प्रियंका को इतनी छोटी भूमिका क्यों?

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यह लाख टके का सवाल है कि कांग्रेस पार्टी ने प्रियंका गांधी वाड्रा को असम में उम्मीदवारों की छंटनी के लिए बनी स्क्रीनिंग कमेटी का प्रमुख बना कर क्या मैसेज दिया है? ध्यान रहे प्रियंका गांधी वाड्रा पिछले तीन साल से मल्लिकार्जुन खड़गे की कमेटी में बिना प्रभार के महासचिव हैं। यह भी किसी को समझ में नहीं आने वाली बात है कि जब उनके अंदर इतनी क्षमता है तो क्यों नहीं उनको कोई जिम्मेदारी दी जा रही है। वे चुनाव के समय सक्रिय होती हैं या पिछले डेढ़ साल से सांसद बन गई हैं तो संसद सत्र के समय सक्रिय होती हैं। इसके अलावा कांग्रेस संगठन में उनकी कोई भूमिका नहीं होती है। अब उनको एक भूमिका दी गई तो वह असम में स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष की है। वे बिना भूमिका के भी एक बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। तभी यह सवाल है कि छंटनी समिति का अध्यक्ष बनाने का क्या मतलब है?

कांग्रेस पार्टी ने असम के लिए अपनी एक टीम बना रखी है और उनके करीबी गौरव गोगोई असम के अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं। वे मुख्यमंत्री पद के अघोषित दावेदार हैं। राज्य के प्रभारी महासचिव भी राहुल के करीबी जितेंद्र सिंह हैं। राज्य की 126 सीटों में से यह भी तय हो गया है कि कांग्रेस एक सौ सीटों पर लड़ेगी और 26 सीटें छोटी सहयोगी पार्टियों जैसे असम जातीयता पार्टी, रायजोर दल, लेफ्ट आदि के लिए छोड़ी जाएंगी। कांग्रेस के अपने एक सौ उम्मीदवारों में से भी सबको पता है कि गौरव गोगोई और जितेंद्र सिंह के हिसाब से नाम तय होंगे। फिर प्रियंका गांधी वाड्रा की क्या भूमिका होगी?

दूसरी ओर कांग्रेस के ही कुछ नेता यह प्रचार कर रहे हैं कि प्रियंका ने खुद जान बूझकर यह भूमिका ली है। उनका कहना है कि असम में कांग्रेस के लिए बहुत अच्छा मौका है। वहां भाजपा 10 साल से सत्ता में है और हिमंत बिस्वा सरमा की सरकार से लोगों में नाराजगी है। पिछले चुनाव में भी कांग्रेस गठबंधन, जिसको असम में महाजोत कहा जाता है उसको 50 सीटें मिली थीं और भाजपा गठबंधन से वोट का अंतर भी दो फीसदी से कम था। सो, अगर कांग्रेस जीत जाती है तो उसका कुछ श्रेय प्रियंका को भी मिलेगा।

इसके अलावा कांग्रेस के लिए उम्मीदों का दूसरा प्रदेश केरल है, जहां की वायनाड सीट से प्रियंका सांसद हैं। सो, जाहिर है कि उनकी सक्रियता केरल में भी रहेगी। ध्यान रहे केरल के पिछले चुनाव के समय राहुल गांधी वायनाड से सांसद थे और पहली बार ऐसा हुआ था कि केरल में सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ। केरल में हर पांच साल पर सत्ता बदलती है लेकिन 2021 में लगातार दूसरी बार लेफ्ट का गठबंधन चुनाव जीत गया। अब इस बार प्रियंका केरल से सांसद हैं और अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो इसका भी श्रेय उनको मिलेगा। इस तरह असम और केरल दोनों जगह का कुछ कुछ श्रेय उनको मिलता है तो फिर से कांग्रेस में यह बात जोर पकड़ेगी प्रियंका को पार्टी की कमान सौंपी जाए। वैसे यह एक स्थायी थीम है। अब भी विपक्ष ने प्रियंका को असम की स्क्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष बनाए जाने के फैसले को कांग्रेस के अंदर के सत्ता संघर्ष से जोड़ कर देखना शुरू कर दिया है। संसद के शीतकालीन सत्र में प्रियंका के प्रदर्शन के बाद कांग्रेस में सत्ता संघर्ष की बातें कुछ ज्यादा ही चलने लगी हैं।


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