई है। ऊपर से उसका वोट भी 20 फीसदी से घटते घटते नौ फीसदी पर आ गया है। जो भी वोट उसको मिला है उसे बचाने के लिए बसपा को किसी तरह से एक बार सत्ता में आना होगा। अगर वह सत्ता में नहीं आती है और 2027 में भी दो चार सीटों पर सिमटती है तो उसका अस्तित्व खत्म हो जाएगा। भाजपा के साथ अंदरखाने मिलीभगत के आरोपों की वजह से मुस्लिम उससे दूर हो गए हैं और दलित भी कांग्रेस, भाजपा और सपा तीनों की ओर देख रहे हैं। ऐसे में पहले के मुकाबले बसपा की मोलभाव की क्षमता कम हुई है और अगर ठीक से बातचीत हो तो सपा और बसपा का तालमेल हो सकता है। ध्यान रहे मायावती की पार्टी 2012 से सत्ता से बाहर है। वह तीन विधानसभा चुनाव हार चुकी है और दो लोकसभा चुनावों में उनकी पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई। 2019 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने 10 सीटें जीती थीं और वह समाजवादी पार्टी व राष्ट्रीय लोकदल से तालमेल की वजह से संभव हो पाया था।

वैसे मायावती ने घोषणा कर रखी है कि उनकी पार्टी तालमेल करके नहीं लड़ेगी। लेकिन उनकी  पार्टी के लोग भी मान रहे हैं कि उसके बगैर गुजारा नहीं है। 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा 38 और सपा 37 सीटों पर लड़ी थी। इसमें बसपा को 10 और सपा को सिर्फ पांच सीट मिल पाई थी। दोनों पार्टियों के मिल कर लड़ने की शुरुआत 1993 में हुई थी, जब मुलायम सिंह यादव ने कांशीराम के साथ तालमेल किया था। इन दोनों चुनावों के फॉर्मूले से अलग सपा और बसपा सीट बंटवारे की बात कर सकते हैं। मायावती के लिए अपने भतीजे और अपने उत्तराधिकारी आकाश आनंद को उत्तर प्रदेश व देश की राजनीति में स्थापित करना है। वे उनको उप मुख्यमंत्री बना कर भी यह काम कर सकती हैं। हालांकि दोनों तरफ आशंकाएं हैं लेकिन दोनों पक्षों को उम्मीद भी गठबंधन में ही दिख रही है। अगर दोनों का तालमेल होता है तो अखिलेश को पीडीए की ज्यादा राजनीति नहीं करनी होगी। मुस्लिम, यादव और दलित का वोट उत्तर प्रदेश में 50 फीसदी है। लेकिन सवाल है कि क्या मायावती जोखिम उठाने को तैयार होंगी?


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