चुनाव आयोग पर जस्टिस नागरत्ना का बड़ा बयान

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को लेकर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को पूरी स्वतंत्रता के साथ काम करना चाहिए। जस्टिस नागरत्ना ने जोर देकर कहा कि चुनाव आयोग पर किसी भी तरह की राजनीतिक प्रतिक्रिया या दबाव का असर नहीं पड़ना चाहिए। उनका मानना है कि निष्पक्ष चुनाव के लिए यह बेहद जरूरी है। गौरतलब है कि जस्टिस नागरत्ना थोड़े दिन के लिए चीफ जस्टिस भी बनेंगी।

बहरहारल, उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग, नियंत्रक व महालेखा परीक्षक यानी सीएजी और वित्त आयोग जैसी संस्थाओं का ढांचा एक जैसा रखा गया है। इन संस्थाओं को विशेष रूप से इसलिए बनाया गया है ताकि वे बाहरी प्रभावों से मुक्त रह कर काम कर सकें। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि इन संस्थाओं का उद्देश्य उन क्षेत्रों में निष्पक्षता बनाए रखना है, जहां सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया पर्याप्त नहीं होती। पटना के चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद व्याख्यान देते हुए संवैधानिक संस्थाओं पर अपनी बात रखी।

चुनाव आयोग को लेकर उन्होंने कहा कि चुनाव केवल एक नियमित प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि यह लोकतंत्र की नींव हैं। इनके जरिए ही राजनीतिक सत्ता का गठन होता है। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि समय पर चुनाव होना लोकतंत्र की मजबूती का संकेत है और इससे सरकारों में बदलाव सुचारू रूप से होता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि चुनावी प्रक्रिया पर किसी तरह का नियंत्रण स्थापित किया जाता है तो यह सीधे तौर पर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करता है। इससे लोकतंत्र की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो सकते हैं। पश्चिम बंगाल से लेकर देश भर में चुनाव आयोग और विपक्षी पार्टियों के बीच चल रहे विवाद में जस्टिस नागरत्ना का बयान बहुत महत्वपूर्ण है।

बहरहाल, जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि संस्थाओं को राजनीतिक प्रभाव से दूर रखना जरूरी है। उन्होंने एक पुराने फैसले का जिक्र करते हुए बताया कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी चुनाव आयोग को एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था मान चुका है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि चुनाव आयोग की जिम्मेदारी निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना है। यदि यह संस्था स्वतंत्र नहीं रहेगी तो पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि जब संवैधानिक ढांचा कमजोर होता है तो लोकतंत्र पर खतरा बढ़ जाता है। अगर संस्थाएं एक-दूसरे पर निगरानी रखना बंद कर दें तो संतुलन बिगड़ सकता है।


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