यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई एक और याचिका

Categorized as समाचार

उच्च शिक्षा संस्थानों को लेकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों का लगातार विरोध हो रहा है। इन नियमों को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी गई है। इसी क्रम में मंगलवार को एक और याचिका दाखिल की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि ये नियम सामान्य वर्ग के लिए भेदभावपूर्ण हैं।

वकील विनीत जिंदल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। उन्होंने कहा कि ये नियम सामान्य वर्ग के लिए भेदभावपूर्ण हैं और उनके मौलिक अधिकारों का हनन करने वाले हैं। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि यूजीसी रेगुलेशंस-2026 के प्रावधान 3(सी) को लागू करने पर रोक लगाई जाए। इसके अलावा, 2026 के नियमों के अंतर्गत बनाई गई व्यवस्था सभी जाति के व्यक्तियों के लिए लागू हो।

इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट में सामान्य वर्ग के साथ भेदभाव का आरोप लगाते हुए नियम 3(सी) को चुनौती दी गई। एक जनहित याचिका (पीआईएल) में यूजीसी के नए नियम के नियम 3(सी) को मनमाना, भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने की मांग की गई।

Also Read : मदर ऑफ ऑल डील्स पर सहमति तो बस शुरुआत है: उर्सुला वॉन डेर लेयेन

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि यह प्रावधान उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नाम पर कुछ वर्गों (खासकर सामान्य वर्ग) के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा देता है और इससे कुछ समूहों को शिक्षा से बाहर किया जा सकता है। याचिका में कहा गया कि नियम 3(सी) संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन करता है। साथ ही, यह यूजीसी अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के विपरीत है और उच्च शिक्षा में समान अवसर सुनिश्चित करने के मूल उद्देश्य को नुकसान पहुंचाता है।

बता दें कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 13 जनवरी को ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026’ लागू किया। इसके तहत कई संस्थानों को इक्विटी कमेटी बनाने और भेदभाव विरोधी नीति लागू करने के निर्देश दिए गए।

यूजीसी के नए नियमों का उद्देश्य कैंपस पर जाति, धर्म, लिंग, जन्मस्थान, विकलांगता आदि के आधार पर होने वाले भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करना है। इन नियमों के तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों (विश्वविद्यालयों और कॉलेजों) में इक्विटी कमेटी गठित करने का प्रावधान है, जो शिकायतों की जांच करेगी और दोषियों पर सख्त कार्रवाई (जैसे डिग्री रोकना, संस्थान की मान्यता रद्द करना आदि) कर सकेगी।

यूजीसी के आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच साल में विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव की शिकायतें 118 प्रतिशत बढ़ी हैं। ये नियम सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर तैयार किए गए थे, जहां एक पुरानी याचिका में कैंपस पर भेदभाव रोकने के लिए मजबूत तंत्र की मांग की गई थी।

Pic Credit : ANI


Previous News Next News

More News

सत्रावसान में देरी का एक रिकॉर्ड तो टूटा

September 29, 2026

संसद का मानसून सत्र समाप्त हुए डेढ़ महीने से ज्यादा हो गए। सत्र 13 अगस्त को स्थगित हुआ था। लेकिन अभी तक सत्रावसान नहीं किया गया है। संसद स्थघित हुए 47 दिन हो गए हैं। आमतौर पर अनिश्चितकाल तक के लिए स्थगित होने के एक हफ्ते में सत्रावसान कर दिया जाता है। उसके बाद जब…

सीपीएम का अपना एजेंडा है

September 29, 2026

देश की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी सीपीएम के महासचिव एमए बेबी ने विपक्षी गठबंधन की बैठक बुलाने की पहल की। इस पहल पर ममता बनर्जी ने सबसे पहले जवाब दिया और उन्होंने बेबी से फोन पर बात की। कांग्रेस ने भी इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी और उसके बाद 30 सितंबर की बैठक तय हुई।…

सपा-कांग्रेस की मुस्लिम वोट की खींचतान

September 29, 2026

वैसे उत्तर प्रदेश के मुसलमानो के मन में कोई भ्रम नहीं है। वे अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के साथ हैं क्योंकि उनको लग रहा है कि सपा ही इस बार भाजपा से लड़ने वाली मुख्य ताकत है। पिछले लोकसभा चुनाव मे उन्होंने देखा कि भाजपा के समर्थक मतदाताओं में भी अगर भाजपा से नाराजगी…

यूपीएससी के सवाल क्या एआई बना रहा है?

September 29, 2026

यह बहुत परेशान करने वाला सवाल है क्योंकि संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी एकमात्र ऐसी संस्था है, जिस पर प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होने वाले अभ्यर्थी आज भी आंख मूंद कर भरोसा करते हैं। इसका भरोसा इतना गहरा है कि सुप्रीम कोर्ट ने दो बार अपनी सुनवाई में नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए और…

साहब अच्छे एक्टर नहीं!

September 29, 2026

कारण जो हो, साहब का विदेशियों के प्रति प्रेमिल झुकाव, और देसियों के प्रति रूखा बर्ताव बेढब है। फिर, बार-बार सीमित अंदाज, ऊँचे, हवाई दावे, वैज्ञानिकों विशेषज्ञों जैसे ऑडियेंस में भी घिसे-पिटे मुहावरे, उपदेश, आदि उन की समझ का भी सीमित दायरा दिखाता है। ऊँचे पद से वह थोड़ा ढँका जरूर रहा, पर छिपा नहीं…

logo