भारत-अमेरिका व्यापार समझौता पक्का

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नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता पक्का हो गया है। दोनों देशों ने समझौते के पहले चरण का फ्रेमवर्क जारी कर दिया है। इसके साथ ही भारत पर लगाया गया 25 फीसदी का अतिरिक्त टैरिफ हट गया है। दोनों देशों के बीच व्यापार के नए दौर की शुरुआत होगी, जिसमें भारत के सामानों पर अमेरिका में 18 फीसदी टैरिफ लगेगा। भारत में अमेरिका के ज्यादातर सामानों पर जीरो टैरिफ लगाने की सहमति बनी है।

यह समझौता अभी अंतरिम है। इसे अंतरिम व्यापार समझौता यानी आईटीए नाम दिया गया है। बताया गया है कि भारत और अमेरिका के बीच दोपक्षीय व्यापार समझौते यानी बीटीए की जो बात पिछले साल फरवरी में शुरू हुई थी उसे आगे बढ़ाया जाएगा। इस अंतरिम समझौते में साफ कर दिया गया है कि भारत में जेनेटिकली मॉडिफाइड यानी जीएम खाद्य पदार्थों को अनुमति नहीं दी जाएगी। भारत ने कृषि व डेयरी उत्पादों पर टैरिफ में कोई छूट नहीं दी है। हालांकि अनेक तरह के फल व सब्जियां और प्रोसेस्ड फूड आइटम्स का भारत में आयात हो सकता है।

दोनों देशों की ओर से जारी साझा दस्तावेजों के मुताबिक यह दोपक्षीय व्यापार समझौता 2030 तक भारत व अमेरिकी व्यापार को 50 हजार करोड़ डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखता है। दोनों देशों ने कहा कि इस फ्रेमवर्क को जल्दी लागू किया जाएगा और व्यापक दोपक्षीय व्यापार समझौते यानी बीटीए की दिशा में बातचीत आगे बढ़ेगी। भारत और अमेरिका की ओर से जारी संयुक्त बयान के मुताबिक, यह फ्रेमवर्क 13 फरवरी 2025 को शुरू हुई भारत-अमेरिका बीटीए वार्ता को आगे बढ़ाएगा। इस समझौते में आगे चलकर बाजार पहुंच, सप्लाई चेन को मजबूत करने और ट्रेड बैरियर कम करने जैसे प्रावधान शामिल होंगे।

दोनों देशों ने फैसला किया है कि वे दोपक्षीय व्यापार संधि के अधिकतम लाभ के लिए कुछ नियम तय करेंगे, ताकि इस समझौते का लाभ मुख्य रूप से अमेरिका और भारत को ही मिले, किसी तीसरे देश को नहीं। भारत और अमेरिका का इस व्यापार समझौते में नॉन टैरिफ बैरियर्स को दूर करने पर खास फोकस है। ये बाधाएं टैरिफ नहीं होतीं, लेकिन व्यापार को मुश्किल बनाती हैं। अमेरिकी मेडिकल डिवाइसेस कंपनियों को भारत में कीमत तय करने के नियम, रजिस्ट्रेशन में देरी जैसी रुकावटों का सामना करना पड़ा रहा था।

भारत यह भी तय करेगा कि समझौते लागू होने के छह महीने के अंदर कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में अमेरिकी स्टैंडर्ड्स यानी जो अमेरिका में इस्तेमाल होते हैं और टेस्टिंग आवश्यकताओं को स्वीकार किया जा सकता है या नहीं। जब कोई अमेरिकी कंपनी भारत में अपना सामान बेचना चाहती है, तो भारत में अलग अलग मानक और टेस्टिंग की जरूरत पड़ती है।


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